पॉश कानून पर बड़ा फैसला: दिल्ली हाईकोर्ट बोला — अलग जांच कमेटी बनाना गैरकानूनी

Click to start listening
पॉश कानून पर बड़ा फैसला: दिल्ली हाईकोर्ट बोला — अलग जांच कमेटी बनाना गैरकानूनी

सारांश

दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि पॉश कानून एक संपूर्ण संहिता है और विश्वविद्यालय-कॉलेज ICC के समानांतर अलग जांच समिति नहीं बना सकते। DU की फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी को अवैध ठहराया गया। रामानुजन कॉलेज प्रिंसिपल का सस्पेंशन आदेश भी रद्द।

Key Takeaways

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने 26 अप्रैल 2025 को फैसला दिया कि पॉश एक्ट एक संपूर्ण कानून है और इसके बाहर अलग जांच समिति नहीं बनाई जा सकती।
  • रामानुजन कॉलेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर रसल सिंह का सस्पेंशन आदेश अदालत ने रद्द किया — कारण: आदेश में इस्तेमाल भाषा बदनाम करने वाली थी।
  • दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा ICC से पहले बनाई गई फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी को हाईकोर्ट ने अवैध करार दिया।
  • कोर्ट ने कहा कि संस्था जांच के दौरान कर्मचारी को सस्पेंड कर सकती है, लेकिन प्रक्रिया और भाषा कानूनसम्मत होनी चाहिए।
  • जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने यह फैसला सुनाया और रामानुजन कॉलेज को उचित प्रक्रिया से नया सस्पेंशन आदेश जारी करने की अनुमति दी।
  • यह फैसला देशभर के शैक्षणिक संस्थानों और कार्यस्थलों पर पॉश कानून के सही क्रियान्वयन के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।

नई दिल्ली, 26 अप्रैल 2025। दिल्ली हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न निवारण कानून (पॉश एक्ट) पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय और कॉलेज इस कानून के समानांतर अपनी अलग जांच समिति नहीं बना सकते। कोर्ट ने कहा कि पॉश कानून अपने आप में एक संपूर्ण विधि-संहिता है और इसके बाहर जाकर कोई भी जांच प्रक्रिया अपनाना कानून की मूल भावना के विरुद्ध है।

मामले की पृष्ठभूमि

रामानुजन कॉलेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर रसल सिंह ने अपने सस्पेंशन आदेश और दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) द्वारा गठित एक अस्थायी जांच समिति को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। यह समिति यौन उत्पीड़न की शिकायतों की प्रारंभिक जांच के लिए बनाई गई थी। जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की।

शिकायत मिलने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय ने मामले को इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) के पास भेजने से पहले एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी का गठन किया था। यही वह कदम था जिसे हाईकोर्ट ने गैरकानूनी करार दिया।

सस्पेंशन आदेश रद्द, लेकिन अधिकार बरकरार

दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रोफेसर रसल सिंह के विरुद्ध जारी सस्पेंशन आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट का कहना था कि सस्पेंड करने का अधिकार संस्था के पास है, परंतु उस आदेश में प्रयुक्त भाषा — जैसे 'गंभीर गलत व्यवहार और उत्पीड़न' — जांच पूरी होने से पहले ही आरोपी की छवि को नुकसान पहुंचाती है, जो कानूनी दृष्टि से अमान्य है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पॉश एक्ट में जांच के दौरान सस्पेंशन का सीधा उल्लेख न होने के बावजूद, संस्था अपने प्रशासनिक अधिकार के तहत यह कदम उठा सकती है। हालांकि, इसके लिए भाषा और प्रक्रिया कानूनसम्मत होनी चाहिए।

रामानुजन कॉलेज को अदालत ने यह अनुमति दी कि वह उचित भाषा और प्रक्रिया के साथ नया सस्पेंशन आदेश जारी कर सकता है।

पॉश कानून क्यों है संपूर्ण संहिता

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न निवारण अधिनियम, 2013 (POSH Act) में शिकायत से लेकर जांच और कार्रवाई तक की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट रूप से निर्धारित है। इसलिए किसी भी संस्था को इस कानून के बाहर जाकर अपनी समानांतर जांच व्यवस्था बनाने का अधिकार नहीं है।

अदालत ने चेतावनी दी कि अलग से बनाई गई जांच समितियां गोपनीयता का उल्लंघन कर सकती हैं, निष्पक्ष जांच को प्रभावित कर सकती हैं और पीड़ित व आरोपी दोनों के अधिकारों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। यह कानून का उद्देश्य ही नष्ट कर देता है।

व्यापक प्रभाव और विश्लेषण

यह फैसला केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। देशभर के शैक्षणिक संस्थान, सरकारी विभाग और निजी कंपनियां अक्सर ICC को दरकिनार कर अनौपचारिक जांच समितियां बना लेती हैं। यह फैसला उन सभी के लिए एक स्पष्ट संदेश है।

गौरतलब है कि पॉश कानून 2013 में बना था, लेकिन एक दशक बाद भी इसके क्रियान्वयन में गंभीर खामियां देखी जाती हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग और विभिन्न श्रम संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, बड़ी संख्या में संस्थाओं में ICC या तो बनी ही नहीं है या निष्क्रिय है। ऐसे में जब संस्थाएं ICC के बजाय अपनी मनमानी समितियां बनाती हैं, तो शिकायतकर्ता को न्याय मिलने की संभावना और कम हो जाती है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में जागरूकता बढ़ी है और #MeToo आंदोलन के बाद शैक्षणिक संस्थानों में भी कई शिकायतें सामने आई हैं। न्यायालय का यह निर्देश पीड़ितों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करेगा।

आगे देखें तो यह फैसला सुप्रीम कोर्ट में भी उद्धृत हो सकता है और केंद्र सरकार को पॉश एक्ट के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नए दिशानिर्देश जारी करने पर विचार करना पड़ सकता है।

Point of View

उसे एक दशक बाद भी संस्थाएं अपनी सुविधा के अनुसार तोड़-मरोड़ रही हैं। यह फैसला केवल एक प्रोफेसर के लिए नहीं, बल्कि उन हजारों शिकायतकर्ताओं के लिए मिसाल है जिनकी शिकायतें ICC तक पहुंचने से पहले ही दबा दी जाती हैं। अब जरूरत है कि केंद्र सरकार और UGC इस फैसले के आधार पर सभी शैक्षणिक संस्थानों में ICC की सक्रियता सुनिश्चित करें।
NationPress
26/04/2026

Frequently Asked Questions

दिल्ली हाईकोर्ट ने पॉश कानून पर क्या फैसला दिया?
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पॉश कानून एक संपूर्ण विधि-संहिता है और विश्वविद्यालय या कॉलेज इसके बाहर जाकर यौन उत्पीड़न की जांच के लिए अलग समिति नहीं बना सकते। यौन उत्पीड़न के मामलों की जांच केवल कानून के तहत गठित ICC ही करेगी।
रामानुजन कॉलेज प्रिंसिपल का सस्पेंशन आदेश क्यों रद्द हुआ?
दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रोफेसर रसल सिंह का सस्पेंशन आदेश इसलिए रद्द किया क्योंकि उसमें 'गंभीर गलत व्यवहार और उत्पीड़न' जैसे शब्दों का इस्तेमाल जांच पूरी होने से पहले ही किया गया था, जो बदनाम करने वाला और कानूनी रूप से अमान्य था।
क्या संस्था यौन उत्पीड़न के आरोप में कर्मचारी को सस्पेंड कर सकती है?
हां, दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संस्था के पास जांच के दौरान कर्मचारी को सस्पेंड करने का प्रशासनिक अधिकार है, भले ही पॉश कानून में इसका सीधा उल्लेख न हो। लेकिन सस्पेंशन आदेश की भाषा निष्पक्ष और कानूनसम्मत होनी चाहिए।
पॉश कानून के तहत फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाना क्यों गलत है?
पॉश कानून में शिकायत सीधे ICC को भेजने का प्रावधान है। ICC से पहले अलग फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाना कानून की प्रक्रिया का उल्लंघन है और इससे गोपनीयता, निष्पक्षता और पीड़ित के अधिकार प्रभावित होते हैं।
इस फैसले का देश के अन्य संस्थानों पर क्या असर होगा?
यह फैसला देशभर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, सरकारी विभागों और निजी कंपनियों के लिए एक स्पष्ट दिशानिर्देश है कि वे पॉश कानून की प्रक्रिया का पालन करें और ICC को सक्रिय रखें। समानांतर जांच समितियां बनाना अब कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।
Nation Press