18 अगस्त 2026
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जंतर-मंतर प्रदर्शन: दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप नकारे, 20 जुलाई का मार्च बताया गैरकानूनी

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जंतर-मंतर प्रदर्शन: दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप नकारे, 20 जुलाई का मार्च बताया गैरकानूनी

सारांश

जंतर-मंतर छात्र प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप नकारे। पुलिस ने 20 जुलाई के संसद मार्च को गैरकानूनी बताया और 30,000 की भीड़ में 2,873 आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की पहचान का दावा किया।

मुख्य बातें

दिल्ली पुलिस ने 18 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर जंतर-मंतर प्रदर्शन में अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों को खारिज किया।
20 जुलाई को संसद की ओर प्रस्तावित मार्च को पुलिस ने गैरकानूनी करार दिया; भीड़ ने कई स्तर की बैरिकेडिंग तोड़ी।
प्रदर्शन स्थल पर 30,000 से अधिक प्रदर्शनकारी थे; नियंत्रण के लिए 5,000 पुलिसकर्मी तैनात किए गए।
20 से 26 जुलाई के बीच 2,873 लोगों की आपराधिक पृष्ठभूमि के आधार पर पहचान; 47 हिस्ट्रीशीटर , 92 लोग 10 से अधिक मामलों में संलिप्त।
हलफनामा चार याचिकाओं के साझा जवाब के रूप में दाखिल; याचिकाकर्ताओं ने न्यायिक निगरानी में जाँच की माँग की है।

नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर दिल्ली पुलिस ने मंगलवार, 18 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल किया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि 20 जुलाई को संसद की ओर प्रस्तावित मार्च पूरी तरह गैरकानूनी था। यह हलफनामा उन याचिकाओं के जवाब में दाखिल किया गया है, जिनमें कथित पुलिस ज्यादती की न्यायिक निगरानी में जाँच की माँग की गई है।

हलफनामे में क्या कहा दिल्ली पुलिस ने

डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि पुलिस ने उपलब्ध और वैध तरीकों के तहत स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की। पुलिस का दावा है कि भीड़ के हिंसक और अनियंत्रित होने के बाद चरणबद्ध तरीके से बल का इस्तेमाल किया गया — यह कार्रवाई अचानक नहीं, बल्कि हालात बिगड़ने के क्रम में उठाया गया कदम था।

पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका बल प्रयोग भीड़ को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए किया गया था। पुलिस के अनुसार, भीड़ ने कई स्तर की बैरिकेडिंग तोड़कर संसद की ओर बढ़ने का प्रयास किया, जिसके बाद हस्तक्षेप अनिवार्य हो गया।

भीड़ का आकार और सुरक्षा तैनाती

दिल्ली पुलिस के अनुसार, 20 जुलाई को जंतर-मंतर और आसपास के क्षेत्र में 30,000 से अधिक प्रदर्शनकारी मौजूद थे। करीब तीन किलोमीटर के दायरे में फैली इस भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लगभग 5,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। पुलिस ने अपने जवाब में भीड़ के पैमाने और सुरक्षा व्यवस्था की जटिलता का विस्तार से उल्लेख किया है।

आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रदर्शनकारियों की पहचान

हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने बताया कि 20 से 26 जुलाई के बीच कुल 2,873 लोगों की पहचान ऐसे अभिलेखों के आधार पर हुई, जिनका आपराधिक इतिहास रहा है। इनमें 92 लोग ऐसे थे जो 10 से अधिक मामलों में संलिप्त थे, जबकि 47 लोग हिस्ट्रीशीटर की श्रेणी में आते हैं। कुछ व्यक्तियों पर हत्या, बलात्कार, पॉक्सो और एनडीपीएस जैसे गंभीर धाराओं में मामले दर्ज हैं। पुलिस ने स्पष्ट किया कि उसकी जाँच इन्हीं 2,873 लोगों तक सीमित रहेगी।

याचिकाओं की पृष्ठभूमि और न्यायिक संदर्भ

यह हलफनामा सर्वोच्च न्यायालय में दायर चार याचिकाओं के संदर्भ में एक साझा जवाब के रूप में प्रस्तुत किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान छात्रों के खिलाफ कथित पुलिस ज्यादती की न्यायालय की निगरानी में स्वतंत्र जाँच की माँग की है। गौरतलब है कि यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब छात्र आंदोलनों और पुलिस कार्रवाई को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज है।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय अब दिल्ली पुलिस के हलफनामे और याचिकाकर्ताओं के तर्कों की समीक्षा करेगा। न्यायिक निगरानी में जाँच की माँग पर अदालत का रुख इस मामले की अगली दिशा तय करेगा। मामले की अगली सुनवाई की तारीख अभी घोषित नहीं की गई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि 'चरणबद्ध बल प्रयोग' की परिभाषा कौन तय करता है — पुलिस स्वयं या कोई स्वतंत्र निकाय। 2,873 आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की पहचान का दावा प्रदर्शनकारियों की छवि को प्रभावित करने की रणनीति के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, क्योंकि यह तथ्य सीधे बल प्रयोग की आनुपातिकता से संबंधित नहीं है। भारत में पुलिस जवाबदेही का इतिहास बताता है कि बिना स्वतंत्र जाँच के केवल आंतरिक हलफनामों पर निर्भरता पारदर्शिता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। सर्वोच्च न्यायालय यदि न्यायिक निगरानी का आदेश देता है, तो यह मामला पुलिस-नागरिक संबंधों की व्यापक बहस में एक नई मिसाल बन सकता है।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जंतर-मंतर प्रदर्शन में दिल्ली पुलिस पर क्या आरोप हैं?
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि दिल्ली पुलिस ने 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल का प्रयोग किया। इन आरोपों की न्यायालय की निगरानी में स्वतंत्र जाँच की माँग सर्वोच्च न्यायालय में चार याचिकाओं के माध्यम से की गई है।
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में क्या जवाब दिया?
डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा की ओर से दाखिल हलफनामे में पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों को खारिज किया और कहा कि कार्रवाई चरणबद्ध, वैध और परिस्थितियों के अनुरूप थी। पुलिस ने 20 जुलाई के संसद मार्च को गैरकानूनी बताया और भीड़ द्वारा बैरिकेडिंग तोड़ने को अपनी कार्रवाई का आधार बताया।
20 जुलाई के प्रदर्शन में कितने लोग शामिल थे और पुलिस की क्या तैयारी थी?
दिल्ली पुलिस के अनुसार 20 जुलाई को जंतर-मंतर और आसपास के क्षेत्र में 30,000 से अधिक प्रदर्शनकारी मौजूद थे। करीब तीन किलोमीटर के दायरे में फैली इस भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लगभग 5,000 पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे।
2,873 लोगों की पहचान से क्या मतलब है?
दिल्ली पुलिस ने बताया कि 20 से 26 जुलाई के बीच 2,873 ऐसे लोगों की पहचान की गई जिनका आपराधिक इतिहास रहा है। इनमें 92 लोग 10 से अधिक मामलों में संलिप्त थे और 47 हिस्ट्रीशीटर थे; पुलिस ने कहा कि उसकी जाँच इन्हीं लोगों तक सीमित रहेगी।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय अब दिल्ली पुलिस के हलफनामे और याचिकाकर्ताओं के तर्कों की समीक्षा करेगा। न्यायिक निगरानी में जाँच की माँग पर अदालत का निर्णय इस मामले की अगली दिशा तय करेगा; अगली सुनवाई की तारीख अभी घोषित नहीं हुई है।
राष्ट्र प्रेस
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