नर्मदा के 1,000 आदिवासी परिवार बायोगैस से आत्मनिर्भर, 665 घरों में प्लांट चालू
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के नर्मदा जिले में एकता नगर स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के समीप बसे 1,000 आदिवासी परिवार अब खाना पकाने के लिए बायोगैस पर निर्भर हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेशनल यूनिटी डे 2025 पर की गई घोषणा के बाद गरुड़ेश्वर तालुका में बायोगैस प्लांट स्थापित करने की प्रक्रिया तेज़ हो गई है। अब तक 665 परिवारों के घरों में ये प्लांट सफलतापूर्वक चालू हो चुके हैं।
परियोजना का दायरा और लक्ष्य
एकता नगर के आसपास के 89 गाँवों में चल रही इस महत्वाकांक्षी परियोजना का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक ईंधन — लकड़ी और एलपीजी — की जगह स्वच्छ ऊर्जा को अपनाना है। जिन परिवारों के पास कम से कम तीन पशु हैं, उन्हें दो क्यूबिक मीटर क्षमता का फ्लेक्सी बायोगैस प्लांट उपलब्ध कराया जा रहा है। शेष 335 प्लांट नर्मदा जिला पंचायत और डीआरडीए के माध्यम से स्थापित किए जा रहे हैं।
100% सब्सिडी — लाभार्थियों पर कोई बोझ नहीं
परियोजना समन्वयक धीरज भील ने बताया, 'इस प्रोजेक्ट के तहत 1,000 लाभार्थियों का चयन किया गया है। लाभार्थियों को 100 प्रतिशत सब्सिडी दी जा रही है। उन्हें कुछ भी पैसा नहीं देना पड़ता। सरकार पूरी लागत वहन करती है और प्लांट मुफ्त में इंस्टॉल कर दिया जाता है।' सरकार प्रत्येक प्लांट पर ₹30,000 की सहायता प्रदान कर रही है।
आम जनता पर असर — धुआँ, खर्च और श्रम से मुक्ति
लाभार्थी महेश तड़वी ने कहा, 'हमारे पास दो भैंस और एक गाय है। उनके गोबर से गैस बन रही है। पहले लकड़ी जुटाने में काफी मेहनत लगती थी, अब वह समस्या खत्म हो गई है। जो पैसे बच रहे हैं, उनका इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई में कर रहे हैं।'
महिला लाभार्थी संगीता तड़वी ने बताया, 'अब सिलेंडर लेने के लिए बाजार नहीं जाना पड़ता। बायोगैस प्लांट से गैस बन रही है और खाद भी मिल रही है, जिसका उपयोग खेत और बगीचे में कर रहे हैं।' प्रतिदिन 10 किलो गोबर और 90 लीटर पानी डालने पर उत्पन्न गैस 7 से 8 सदस्यों वाले परिवार की रसोई के लिए पर्याप्त है। इससे प्रति माह औसतन दो एलपीजी सिलेंडर की बचत हो रही है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण को दोहरा लाभ
इस पहल से धुएँ के कारण होने वाली आँखों और श्वास संबंधी बीमारियों में कमी आई है। लकड़ी काटने की प्रथा भी घटी है, जिससे स्थानीय वनों पर दबाव कम हुआ है। प्लांट से निकलने वाला अवशेष घोल जैविक खाद के रूप में उपयोग हो रहा है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी घट रही है। यह परियोजना आत्मनिर्भर भारत और स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्यों को आदिवासी क्षेत्र में व्यावहारिक रूप देने का प्रयास है।
आगे की राह
शेष 335 परिवारों में प्लांट स्थापना का कार्य जारी है। यह परियोजना न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक कदम है, बल्कि आदिवासी समुदायों की आर्थिक स्थिति सुधारने का एक व्यापक प्रयास भी है — जिसके परिणाम आने वाले महीनों में और स्पष्ट होंगे।