सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: झारखंड सरकार की याचिका खारिज, ईडी अधिकारियों के खिलाफ FIR की CBI जांच जारी रहेगी
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल 2025 को झारखंड सरकार की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।
- जस्टिस एमएम सुंदरेश्वर और जस्टिस एन कोटीश्वर सिंह की खंडपीठ ने CBI जांच पर स्थगन देने से इनकार किया।
- झारखंड हाईकोर्ट ने 11 मार्च 2025 को ईडी अधिकारियों के खिलाफ FIR की जांच CBI को सौंपी थी।
- विवाद की शुरुआत संतोष कुमार की शिकायत से हुई, जिन्होंने 12 जनवरी 2025 को ईडी पूछताछ के दौरान मारपीट का आरोप लगाया था।
- रांची पुलिस ने ईडी कार्यालय में छापेमारी की थी, जिसे ईडी ने अवैध हस्तक्षेप बताया था।
- अब CBI इस पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करेगी, जिसका असर केंद्र-राज्य संबंधों पर भी पड़ सकता है।
नई दिल्ली/रांची, 24 अप्रैल 2025 — सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार को बड़ा झटका देते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जांच पर रोक लगाने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज करते हुए झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने क्या कहा
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2025 को जस्टिस एमएम सुंदरेश्वर और जस्टिस एन कोटीश्वर सिंह की खंडपीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई। झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने पक्ष रखा और हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सीबीआई जांच पर तत्काल स्थगन की मांग की।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस अनुरोध को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट कर दिया कि सीबीआई जांच निर्बाध रूप से जारी रहेगी। यह फैसला झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार के लिए न केवल कानूनी, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बड़ा झटका माना जा रहा है।
विवाद की जड़: संतोष कुमार की शिकायत और ईडी छापेमारी
इस पूरे विवाद की शुरुआत पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के कर्मचारी संतोष कुमार की एक शिकायत से हुई थी। मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी संतोष कुमार ने आरोप लगाया था कि 12 जनवरी 2025 को रांची स्थित ईडी कार्यालय में पूछताछ के दौरान अधिकारियों ने उसके साथ मारपीट की और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।
इस शिकायत के आधार पर रांची के एयरपोर्ट थाने में ईडी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। इसके बाद रांची पुलिस ने ईडी कार्यालय पहुंचकर छापेमारी जैसी सक्रियता दिखाई, जिसने देशभर में हलचल मचा दी और केंद्र-राज्य संघर्ष को नई धार दे दी।
झारखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश
ईडी ने झारखंड पुलिस की इस कार्रवाई को केंद्रीय एजेंसी के कामकाज में अवैध हस्तक्षेप और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए झारखंड हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की थी। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने 11 मार्च 2025 को अपने फैसले में कहा कि मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जांच सीबीआई को सौंपी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने न केवल झारखंड पुलिस की जांच पर रोक लगाई, बल्कि ईडी कार्यालय की सुरक्षा की जिम्मेदारी अर्धसैनिक बलों को सौंपने का भी निर्देश दिया था। यह आदेश राज्य सरकार और केंद्रीय एजेंसी के बीच टकराव की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण था।
गहरा विश्लेषण: केंद्र-राज्य टकराव और बड़ी तस्वीर
यह मामला महज एक एफआईआर और सीबीआई जांच तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक पैटर्न का हिस्सा है जिसमें विपक्ष-शासित राज्य सरकारें केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाइयों को राजनीतिक प्रतिशोध बताती हैं, जबकि केंद्र इसे कानून के शासन की रक्षा का नाम देता है।
गौरतलब है कि झारखंड में हेमंत सोरेन स्वयं ईडी की जांच का सामना कर चुके हैं और एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जमानत पर रिहा हुए थे। ऐसे में जब राज्य पुलिस ने ईडी कार्यालय में ही छापेमारी की, तो इसे कई विश्लेषकों ने केंद्रीय एजेंसी को संदेश देने की कोशिश के रूप में देखा।
यह भी उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन राज्य सरकारों के लिए एक मिसाल बन सकता है जो केंद्रीय एजेंसियों की जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की कोशिश करती हैं। न्यायपालिका ने स्पष्ट संकेत दिया है कि संघीय ढांचे में केंद्रीय एजेंसियों की स्वायत्तता की रक्षा की जाएगी।
आगे क्या होगा
अब सीबीआई इस मामले में पूरी तरह स्वतंत्र रूप से जांच करेगी। ईडी अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सत्यता परखी जाएगी और यह भी जांचा जाएगा कि रांची पुलिस की कार्रवाई वैधानिक थी या नहीं। इस पूरे प्रकरण का नतीजा न केवल झारखंड बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी केंद्र-राज्य संबंधों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।