गुजरात का 'बनास बायो-सीएनजी' मॉडल: कचरे से धन और ग्रामीण समृद्धि का एक नया मानक
सारांश
Key Takeaways
- कचरे से धन: गोबर को स्वच्छ ऊर्जा में बदलना।
- ग्रामीण समृद्धि: स्थानीय परिवारों को आर्थिक लाभ।
- पर्यावरण संरक्षण: ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी।
- स्वच्छ ऊर्जा: ऊर्जा का स्थायी स्रोत।
- अन्य राज्यों के लिए प्रेरणा: मॉडल का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार।
गांधीनगर, 26 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वेस्ट टू वेल्थ’, आत्मनिर्भर भारत और हरित ऊर्जा के दृष्टिकोण को वास्तविकता में बदलते हुए गुजरात का विकास मॉडल अब एक सफल राष्ट्रीय उदाहरण बनकर उभरा है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के निर्देशन में विकसित बनास बायो-सीएनजी प्लांट मॉडल को केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय और केंद्रीय सहकारिता विभाग के संयुक्त प्रयासों से देश के लगभग 15 राज्यों में लागू करने की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।
बनास डेयरी द्वारा विकसित यह प्रोजेक्ट पारंपरिक अपशिष्ट जैसे गोबर को स्वच्छ ईंधन और जैविक उर्वरक में परिवर्तित करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा में एक नई राह प्रशस्त कर रहा है।
गुजरात सरकार ने इस अभिनव पहल की व्यापक संभावनाओं को देखते हुए बायो-सीएनजी क्षेत्र को अपनी बजटीय प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य सरकार ने सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों के लिए नए प्लांट स्थापित करने हेतु 60 करोड़ रुपए का विशेष प्रावधान किया है। यह बजटीय सहायता डेयरी क्षेत्र को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का केंद्र बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में है। उल्लेखनीय है कि इस योजना के तहत राज्य में चरणबद्ध तरीके से लगभग 10 बायो-सीएनजी प्लांट स्थापित करने की योजना प्रस्तावित है।
बनासकांठा में 40 मीट्रिक टन प्रतिदिन गोबर प्रसंस्करण क्षमता वाला बनास बायो-सीएनजी प्लांट पिछले 6 वर्षों से सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है। इसकी सफलता से प्रेरित होकर बनासकांठा में 5 बड़े बायो-सीएनजी प्लांट्स की स्थापना पर काम चल रहा है। वर्तमान में, 5 प्लांट्स में से 2 संयंत्रों ने परिचालन शुरू कर दिया है, जबकि तीसरा प्लांट अपने निर्माण के अंतिम चरण में है।
प्रत्येक प्लांट प्रतिदिन लगभग 100 मीट्रिक टन (1 लाख किलो) गोबर को वैज्ञानिक पद्धति से प्रोसेस करता है। लगभग 50-55 करोड़ रुपए की निवेश लागत से निर्मित यह संयंत्र आधुनिक तकनीक और इन्फ्रास्ट्रक्चर का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो प्रदर्शित करता है कि कैसे इकोलॉजी और इकोनॉमी दोनों एक साथ चल सकते हैं, और कैसे पर्यावरण संरक्षण, किसानों की समृद्धि और औद्योगिक प्रगति तीनों एक साथ संभव हैं।
बनासकांठा में स्थापित बायो-सीएनजी संयंत्रों से जुड़े लगभग 20 किलोमीटर के आसपास 20-25 गांवों के पशुपालक परिवार नियमित रूप से गोबर की आपूर्ति कर रहे हैं। किसानों को गोबर के बदले 1 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से भुगतान किया जा रहा है, जिससे अनुमानित 400-450 पशुपालक परिवारों को अतिरिक्त आय हो रही है। गोबर संग्रहण और परिवहन के लिए लगभग 13 ट्रैक्टर-ट्रॉली का उपयोग हो रहा है, जो लगभग 4-4 मीट्रिक टन प्रति ट्रिप क्षमता के साथ गोबर को संयंत्र तक पहुंचाती हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल रहा है।
यह संयंत्र बहु-उत्पाद आधारित आर्थिक मॉडल पर कार्य करता है, जिसके अंतर्गत प्रतिदिन लगभग 1,800 किलोग्राम कंप्रेस्ड बायोगैस (सीएनजी) का उत्पादन होता है, जिसे बाजार में करीब 75 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जाता है। इसके साथ ही, लगभग 25 मीट्रिक टन ठोस जैविक उर्वरक और 75 मीट्रिक टन तरल जैविक उर्वरक का उत्पादन भी होता है, जिन्हें क्रमशः लगभग 6 रुपए प्रति किलोग्राम और 0.50 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जाता है। इन तीनों उत्पादों से संयंत्र को प्रतिदिन लगभग 3 लाख रुपए से अधिक का राजस्व प्राप्त होता है, जो वार्षिक रूप से करीब 12 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
गुजरात की यह अभिनव परियोजना न केवल ऊर्जा क्षेत्र में, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक क्रांतिकारी कदम है। यह मॉडल प्रतिवर्ष लगभग 6,750 टन सीओ2 ई (कार्बन डाइऑक्साइड इक्विवेलेंट) ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की क्षमता रखता है, जो जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती के खिलाफ गुजरात की बड़ी भागीदारी को दर्शाता है। स्वच्छ ईंधन का उत्पादन, रसायनों से मुक्त जैविक उर्वरक की उपलब्धता और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन का यह त्रिकोणीय संगम ‘ग्रीन बनासकांठा’ से होते हुए ‘ग्रीन गुजरात’ के व्यापक संकल्प को हकीकत में बदल रहा है।