भोजशाला फैसले पर ओवैसी का हमला: 'पूजा स्थल अधिनियम का मजाक बना दिया गया'

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भोजशाला फैसले पर ओवैसी का हमला: 'पूजा स्थल अधिनियम का मजाक बना दिया गया'

सारांश

धार भोजशाला फैसले पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि अदालत ने 1935 के धार गजट, 1985 के वक्फ रजिस्ट्रेशन और पूजा स्थल अधिनियम को नज़रअंदाज़ किया। उन्होंने इसे बाबरी फैसले की पुनरावृत्ति बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से न्याय की उम्मीद जताई।

मुख्य बातें

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 15 मई 2026 को हैदराबाद में धार भोजशाला फैसले को संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध बताया।
ओवैसी के अनुसार, अदालत ने 1935 का धार स्टेट गजट , 1985 का वक्फ रजिस्ट्रेशन और पूजा स्थल अधिनियम नज़रअंदाज़ किए।
ASI ने 1951-52 में इस स्थल को मस्जिद घोषित किया था और भोज उत्सव की अनुमति देने से इनकार किया था।
ओवैसी ने इस फैसले की तुलना बाबरी मस्जिद-राम मंदिर फैसले से की और कहा कि उनकी पुरानी चेतावनी सच साबित हुई।
1995 में ₹10 के स्टैम्प पेपर पर दी गई पूजा की अनुमति को ओवैसी ने अवैध और गलत बताया।
ओवैसी ने सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की उम्मीद जताई और चेतावनी दी कि इस फैसले से नए धार्मिक स्थल विवादों का रास्ता खुलेगा।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 15 मई 2026 को हैदराबाद में मीडिया से बातचीत के दौरान धार भोजशाला मामले में आए अदालती फैसले पर तीखी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि यह फैसला संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है और अदालत ने कई अहम दस्तावेजों एवं कानूनी पहलुओं को नज़रअंदाज़ किया है।

फैसले पर ओवैसी की मुख्य आपत्तियाँ

ओवैसी ने कहा कि अदालत ने 1935 के धार स्टेट गजट, 1985 के वक्फ रजिस्ट्रेशन और पूजा स्थल अधिनियम को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले से जुड़े चल रहे सिविल विवाद और मालिकाना हक के सवाल पर भी ध्यान नहीं दिया गया।

उन्होंने तर्क दिया कि वहाँ मिले शिलालेखों से यह स्पष्ट होता है कि वह स्थल एक गुरुकुल था, जहाँ राजा भोज ने संस्कृत शिक्षा को प्रोत्साहन दिया था। उनके अनुसार, जिस प्रकार संसद को 'लोकतंत्र का मंदिर' कहने से वह पूजा स्थल नहीं बन जाती, उसी तर्क से किसी स्थल को मंदिर घोषित नहीं किया जा सकता।

एएसआई के पुराने रुख का हवाला

ओवैसी ने बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) 1951 और 1952 में यह स्पष्ट कर चुका था कि यह स्थल एक मस्जिद है। उस समय ASI ने भोज उत्सव मनाने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया था। उनके अनुसार, इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को मौजूदा फैसले में उचित महत्व नहीं दिया गया।

बाबरी मस्जिद फैसले से तुलना

ओवैसी ने इस फैसले की तुलना बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद के फैसले से की। उनका कहना है कि बाबरी मामले में अदालत ने माना था कि मुसलमानों का उस स्थल पर कब्ज़ा नहीं था, जबकि भोजशाला मामले में मुस्लिम पक्ष का कब्ज़ा आज तक बना हुआ था — फिर भी राहत उसी तर्ज पर दी गई।

उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले भी बाबरी फैसले को आस्था-आधारित बताते हुए चेतावनी दी थी कि यह भविष्य में ऐसे और विवादों का रास्ता खोलेगा। उनके अनुसार, आज वही स्थिति सामने आ रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी फैसले में पूजा स्थल अधिनियम को संविधान की मूल संरचना से जोड़ा था, लेकिन मौजूदा फैसले में इस कानून को नज़रअंदाज़ किया गया है।

1995 के समझौते पर आपत्ति

ओवैसी ने कहा कि 1995 में कुछ मुसलमानों ने ₹10 के स्टैम्प पेपर पर मंगलवार को पूजा करने की अनुमति दे दी, जो उनके अनुसार एक गलती थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि मस्जिद किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती — उसका मालिक अल्लाह होता है — इसलिए किसी के पास इस तरह की अनुमति देने का अधिकार नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद

ओवैसी ने उम्मीद जताई कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में न्याय करेगा। उनके अनुसार, इस फैसले से नए धार्मिक स्थल विवादों का रास्ता खुल गया है और भविष्य में कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक स्थल को अदालत में चुनौती दे सकता है। यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में जाने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि 1935 के गजट और वक्फ रजिस्ट्रेशन जैसे दस्तावेज़ों पर आधारित हैं, जिन्हें अदालत ने क्यों नज़रअंदाज़ किया, यह सवाल मुख्यधारा की कवरेज में प्रायः अनुत्तरित रह जाता है। पूजा स्थल अधिनियम को सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी फैसले में संविधान की मूल संरचना से जोड़ा था — यदि निचली अदालतें उसे दरकिनार करती रहीं, तो यह एक संवैधानिक असंगति है, न केवल सांप्रदायिक विवाद। असली सवाल यह है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय इस विरोधाभास को स्पष्ट करेगा या यह मामला भी लंबित विवादों की उस कतार में जुड़ जाएगा जो अनिश्चितता को और गहरा करते हैं।
RashtraPress
15 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धार भोजशाला विवाद क्या है?
धार भोजशाला मध्य प्रदेश के धार ज़िले में स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है, जिसे हिंदू पक्ष सरस्वती मंदिर और मुस्लिम पक्ष कमाल मौला मस्जिद मानता है। ASI के अनुसार यह संरक्षित स्मारक है और दोनों पक्षों के लिए अलग-अलग दिन उपयोग की व्यवस्था थी, जिसे लेकर अदालती विवाद चल रहा है।
ओवैसी ने भोजशाला फैसले पर क्या आपत्ति जताई?
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि अदालत ने 1935 के धार स्टेट गजट, 1985 के वक्फ रजिस्ट्रेशन और पूजा स्थल अधिनियम को नज़रअंदाज़ किया। उनके अनुसार यह फैसला संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है और इससे नए धार्मिक स्थल विवादों का रास्ता खुलेगा।
पूजा स्थल अधिनियम इस मामले में क्यों अहम है?
पूजा स्थल अधिनियम 1991 यह सुनिश्चित करता है कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्वरूप में था, उसे बदला नहीं जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी फैसले में इसे संविधान की मूल संरचना से जोड़ा था। ओवैसी का आरोप है कि मौजूदा भोजशाला फैसले में इस कानून को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया।
ओवैसी ने 1995 के समझौते को क्यों गलत बताया?
ओवैसी के अनुसार, 1995 में कुछ मुसलमानों ने ₹10 के स्टैम्प पेपर पर मंगलवार को पूजा की अनुमति दे दी, जो उनके अनुसार अधिकारहीन था। उनका तर्क है कि मस्जिद किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती, इसलिए कोई भी व्यक्ति उसके उपयोग की अनुमति देने का अधिकार नहीं रखता।
क्या यह मामला सुप्रीम कोर्ट जाएगा?
ओवैसी ने सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की उम्मीद जताई है, जिससे संकेत मिलता है कि मुस्लिम पक्ष इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी में है। मामले की संवैधानिक जटिलताओं — विशेषकर पूजा स्थल अधिनियम के संदर्भ में — को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई अपेक्षित मानी जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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