भोजशाला फैसले पर माकपा का विरोध: उपासना स्थल अधिनियम 1991 की अनदेखी का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने धार जिले में स्थित भोजशाला को मंदिर का स्वरूप मानते हुए वहाँ पूजा-अर्चना की अनुमति दे दी है और नमाज पर रोक लगा दी है। इस फैसले के विरुद्ध मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने तीखी आपत्ति जताई है और इसे उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की मूल भावना के विपरीत बताया है।
माकपा का विरोध और कानूनी तर्क
माकपा के मध्य प्रदेश राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि उपासना स्थल अधिनियम, 1991 संसद में पारित होते समय यह स्पष्ट किया गया था कि किसी भी उपासना स्थल का स्वरूप 15 अगस्त 1947 को जैसा था, वैसा ही बरकरार रखा जाएगा। उनके अनुसार, इंदौर खंडपीठ के निर्णय में इस महत्वपूर्ण प्रावधान की अनदेखी की गई है।
सामाजिक सद्भाव पर असर की चिंता
माकपा की मध्य प्रदेश राज्य समिति ने कहा है कि यह निर्णय देश की एकता, अखंडता और सद्भावना पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। पार्टी ने यह भी रेखांकित किया कि यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश आर्थिक संकट से गुज़र रहा है और आम जनता महँगाई की मार झेल रही है। माकपा ने प्रदेशवासियों से शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील की है।
मुख्यमंत्री के बयान की निंदा
माकपा ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के इस मामले पर दिए गए बयान की कड़ी निंदा की है। पार्टी का कहना है कि मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी विधिसम्मत और संवैधानिक शासन चलाने की है, न कि सांप्रदायिक उत्तेजना फैलाने की।
सर्वोच्च न्यायालय में अपील की माँग
माकपा ने माँग की है कि फैसले से असंतुष्ट पक्षों को सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का पूरा अधिकार है और आशा व्यक्त की है कि सर्वोच्च न्यायालय इस विषय में तर्कसंगत निर्णय देगा। पार्टी ने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय तक मुस्लिम समुदाय को नमाज से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही पार्टी ने स्वयं राज्य सरकार से भी इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की माँग की है।
भोजशाला विवाद की पृष्ठभूमि
भोजशाला का मुद्दा लंबे समय से विवादों में रहा है। यह स्थल धार जिले में स्थित है और हिंदू पक्ष इसे माँ सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। इंदौर खंडपीठ के इस ताज़ा फैसले ने इस पुराने विवाद को एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी केंद्र में ला दिया है। आगे की कानूनी लड़ाई अब सर्वोच्च न्यायालय में लड़े जाने की संभावना है।