जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने पॉक्सो आरोपी को दी जमानत, किशोरों के आपसी रिश्ते की परिस्थितियों को माना प्रासंगिक
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 29 जून 2026 को पॉक्सो एक्ट के तहत आरोपी एक व्यक्ति को जमानत प्रदान की, यह स्पष्ट करते हुए कि जमानत अर्जी पर विचार करते समय किशोरों के बीच कथित आपसी सहमति से बने रिश्तों की परिस्थितियाँ प्रासंगिक हो सकती हैं। जस्टिस संजय धर की एकल पीठ ने यह आदेश श्रीनगर में सुनाया और साफ किया कि यह टिप्पणी केवल जमानत के सीमित प्रश्न तक ही सीमित है तथा चल रहे ट्रायल के गुण-दोष पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
आरोपी को मगम पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर के आधार पर गिरफ्तार किया गया था। उस पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के अंतर्गत अपहरण और बलात्कार के आरोप, तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया था। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब देशभर की अदालतें किशोर सहमति और पॉक्सो के कड़े प्रावधानों के बीच संतुलन के प्रश्न से जूझ रही हैं।
अदालत ने किन तथ्यों पर दिया ध्यान
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने गौर किया कि पीड़िता ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष बयान दिया था कि वह स्वेच्छा से आरोपी के साथ गई थी, उसके साथ उसके अच्छे संबंध थे और उसने अपनी इच्छा से शारीरिक संबंध बनाए थे। पीड़िता की माँ ने भी बयान दिया था कि दोनों के बीच प्रेम-संबंध था, उनकी बेटी स्वयं घर से गई थी और आरोपी की गिरफ्तारी के बाद भी वह उसके परिवार के साथ रह रही थी क्योंकि वह उससे विवाह करना चाहती थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ
जस्टिस धर ने 'उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनिरुद्ध और अन्य' मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लेख किया। उन्होंने रेखांकित किया कि पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत नाबालिग की सहमति को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती, परंतु जमानत के सीमित प्रश्न पर विचार करते समय ऐसे रिश्तों से जुड़ी विशेष परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस मामले के खास तथ्यों को देखते हुए जमानत से इनकार करना न्याय के साथ अन्याय होगा।
साक्ष्य और गवाहों की स्थिति
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि अभियोजन पक्ष के सभी प्रमुख गवाहों से पहले ही पूछताछ हो चुकी है। इससे आरोपी द्वारा गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना अत्यंत कम हो गई है, जो जमानत देने के पक्ष में एक और महत्त्वपूर्ण कारक बना।
पॉक्सो एक्ट: कानूनी ढाँचा
प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (पॉक्सो) एक्ट, 2012 एक लिंग-निरपेक्ष कानून है जो 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को यौन हमले, उत्पीड़न और अश्लील सामग्री से सुरक्षा प्रदान करता है। यह कानून नाबालिग के साथ किसी भी यौन गतिविधि को अपराध मानता है — चाहे सहमति हो या न हो। इस प्रकरण में हाईकोर्ट का आदेश ट्रायल के परिणाम को प्रभावित नहीं करता; मुकदमा अपनी स्वाभाविक गति से जारी रहेगा।