जंतर-मंतर छात्र प्रदर्शन: सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने पढ़ी संविधान की प्रस्तावना, पुलिस कार्रवाई की निंदा
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 23 जुलाई को जंतर-मंतर पर जारी छात्र विरोध-प्रदर्शन को सुप्रीम कोर्ट के वकीलों का खुला समर्थन मिला। वकीलों ने संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया और राष्ट्रगान गाया — यह एकजुटता का वह प्रतीकात्मक प्रदर्शन था जिसमें कोई नारेबाजी नहीं हुई, केवल संवैधानिक मूल्यों की पुनः स्थापना की माँग थी। छात्रों पर कथित पुलिस बर्बरता के विरोध में यह कदम तब उठाया गया जब देशभर में इस मुद्दे पर बहस तेज़ हो रही है।
वकीलों की एकजुटता का स्वरूप
सुप्रीम कोर्ट की वकील महालक्ष्मी पावनी ने कहा, 'हम शांतिपूर्ण तरीके से छात्रों के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त कर रहे हैं। हम छात्रों पर पुलिस की कथित बर्बरता और हिंसा की निंदा करते हैं। छात्र इस देश का भविष्य हैं और वे केवल अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे।' उन्होंने यह भी कहा कि 'यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि समाज के रक्षक ही कथित तौर पर हिंसक हमलावर बन गए और महिलाओं तथा छात्रों पर बल प्रयोग किया।'
छात्रों पर कथित ज़्यादतियों का ब्यौरा
सुप्रीम कोर्ट की वकील ननिता शर्मा ने प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ हुई कथित घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा, 'बच्चे सिर्फ अन्याय और उस शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज उठा रहे थे। उन छात्रों पर डंडे मारे गए। लाठीचार्ज हुआ। इलेक्ट्रिक करंट लगाया गया।' उन्होंने सरकार से छात्रों के साथ संवाद की अपील करते हुए कहा कि 'बातचीत से सब हल हो सकता है — यह बहुत शर्मनाक है।'
वरिष्ठ अधिवक्ताओं की आवाज़
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि 'सुप्रीम कोर्ट न्याय का मंदिर है और एक वकील होने के नाते हमारा धर्म है कि हम हिंदुस्तान के नागरिकों तक न्याय पहुँचाएँ।' उन्होंने स्पष्ट किया कि वकील यहाँ अपने लिए नहीं, बल्कि छात्रों के अधिकारों के सवाल पर खड़े हैं।
एडवोकेट अरविंद शुक्ला ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य छात्रों के साथ खड़े हैं और उनके साथ हुई 'गैर-कानूनी क्रूरता' की निंदा करते हुए सभी ज़रूरी कानूनी कार्रवाई करेंगे। सीनियर एडवोकेट डॉ. एस. मुरलीधर ने भी कहा कि वे अपने अधिकारों के लिए विरोध कर रहे सभी छात्रों के साथ हैं और उनके लिए न्याय चाहते हैं।
संवैधानिक संदेश
यह ऐसे समय में आया है जब छात्र आंदोलन और पुलिस के रवैये को लेकर देश में व्यापक बहस छिड़ी हुई है। गौरतलब है कि वकीलों ने जानबूझकर नारेबाजी से परहेज किया और संविधान की प्रस्तावना के पाठ को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया — यह संकेत देते हुए कि उनका विरोध संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के दायरे में है।
आगे की राह
वकीलों ने संकेत दिया है कि यदि छात्रों के साथ हुई कथित ज़्यादतियों पर उचित कार्रवाई नहीं हुई, तो वे कानूनी मोर्चे पर आगे बढ़ेंगे। सरकार और छात्रों के बीच संवाद की माँग अब न्यायिक हलकों तक पहुँच चुकी है, जो इस आंदोलन को नई गंभीरता देती है।