बड़ा फैसला: तेलंगाना राज्यपाल ने अजहरुद्दीन और कोडंडाराम को एमएलसी नामित किया

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बड़ा फैसला: तेलंगाना राज्यपाल ने अजहरुद्दीन और कोडंडाराम को एमएलसी नामित किया

सारांश

तेलंगाना राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला ने मंत्री अजहरुद्दीन और प्रो. कोडंडाराम को एमएलसी नामित किया। 30 अप्रैल की संवैधानिक समयसीमा से ठीक पहले यह फैसला कांग्रेस सरकार के लिए बड़ी राहत है, हालांकि नामांकन सर्वोच्च न्यायालय में लंबित अपीलों के अधीन रहेगा।

Key Takeaways

  • राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला ने 26 अप्रैल 2026 को मोहम्मद अजहरुद्दीन और प्रोफेसर कोडंडाराम को तेलंगाना विधान परिषद सदस्य नामित किया।
  • अजहरुद्दीन के पास 30 अप्रैल 2026 तक विधायिका का सदस्य बनने की संवैधानिक समयसीमा थी, जो अब पूरी हो गई।
  • यह नामांकन डी. राजेश्वर राव और फारूक हुसैन के स्थान पर किया गया, जिनका कार्यकाल 27 मई 2023 को समाप्त हुआ था।
  • तेलंगाना मंत्रिमंडल ने 30 अगस्त 2025 को इन नामांकनों की सिफारिश की थी, जो करीब आठ महीने बाद मंजूर हुई।
  • नामांकन सर्वोच्च न्यायालय में लंबित अपीलों के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा, कानूनी अनिश्चितता बनी हुई है।
  • मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने 19 अप्रैल 2026 को राज्यपाल से मुलाकात कर इन नामांकनों की मंजूरी का अनुरोध किया था।

हैदराबाद, 26 अप्रैल: तेलंगाना के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला ने रविवार को राज्यपाल कोटे के अंतर्गत अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहम्मद अजहरुद्दीन और प्रोफेसर एम. कोडंडाराम को तेलंगाना विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य के रूप में नामित किया। यह नामांकन कांग्रेस सरकार के लिए बड़ी राहत है, क्योंकि अजहरुद्दीन के पास मंत्री पद बचाए रखने के लिए 30 अप्रैल 2026 तक विधायिका का सदस्य बनना संवैधानिक रूप से अनिवार्य था।

नामांकन की पृष्ठभूमि और संवैधानिक बाध्यता

31 अक्टूबर 2025 को मंत्री पद की शपथ लेने वाले मोहम्मद अजहरुद्दीन के लिए भारतीय संविधान की व्यवस्था के अनुसार शपथ ग्रहण की तारीख से छह माह के भीतर विधानमंडल का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। यदि वे 30 अप्रैल 2026 तक एमएलसी या विधायक नहीं बनते, तो उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ता। राज्यपाल के इस फैसले ने उस संवैधानिक संकट को टाल दिया है।

राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि यह नामांकन इस विषय पर लंबित सभी अपीलों के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा। दोनों नेताओं को डी. राजेश्वर राव और फारूक हुसैन के स्थान पर नामित किया गया है, जिनका कार्यकाल 27 मई 2023 को समाप्त हो गया था।

मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की पहल और सर्वोच्च न्यायालय का रुख

मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने 19 अप्रैल 2026 को स्वयं राज्यपाल से मुलाकात कर दोनों नामांकनों को मंजूरी देने का अनुरोध किया था। उन्होंने बताया था कि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में इस मामले में कोई आपत्ति नहीं जताई और राज्य सरकार राज्यपाल से स्वीकृति लेने के लिए स्वतंत्र है।

तेलंगाना मंत्रिमंडल ने 30 अगस्त 2025 को राज्यपाल कोटे के तहत परिषद में नामांकन के लिए अजहरुद्दीन और कोडंडाराम के नामों की सिफारिश राज्यपाल को भेजी थी। करीब आठ महीने बाद यह मंजूरी मिली, जो इस प्रक्रिया की जटिलता को दर्शाती है।

सर्वोच्च न्यायालय की रोक और कानूनी पेचीदगियां

भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के नेताओं दासोजू श्रवण और कुर्रा सत्यनारायण ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर राज्य सरकार द्वारा किए गए पूर्व मनोनीतियों को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि ये नियुक्तियां सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेशों का उल्लंघन करती हैं।

गौरतलब है कि 2024 में कोडंडाराम और आमिर अली खान ने एमएलसी के रूप में शपथ ली थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी नियुक्ति पर रोक लगाते हुए स्पष्ट किया था कि राज्यपाल कोटे के तहत की गई कोई भी नियुक्ति चल रही कानूनी कार्रवाई के परिणाम के अधीन होगी। इसी के बाद अगस्त 2024 में मंत्रिमंडल ने पुनः राज्यपाल को सिफारिश भेजी थी।

अजहरुद्दीन: क्रिकेट से राजनीति तक का सफर

मोहम्मद अजहरुद्दीन भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान हैं, जो बाद में राजनीति में आए और कांग्रेस पार्टी से जुड़े। तेलंगाना में कांग्रेस सरकार बनने के बाद उन्हें अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री बनाया गया था। उनका एमएलसी नामांकन पार्टी के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे अल्पसंख्यक समुदाय में कांग्रेस की पकड़ मजबूत होती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि प्रोफेसर कोडंडाराम तेलंगाना राज्य आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक रहे हैं और उनका नामांकन सरकार के लिए राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की दृष्टि से अहम माना जा रहा है।

आगे क्या होगा?

चूंकि यह नामांकन सर्वोच्च न्यायालय में लंबित अपीलों के अंतिम निर्णय के अधीन है, इसलिए कानूनी अनिश्चितता अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। बीआरएस इस नामांकन को भी न्यायालय में चुनौती दे सकती है। अब सबकी नजरें सर्वोच्च न्यायालय के अगले सुनवाई पर होंगी, जो यह तय करेगी कि ये नामांकन स्थायी रूप से वैध रहेंगे या नहीं।

Point of View

बल्कि राज्यपाल-सरकार संबंधों की जटिलता और न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका का जीवंत उदाहरण है। विडंबना यह है कि एक पूर्व क्रिकेट कप्तान को मंत्री पद बचाने के लिए संवैधानिक दौड़ लगानी पड़ी, जो राजनीतिक नियुक्तियों की प्रक्रिया पर सवाल उठाती है। बीआरएस की याचिका और सर्वोच्च न्यायालय की शर्त यह दिखाती है कि राज्यपाल कोटा अब विपक्षी दलों के लिए कानूनी हथियार बन चुका है — और यह प्रवृत्ति केवल तेलंगाना तक सीमित नहीं है।
NationPress
28/04/2026

Frequently Asked Questions

तेलंगाना राज्यपाल ने किसे एमएलसी नामित किया?
तेलंगाना के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला ने 26 अप्रैल 2026 को मंत्री मोहम्मद अजहरुद्दीन और प्रोफेसर एम. कोडंडाराम को राज्यपाल कोटे के तहत विधान परिषद सदस्य नामित किया। यह नामांकन डी. राजेश्वर राव और फारूक हुसैन के स्थान पर किया गया है।
अजहरुद्दीन के लिए एमएलसी नामांकन इतना जरूरी क्यों था?
31 अक्टूबर 2025 को मंत्री पद की शपथ लेने वाले अजहरुद्दीन को संविधान के अनुसार छह महीने के भीतर यानी 30 अप्रैल 2026 तक विधायिका का सदस्य बनना अनिवार्य था। ऐसा न होने पर उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ता।
क्या यह एमएलसी नामांकन सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है?
हां, राज्य सरकार की अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि यह नामांकन इस विषय पर लंबित सभी अपीलों के अंतिम निर्णय के अधीन है। बीआरएस नेता पहले भी ऐसी नियुक्तियों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे चुके हैं।
प्रोफेसर कोडंडाराम कौन हैं और उनका नामांकन क्यों हुआ?
प्रोफेसर एम. कोडंडाराम तेलंगाना राज्य आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक हैं। तेलंगाना मंत्रिमंडल ने अगस्त 2025 में उनके नाम की सिफारिश राज्यपाल कोटे के तहत एमएलसी नामांकन के लिए की थी, जिसे अब मंजूरी मिली है।
तेलंगाना में राज्यपाल कोटे से एमएलसी नामांकन का विवाद क्या है?
2024 में कोडंडाराम और आमिर अली खान की एमएलसी नियुक्ति पर सर्वोच्च न्यायालय ने बीआरएस नेताओं की याचिका पर रोक लगाई थी। न्यायालय ने कहा था कि राज्यपाल कोटे की कोई भी नियुक्ति चल रही कानूनी कार्रवाई के परिणाम के अधीन होगी।
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