दिल्ली हाईकोर्ट ने आसिया अंद्राबी की उम्रकैद के खिलाफ याचिका पर NIA से माँगा जवाब, अक्टूबर में सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार, 3 अगस्त को कश्मीरी अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी की उस अपील पर राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को नोटिस जारी किया, जिसमें उन्होंने आतंकी साजिश के मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को चुनौती दी है। अदालत ने सजा पर रोक लगाने की अर्जी पर भी NIA से जवाब माँगा है और मामले की अगली सुनवाई अक्टूबर 2026 में तय की है।
अदालत का आदेश और सुनवाई का विवरण
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन की डिवीजन बेंच ने अंद्राबी के साथ-साथ उनकी दो सहयोगियों — सूफी फहमीदा और नाहिदा नसरीन — की अपीलों पर भी NIA को नोटिस जारी किया। फहमीदा और नसरीन ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 30 साल की सजा को चुनौती दी है। तीनों दोषियों की ओर से सजा पर अंतरिम रोक लगाने की अर्जी दाखिल की गई है, जिस पर NIA का पक्ष सुनने के बाद अदालत निर्णय करेगी।
ट्रायल कोर्ट का फैसला और आरोप
इस साल की शुरुआत में कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशन जज चंद्र जीत सिंह ने अंद्राबी को आतंकवादी गतिविधियों की साजिश रचने और भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के अपराधों में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सजा सुनाते हुए अदालत ने कहा था कि दोषियों के कार्य भारत के अस्तित्व पर आघात करते हैं और उनका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को देश से अलग करना था।
ट्रायल कोर्ट ने यह भी कहा था कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से स्पष्ट होता है कि दोषियों ने हिंसा से दूरी नहीं बनाई, बल्कि मारे गए उग्रवादियों की प्रशंसा कर और अलगाववादी विचारधारा का प्रसार कर अप्रत्यक्ष रूप से इसे प्रोत्साहन दिया। अदालत ने यह भी रेखांकित किया था कि — विशेषकर युवाओं के मन में — यह धारणा बैठाना कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है, हिंसा सहित हर प्रकार के उपाय अपनाने की प्रवृत्ति को जन्म दे सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि: NIA जाँच और आरोप
यह मामला 2018 की NIA जाँच से उपजा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अंद्राबी के नेतृत्व वाले प्रतिबंधित संगठन 'दुख्तरान-ए-मिल्लत' ने सोशल मीडिया, सार्वजनिक भाषणों और अन्य माध्यमों का उपयोग कर जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की वकालत की। आरोपियों पर उग्रवादियों की प्रशंसा करने, पत्थरबाजी जैसी गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए उकसाने और वीडियो तथा ऑनलाइन सामग्री के जरिये 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' पर आधारित नैरेटिव को बढ़ावा देने के आरोप थे।
अंद्राबी को गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 18 (आतंकवादी गतिविधियों की साजिश) और धारा 20 (आतंकवादी संगठन की सदस्यता) के तहत दोषी ठहराया गया था। इसके अतिरिक्त उन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत आपराधिक साजिश और राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के आरोप भी सिद्ध हुए। फहमीदा और नसरीन को भी UAPA और IPC की कई धाराओं के तहत दोषी करार दिया गया था।
गौरतलब है कि अंद्राबी ने 1987 में महिलाओं के अलगाववादी संगठन 'दुख्तरान-ए-मिल्लत' की स्थापना की थी और उन्हें अप्रैल 2018 में गिरफ्तार किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने दर्ज किया था कि उनकी गिरफ्तारी के बाद यह संगठन काफी हद तक निष्क्रिय हो गया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
सजा सुनाए जाने के बाद मिली-जुली राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ सामने आई थीं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेताओं ने इसे आतंकवाद के विरुद्ध कड़ा संदेश बताया। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता शेख बशीर ने कहा कि फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए क्योंकि यह उचित न्यायिक प्रक्रिया के बाद आया है और अंद्राबी के पास ऊपरी अदालत में कानूनी उपाय का विकल्प खुला था।
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने अंद्राबी से वैचारिक मतभेद स्वीकार करते हुए भी मानवीय पहलुओं पर विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि अंद्राबी पहले ही कई वर्ष जेल में बिता चुकी हैं और मामले पर पुनर्विचार की अपील की।
आगे क्या होगा
दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई अक्टूबर 2026 में निर्धारित की है। NIA का जवाब आने के बाद ही सजा पर रोक लगाने की अर्जी पर निर्णय होगा। यह मामला UAPA के तहत दीर्घकालिक सजाओं की न्यायिक समीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।