दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की पुलिस अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई निरस्त की, 'फंक्टस ऑफिशियो' सिद्धांत लागू

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दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की पुलिस अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई निरस्त की, 'फंक्टस ऑफिशियो' सिद्धांत लागू

सारांश

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत याचिका निपटाने के बाद ट्रायल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है — वह पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय जांच के आदेश नहीं दे सकता। यह फैसला न्यायिक मर्यादा और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की रक्षा में एक अहम नज़ीर है।

मुख्य बातें

दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 मई 2026 को ट्रायल कोर्ट द्वारा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश निरस्त किए।
न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने कहा कि अग्रिम जमानत याचिका निपटाने के बाद एएसजे 'फंक्टस ऑफिशियो' हो जाता है — आगे हस्तक्षेप का अधिकार नहीं रहता।
इंस्पेक्टर ऐश्वर सिंह और पूर्व एसएचओ ज्ञानेंद्र राणा की याचिकाएं स्वीकार की गईं; प्रतिकूल टिप्पणियां भी रद्द।
मूल मामला जून 2019 में छावला थाना में दर्ज नाबालिग लड़की के अपहरण की एफआईआर से जुड़ा था, जिसमें बाद में पॉक्सो एक्ट भी जोड़ा गया।
हाईकोर्ट ने फैसले की प्रति दिल्ली के सभी जिला न्यायाधीशों को भेजने का निर्देश दिया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 मई 2026 को एक अहम फैसले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) द्वारा पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध जारी विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई की निगरानी के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत याचिका का निपटारा हो जाने के बाद ट्रायल कोर्ट 'फंक्टस ऑफिशियो' हो जाता है — यानी उसके पास उस मामले में आगे कोई अधिकार क्षेत्र शेष नहीं रहता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह प्रकरण जून 2019 में छावला थाना क्षेत्र में दर्ज एक एफआईआर से उपजा है, जिसमें एक नाबालिग लड़की के लापता होने पर आईपीसी धारा 363 के तहत मामला दर्ज किया गया था। पीड़िता के मिलने और बयान दर्ज होने के बाद आईपीसी धारा 328 व 376 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 4 भी मामले में जोड़ी गईं।

सह-आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान एएसजे ने जांच में देरी पर स्पष्टीकरण मांगा और तत्कालीन जांच अधिकारियों तथा एसएचओ को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का आदेश दिया। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने इंस्पेक्टर ऐश्वर सिंह, इंस्पेक्टर ज्ञानेंद्र राणा और अन्य पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय जांच के आदेश दिए तथा डीसीपी और एसीपी स्तर के अधिकारियों से भी जवाब तलब किया।

हाईकोर्ट का फैसला

न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने इंस्पेक्टर ऐश्वर सिंह और पूर्व एसएचओ ज्ञानेंद्र राणा की याचिकाएं स्वीकार करते हुए कहा कि अग्रिम जमानत आवेदन के निपटारे के बाद एएसजे के समक्ष कोई भी मामला लंबित नहीं बचा था। अदालत ने अपने फैसले में कहा, 'जमानत याचिका पर सुनवाई करते समय अदालत किसी भी परिस्थिति में अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती जो उसके दायरे में नहीं आते।'

न्यायालय ने यह भी कहा, 'विभागीय जांच के आदेश देना, उसकी निगरानी करना और अधिकारियों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां करना पूरी तरह अनुचित और कानूनन अस्वीकार्य था, खासकर तब जब संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष तक नहीं सुना गया।'

याचिकाकर्ताओं के तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दयान कृष्णन और गौतम नारायण ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई न्यायिक अतिक्रमण थी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है। उनका तर्क था कि अधिकारियों को सुनवाई का अवसर दिए बिना उनके विरुद्ध प्रतिकूल टिप्पणियां की गईं, जो कानूनी दृष्टि से अस्वीकार्य है। दिल्ली पुलिस ने भी याचिकाकर्ताओं के पक्ष का समर्थन करते हुए कहा कि अग्रिम जमानत याचिका के निपटारे के बाद ट्रायल कोर्ट को विभागीय कार्रवाई की निगरानी का अधिकार नहीं था।

न्यायिक मर्यादा पर महत्वपूर्ण टिप्पणी

न्यायमूर्ति बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक अदालतों को जांच अधिकारियों की 'अनावश्यक आलोचना' से बचना चाहिए और जांच के दौरान पुलिस के सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया कि न्यायिक आदेशों में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों का सरकारी कर्मचारियों के करियर और प्रतिष्ठा पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

आगे क्या होगा

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के समस्त आदेश, संबंधित कार्यवाहियां और प्रतिकूल टिप्पणियां निरस्त कर दीं। साथ ही इस फैसले की प्रति दिल्ली के सभी जिला न्यायाधीशों को भेजने का निर्देश दिया, ताकि अग्रिम जमानत याचिकाओं की सुनवाई करते समय अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का पालन सुनिश्चित हो सके। यह फैसला देशभर की निचली अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर ही नहीं मिलता। सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस विषय पर दिशानिर्देश दे चुका है, फिर भी ऐसे मामले सामने आते रहते हैं — जो दर्शाता है कि न्यायिक प्रशिक्षण और जागरूकता में अभी भी अंतर है। दिल्ली के सभी जिला न्यायाधीशों को फैसला भेजने का निर्देश इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है, लेकिन असली परिवर्तन तब होगा जब इसे व्यवस्थागत रूप से लागू किया जाए।
RashtraPress
21 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई क्यों रद्द की?
हाईकोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत याचिका का निपटारा होने के बाद ट्रायल कोर्ट 'फंक्टस ऑफिशियो' हो जाता है, यानी उसके पास उस मामले में आगे कोई अधिकार क्षेत्र नहीं बचता। ऐसे में पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय जांच के आदेश देना और उसकी निगरानी करना कानूनन अस्वीकार्य था।
'फंक्टस ऑफिशियो' का क्या अर्थ है और यह यहाँ कैसे लागू हुआ?
'फंक्टस ऑफिशियो' एक कानूनी सिद्धांत है जिसके तहत किसी अधिकारी या न्यायाधीश का अधिकार क्षेत्र उसके कर्तव्य की पूर्ति के बाद समाप्त हो जाता है। इस मामले में जैसे ही एएसजे ने अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला सुनाया, वे उस प्रकरण में आगे कोई आदेश जारी करने के अधिकार में नहीं रहे।
मूल मामला किससे जुड़ा था और पुलिस अधिकारियों पर क्या आरोप थे?
मूल मामला जून 2019 में छावला थाना क्षेत्र में एक नाबालिग लड़की के लापता होने से जुड़ा था। जांच में देरी को लेकर ट्रायल कोर्ट ने इंस्पेक्टर ऐश्वर सिंह, इंस्पेक्टर ज्ञानेंद्र राणा और अन्य अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय जांच के आदेश दिए थे।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन कैसे हुआ?
वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी किए बिना और उनका पक्ष सुने बिना उनके विरुद्ध प्रतिकूल टिप्पणियां की गईं। हाईकोर्ट ने इस दलील से सहमति जताई और कहा कि यह प्राकृतिक न्याय के मूलभूत सिद्धांत 'सुनवाई का अधिकार' का स्पष्ट उल्लंघन था।
इस फैसले का भविष्य में अदालतों पर क्या असर पड़ेगा?
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस फैसले की प्रति दिल्ली के सभी जिला न्यायाधीशों को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि अग्रिम जमानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का पालन हो। यह फैसला देशभर की निचली अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक नज़ीर बन सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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