भोजशाला फैसले पर माकपा का विरोध: उपासना स्थल अधिनियम 1991 की अनदेखी का आरोप

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भोजशाला फैसले पर माकपा का विरोध: उपासना स्थल अधिनियम 1991 की अनदेखी का आरोप

सारांश

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला को मंदिर का दर्जा देते हुए नमाज पर रोक लगाई। माकपा ने उपासना स्थल अधिनियम 1991 की अनदेखी का आरोप लगाया और सर्वोच्च न्यायालय में अपील की माँग की। मुख्यमंत्री मोहन यादव के बयान की भी पार्टी ने निंदा की।

मुख्य बातें

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने धार स्थित भोजशाला को मंदिर का स्वरूप मानते हुए पूजा-अर्चना की अनुमति दी और नमाज पर रोक लगाई।
माकपा के राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने कहा कि फैसले में उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की मूल भावना की अनदेखी की गई।
माकपा ने इस निर्णय को देश की एकता, अखंडता और सद्भावना के लिए हानिकारक बताया।
पार्टी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के बयान की निंदा करते हुए सांप्रदायिक संयम बरतने की अपील की।
माकपा ने सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय तक मुस्लिम समुदाय को नमाज से वंचित न करने की माँग की।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने धार जिले में स्थित भोजशाला को मंदिर का स्वरूप मानते हुए वहाँ पूजा-अर्चना की अनुमति दे दी है और नमाज पर रोक लगा दी है। इस फैसले के विरुद्ध मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने तीखी आपत्ति जताई है और इसे उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की मूल भावना के विपरीत बताया है।

माकपा का विरोध और कानूनी तर्क

माकपा के मध्य प्रदेश राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि उपासना स्थल अधिनियम, 1991 संसद में पारित होते समय यह स्पष्ट किया गया था कि किसी भी उपासना स्थल का स्वरूप 15 अगस्त 1947 को जैसा था, वैसा ही बरकरार रखा जाएगा। उनके अनुसार, इंदौर खंडपीठ के निर्णय में इस महत्वपूर्ण प्रावधान की अनदेखी की गई है।

सामाजिक सद्भाव पर असर की चिंता

माकपा की मध्य प्रदेश राज्य समिति ने कहा है कि यह निर्णय देश की एकता, अखंडता और सद्भावना पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। पार्टी ने यह भी रेखांकित किया कि यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश आर्थिक संकट से गुज़र रहा है और आम जनता महँगाई की मार झेल रही है। माकपा ने प्रदेशवासियों से शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील की है।

मुख्यमंत्री के बयान की निंदा

माकपा ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के इस मामले पर दिए गए बयान की कड़ी निंदा की है। पार्टी का कहना है कि मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी विधिसम्मत और संवैधानिक शासन चलाने की है, न कि सांप्रदायिक उत्तेजना फैलाने की।

सर्वोच्च न्यायालय में अपील की माँग

माकपा ने माँग की है कि फैसले से असंतुष्ट पक्षों को सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का पूरा अधिकार है और आशा व्यक्त की है कि सर्वोच्च न्यायालय इस विषय में तर्कसंगत निर्णय देगा। पार्टी ने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय तक मुस्लिम समुदाय को नमाज से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही पार्टी ने स्वयं राज्य सरकार से भी इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की माँग की है।

भोजशाला विवाद की पृष्ठभूमि

भोजशाला का मुद्दा लंबे समय से विवादों में रहा है। यह स्थल धार जिले में स्थित है और हिंदू पक्ष इसे माँ सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। इंदौर खंडपीठ के इस ताज़ा फैसले ने इस पुराने विवाद को एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी केंद्र में ला दिया है। आगे की कानूनी लड़ाई अब सर्वोच्च न्यायालय में लड़े जाने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

1991 की व्याख्या को लेकर एक बड़े संवैधानिक प्रश्न को फिर से खड़ा करता है — वह कानून जिसे 1947 की यथास्थिति को संरक्षित करने के लिए बनाया गया था। माकपा की आपत्ति केवल वैचारिक नहीं, कानूनी भी है, और यह देखना होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस अधिनियम की सीमाओं की व्याख्या कैसे करता है। यह मामला ज्ञानवापी और मथुरा जैसे अन्य विवादित धार्मिक स्थलों पर चल रही कानूनी लड़ाइयों के व्यापक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर चूकती है वह यह है कि इस फैसले का असर केवल एक स्थल तक सीमित नहीं — यह उस कानूनी ढाँचे की नींव को परखता है जिस पर दशकों से सांप्रदायिक शांति की इमारत खड़ी रही है।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भोजशाला पर इंदौर खंडपीठ का फैसला क्या है?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने धार जिले में स्थित भोजशाला को मंदिर का स्वरूप मानते हुए वहाँ पूजा-अर्चना की अनुमति दे दी है। साथ ही फैसले में यह भी कहा गया है कि अब वहाँ नमाज नहीं हो सकेगी।
माकपा ने इस फैसले पर आपत्ति क्यों जताई है?
माकपा के राज्य सचिव जसविंदर सिंह के अनुसार, उपासना स्थल अधिनियम, 1991 के तहत किसी भी धार्मिक स्थल का स्वरूप 15 अगस्त 1947 जैसा बरकरार रखा जाना चाहिए। पार्टी का आरोप है कि इंदौर खंडपीठ ने इस प्रावधान की अनदेखी की है।
उपासना स्थल अधिनियम, 1991 क्या कहता है?
यह कानून 1991 में संसद द्वारा पारित किया गया था, जिसमें यह प्रावधान है कि 15 अगस्त 1947 को जिस धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था, वह वैसा ही बना रहेगा। इसका उद्देश्य धार्मिक स्थलों को लेकर भविष्य में होने वाले विवादों को रोकना था।
माकपा ने मुख्यमंत्री मोहन यादव की निंदा क्यों की?
माकपा ने कहा कि मुख्यमंत्री मोहन यादव का इस मामले पर दिया गया बयान सांप्रदायिक उत्तेजना फैलाने वाला है। पार्टी का मानना है कि मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संवैधानिक और विधिसम्मत शासन चलाने की है।
भोजशाला विवाद में आगे क्या होगा?
माकपा ने फैसले से असंतुष्ट पक्षों को सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का सुझाव दिया है और आशा जताई है कि सर्वोच्च न्यायालय तर्कसंगत निर्णय देगा। पार्टी ने यह भी माँग की है कि सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम फैसले तक मुस्लिम समुदाय को नमाज से वंचित न किया जाए।
राष्ट्र प्रेस
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