भोजशाला फैसले को AIMPLB की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, ASI के पुराने रुख की अनदेखी का आरोप

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भोजशाला फैसले को AIMPLB की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, ASI के पुराने रुख की अनदेखी का आरोप

सारांश

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के भोजशाला फैसले के बाद AIMPLB ने सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान किया है। बोर्ड का आरोप है कि फैसले में ASI के दशकों पुराने रुख और 2003 की साझा इबादत व्यवस्था की अनदेखी की गई। जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने भी धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर गंभीर चिंता जताई है।

मुख्य बातें

AIMPLB ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के भोजशाला फैसले को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की घोषणा की।
कमाल मौला मस्जिद कमेटी याचिका दायर करेगी; AIMPLB हरसंभव कानूनी सहयोग देगा।
बोर्ड का आरोप — ASI के आधिकारिक रिकॉर्ड में दशकों तक स्थल को 'भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद' दर्ज किया गया, जिसे फैसले में नजरअंदाज किया गया।
2003 की व्यवस्था के तहत हिंदुओं को मंगलवार और मुसलमानों को शुक्रवार को इबादत की अनुमति थी — हाईकोर्ट ने यह व्यवस्था समाप्त की।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने धार्मिक स्वतंत्रता और सांप्रदायिक सौहार्द पर गंभीर चिंता जताई।
बोर्ड ने वैकल्पिक भूमि आवंटन के सुझाव को भी अस्वीकार्य बताया, कहा — इबादतगाह ऐतिहासिक पहचान से जुड़े होते हैं।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के हालिया फैसले को सिरे से खारिज करते हुए 16 मई को घोषणा की कि कमाल मौला मस्जिद कमेटी इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देगी और बोर्ड उसे हरसंभव कानूनी सहयोग प्रदान करेगा। बोर्ड का कहना है कि यह फैसला ऐतिहासिक अभिलेखों, पुरातात्विक साक्ष्यों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के दशकों पुराने आधिकारिक रुख के विपरीत है।

ASI के पूर्व रुख की अनदेखी का आरोप

AIMPLB के प्रवक्ता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि कई दशकों तक ASI के आधिकारिक रिकॉर्ड और साइनबोर्ड में इस स्थल को 'भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद' के रूप में दर्ज किया जाता रहा — जो इसकी साझा धार्मिक प्रकृति की सरकारी स्वीकृति थी। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला ऐतिहासिक राजस्व अभिलेखों, औपनिवेशिक काल के सरकारी दस्तावेजों, गजेटियरों और सदियों पुराने मुस्लिम इबादती संबंधों की अनदेखी करते हुए दिया गया है।

डॉ. इलियास के अनुसार, वर्ष 2003 की प्रशासनिक व्यवस्था के तहत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति थी। उनका तर्क है कि यह व्यवस्था स्वयं इस बात का प्रमाण थी कि ASI दोनों समुदायों के ऐतिहासिक दावों को मान्यता देता था, और हाईकोर्ट द्वारा इसे समाप्त करना उस पूर्व रुख से स्पष्ट विचलन है।

मुस्लिम पक्ष की दलीलें और ऐतिहासिक साक्ष्य

बोर्ड का कहना है कि मुस्लिम पक्ष ने अदालत के समक्ष यह स्पष्ट किया था कि ऐतिहासिक राजस्व अभिलेखों में इस इमारत को लगातार मस्जिद के रूप में दर्ज किया गया है। डॉ. इलियास ने कहा कि ऐसा कोई निर्विवाद ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो यह सिद्ध करे कि इसी स्थान पर राजा भोज के काल का सरस्वती मंदिर स्थित था। उन्होंने खेद जताया कि अदालत ने इन प्रामाणिक सरकारी अभिलेखों को उचित महत्व नहीं दिया।

बोर्ड ने यह भी कहा कि यह फैसला पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की भावना और संविधान के अनुच्छेद 2526 के तहत प्रदत्त धार्मिक अधिकारों के विरुद्ध है।

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की चिंताएँ

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने भी इस फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस निर्णय से न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता, अल्पसंख्यकों के अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, सांप्रदायिक सौहार्द और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं।

हुसैनी ने कहा कि दशकों तक भोजशाला परिसर एक ऐसी व्यवस्था के तहत संचालित होता रहा जिसने दोनों समुदायों को अपनी-अपनी धार्मिक प्रथाओं का पालन करने की अनुमति दी। उन्होंने कहा कि एक समुदाय के स्थापित इबादत के अधिकारों को हटाकर दूसरे को प्राथमिकता देना, भारत जैसे बहुलवादी समाज में नाजुक संतुलन को कमजोर करने का जोखिम पैदा करता है।

वैकल्पिक भूमि आवंटन के सुझाव पर आपत्ति

हुसैनी ने मुस्लिम समुदाय को वैकल्पिक जमीन आवंटित करने के सुझाव को भी चिंताजनक बताया। उनका कहना है कि धार्मिक अधिकारों को महज भौतिक स्थान के प्रश्न तक सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इबादतगाह ऐतिहासिक निरंतरता, सामूहिक पहचान और स्मृति से गहरे जुड़े होते हैं। उन्होंने आगाह किया कि विवादित ऐतिहासिक व पुरातात्विक व्याख्याओं पर आधारित ऐसे निर्णयों की सावधानीपूर्वक जाँच होनी चाहिए।

आगे क्या होगा

AIMPLB और कमाल मौला मस्जिद कमेटी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर किए जाने की संभावना है, जिससे यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत में पहुँचेगा। गौरतलब है कि भोजशाला विवाद वर्षों से धार्मिक, पुरातात्विक और कानूनी बहस का केंद्र रहा है, और अब यह एक नए न्यायिक चरण में प्रवेश करने की ओर अग्रसर है।

संपादकीय दृष्टिकोण

1991 ऐसे 'विवादित' स्थलों पर लागू होता है जहाँ ASI स्वयं साझा उपयोग को मान्यता देता रहा हो। हाईकोर्ट के फैसले ने 2003 की उस प्रशासनिक व्यवस्था को पलट दिया जो दो दशकों से जमीनी संतुलन बनाए हुए थी — यह सवाल उठता है कि क्या न्यायिक निर्णय ने उस संतुलन की जटिलता को पर्याप्त रूप से आँका। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ASI के अपने अभिलेखों की व्याख्या केंद्रीय होगी, और इसका असर केवल धार, मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा — यह देशभर के अन्य विवादित धार्मिक स्थलों पर भी मिसाल कायम करेगा।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भोजशाला विवाद क्या है और हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?
भोजशाला मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित एक ऐतिहासिक परिसर है जिसे हिंदू पक्ष सरस्वती मंदिर और मुस्लिम पक्ष कमाल मौला मस्जिद मानता है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने हालिया फैसले में 2003 की साझा इबादत व्यवस्था को समाप्त कर दिया, जिसे AIMPLB ने ASI के पूर्व रुख के विरुद्ध बताया है।
AIMPLB सुप्रीम कोर्ट में किस आधार पर चुनौती देगा?
AIMPLB का तर्क है कि हाईकोर्ट का फैसला ऐतिहासिक राजस्व अभिलेखों, औपनिवेशिक दस्तावेजों, ASI के अपने आधिकारिक रिकॉर्ड और पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की भावना के विरुद्ध है। बोर्ड संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन का भी तर्क देगा।
ASI का पुराना रुख क्या था जिसकी अनदेखी का आरोप है?
कई दशकों तक ASI के आधिकारिक रिकॉर्ड और साइनबोर्ड में इस स्थल को 'भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद' दर्ज किया जाता रहा। 2003 की व्यवस्था के तहत हिंदुओं को मंगलवार और मुसलमानों को शुक्रवार को इबादत की अनुमति थी, जो दोनों समुदायों के दावों की सरकारी मान्यता थी।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने इस फैसले पर क्या कहा?
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि यह फैसला अल्पसंख्यक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए गंभीर खतरा है। उन्होंने वैकल्पिक भूमि आवंटन के सुझाव को भी अस्वीकार्य बताया।
इस मामले का आगे क्या होगा?
AIMPLB और कमाल मौला मस्जिद कमेटी सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की तैयारी में हैं। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय न केवल भोजशाला बल्कि देशभर के अन्य विवादित धार्मिक स्थलों के लिए भी कानूनी मिसाल स्थापित कर सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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