भोजशाला मंदिर फैसला: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने धार परिसर को माना मंदिर, हिंदू पक्ष में जश्न
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने धार स्थित भोजशाला परिसर को मंदिर के रूप में मान्यता देते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसके बाद हिंदू संगठनों और भाजपा नेताओं ने इसे सनातन धर्म की न्यायिक जीत बताया। 15 मई को आए इस निर्णय से वर्षों पुराने विवाद में एक निर्णायक मोड़ आया है, और याचिकाकर्ताओं ने देवी वाग्देवी की मूल प्रतिमा को ब्रिटिश संग्रहालय से वापस लाने की माँग भी दोहराई है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि सत्य कभी पराजित नहीं होता और इसके लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने कहा, 'आज, न्यायपालिका के माध्यम से सनातनियों ने विजय प्राप्त की है।' शर्मा ने यह भी कहा कि मुगल आक्रांताओं ने मंदिरों और मठों को नष्ट किया, वेदों और पुराणों को जलाया, और लाखों हिंदुओं का रक्त बहाया — फिर भी हिंदू समाज अपनी आस्था के लिए संघर्षरत रहा।
शर्मा ने एक और बात पर ध्यान दिलाया: 'ये कैसी विडंबना है कि जो दुनिया को न्याय देता है, उस परमात्मा को न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है। कोर्ट की ओर से जो न्याय मिला है, उसका हम सम्मान करते हैं।'
भाजपा विधायक भगवान दास सबनानी ने पत्रकारों से कहा कि वे उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हैं। उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी पर तनाव की स्थिति बनाने की कोशिशें होती थीं, लेकिन अब स्थिति स्पष्ट हो गई है। सबनानी ने मुस्लिम पक्ष द्वारा फैसला न मानने की बात पर कहा कि 'उनकी मर्जी से देश और कानून नहीं चलेगा। भोजशाला मंदिर था, मंदिर है और मंदिर ही रहेगा।'
याचिकाकर्ताओं का पक्ष
याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी ने बताया कि भोजशाला में स्थापित देवी वाग्देवी की प्रतिमा उसी प्रकार की है जिसे माना जाता है कि महाराजा भोज ने मंदिर की मूल स्थापना के समय प्रतिष्ठित किया था। उन्होंने कहा कि आक्रमणों के दौरान ऐसी कई प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त और नष्ट हो गईं।
तिवारी ने यह भी बताया कि वर्तमान में जो प्रतिमा है, वह ब्रिटिश संग्रहालय में रखी मूल प्रतिमा की एक प्रतिकृति है। उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया है कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह मूल प्रतिमा को ब्रिटिश संग्रहालय से वापस लाए और भोजशाला में विधि-विधान से पुनः स्थापित करे।
याचिकाकर्ता राजेश बिजवे ने बताया कि देवी वाग्देवी की प्रतिमा मूल रूप से वहीं स्थापित थी, जिसे अंग्रेज अपने साथ ले गए थे। उन्होंने कहा, 'अब हम उस प्रतिमा की एक प्रतिकृति यहाँ ले आए हैं और इसे दोबारा अंदर स्थापित करने की तैयारियाँ चल रही हैं। जिस तरह के साक्ष्य पेश किए गए हैं, वे इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाते हैं।'
विवाद की पृष्ठभूमि
भोजशाला परिसर वर्षों से विवाद का केंद्र रहा है। हिंदू पक्ष इसे देवी वाग्देवी का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। गौरतलब है कि बसंत पंचमी के अवसर पर इस परिसर में पूजा के अधिकार को लेकर प्रतिवर्ष तनाव की स्थिति बनती रही है।
आगे क्या होगा
मुस्लिम पक्ष द्वारा फैसले को स्वीकार न करने के संकेत मिल रहे हैं, जिससे उच्चतर न्यायालयों में अपील की संभावना बनी हुई है। वहीं, याचिकाकर्ता देवी वाग्देवी की प्रतिकृति को परिसर में पुनः स्थापित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं और केंद्र सरकार से मूल प्रतिमा की वापसी के लिए कदम उठाने की माँग कर रहे हैं।