गोबरधन योजना: बायोगैस संयंत्रों से यूपी के गांवों में स्वच्छता, आय और रोजगार में वृद्धि

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गोबरधन योजना: बायोगैस संयंत्रों से यूपी के गांवों में स्वच्छता, आय और रोजगार में वृद्धि

सारांश

उत्तर प्रदेश में गोबरधन योजना ने गांवों के विकास को नया आयाम दिया है। बायोगैस संयंत्रों ने स्वच्छता के साथ-साथ पंचायतों की आय में भी वृद्धि की है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।

मुख्य बातें

गोबरधन योजना ने गांवों में स्वच्छता और आय में वृद्धि की है।
बायोगैस संयंत्रों का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव है।
28 लाख रुपए से अधिक की आय पंचायतों ने अर्जित की है।
यह योजना पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देती है।
स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं।

लखनऊ, 30 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। उत्तर प्रदेश में गोबरधन योजना के अंतर्गत ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल ने गांवों के विकास में महत्वपूर्ण बदलाव लाने का कार्य किया है। गोबर और जैविक कचरे से ऊर्जा और खाद तैयार कर पंचायतों ने 28 लाख रुपए से अधिक की आय प्राप्त की है। इसी के साथ, बायोगैस से संचालित ग्रामीण उद्योग स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति प्रदान कर रहे हैं।

राज्य के 74 जनपदों में स्थापित 116 बायोगैस संयंत्र गांवों में स्वच्छता, ऊर्जा उत्पादन और आय सृजन का एक मजबूत आधार बनते जा रहे हैं। इन संयंत्रों में गोबर, रसोई का कचरा और कृषि अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन कर बायोगैस और जैविक खाद की तैयारी की जा रही है, जिससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि पंचायतों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है। फरवरी 2026 तक ग्राम पंचायतों ने जैविक खाद और अन्य उत्पादों की बिक्री से 28 लाख रुपए से अधिक की आय अर्जित की है।

स्वयं की आय (ऑन सोर्स रेवेन्यू) के मामले में ललितपुर जिला सबसे आगे है, जहां पंचायतों ने 3.37 लाख रुपए से अधिक की कमाई की। इसके बाद श्रावस्ती (2.87 लाख रुपए) और रामपुर (1.23 लाख रुपए) का स्थान है। बायोगैस ऊर्जा का उपयोग गांवों में स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी किया जा रहा है। रामपुर में इस ऊर्जा से तेल पिराई मशीन चल रही है, जबकि आगरा, ललितपुर, श्रावस्ती, बुलंदशहर, बांदा, सोनभद्र और हरदोई जैसे जिलों में आटा चक्कियां बायोगैस से संचालित हो रही हैं। इससे ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर सुविधाएं मिल रही हैं और रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं।

पंचायती राज विभाग के अनुसार, कई संयंत्र गौशालाओं में स्थापित किए गए हैं, जहां गोबर और अन्य जैविक कचरे से स्वच्छ ईंधन और जैविक खाद तैयार की जा रही है। यह पहल कचरा प्रबंधन के साथ वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

गोबरधन योजना के तहत तैयार जैविक खाद का उपयोग किसान जैविक खेती में कर रहे हैं, जिससे खेती की लागत में कमी आ रही है और भूमि की उर्वरता में सुधार हो रहा है। साथ ही, स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदूषण को भी कम कर रहा है।

पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने कहा कि राज्य सरकार गांवों को स्वच्छ और आत्मनिर्भर बनाने के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि गोबरधन योजना, स्वच्छ ऊर्जा, जैविक खेती और पंचायतों की आय—तीनों को मजबूती प्रदान कर रही है, जिससे स्थानीय विकास को गति मिल रही है।

वहीं, पंचायती राज विभाग के निदेशक अमित कुमार सिंह ने बताया कि यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों के बेहतर उपयोग का एक प्रभावी मॉडल बनकर उभर रही है और पंचायतों की आय में लगातार वृद्धि हो रही है।

--- राष्ट्र प्रेस

विकेटी/वीसी

संपादकीय दृष्टिकोण

जो न केवल स्वच्छता को बढ़ावा देती है, बल्कि आर्थिक स्थिरता भी लाती है। बायोगैस संयंत्रों के माध्यम से पंचायतों को साधन और संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का अवसर मिला है।
RashtraPress
20 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गोबरधन योजना का उद्देश्य क्या है?
गोबरधन योजना का उद्देश्य गोबर और जैविक कचरे से ऊर्जा और खाद का उत्पादन करना है, जिससे स्वच्छता और आर्थिक विकास संभव हो सके।
बायोगैस संयंत्र किस प्रकार काम करते हैं?
बायोगैस संयंत्रों में गोबर, रसोई का कचरा और कृषि अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाता है, जिससे बायोगैस और जैविक खाद तैयार होती है।
इस योजना से पंचायतों को कितनी आय हुई है?
फरवरी 2026 तक पंचायतों ने जैविक खाद और अन्य उत्पादों की बिक्री से 28 लाख रुपए से अधिक की आय अर्जित की है।
गोबरधन योजना का पर्यावरण पर क्या प्रभाव है?
यह योजना पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देती है और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग से प्रदूषण कम होता है।
क्या यह योजना रोजगार सृजन में मदद करती है?
हां, बायोगैस संयंत्रों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित हो रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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