ज्वाला गुट्टा का बड़ा आरोप: 'पद्म श्री नहीं मिला क्योंकि पीआर नहीं किया, रील्स नहीं बनाई'
सारांश
मुख्य बातें
भारत की पूर्व डबल्स बैडमिंटन स्टार ज्वाला गुट्टा ने 21 मई 2026 को भारतीय बैडमिंटन तंत्र पर तीखे आरोप लगाते हुए कहा कि इस पूरे सिस्टम में एकाधिकार, पक्षपात और खिलाड़ियों के दीर्घकालिक विकास को लेकर दूरदर्शिता की भारी कमी है। 14 बार की राष्ट्रीय चैंपियन और कॉमनवेल्थ गेम्स स्वर्ण पदक विजेता ने यह भी सवाल उठाया कि दशकों के योगदान के बावजूद उन्हें पद्म श्री से वंचित क्यों रखा गया है।
सिस्टम पर एकाधिकार का आरोप
गुट्टा ने कहा, 'पूरा सिस्टम ही एक समस्या है। इस पर पूरी तरह से एकाधिकार है। सब कुछ सिर्फ एक ही व्यक्ति तय करता है।' उन्होंने बताया कि वे पिछले चार वर्षों से अधिकारियों से अनुरोध कर रही हैं कि उनकी अकादमी के अंडर-13 और अंडर-15 खिलाड़ियों को राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविरों में शामिल किया जाए, लेकिन उन्हें लगातार नजरअंदाज किया गया। उनका तर्क था कि इन युवा खिलाड़ियों को सही मंच मिले तो वे भविष्य में भारत का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
गुट्टा के अनुसार, उनकी अकादमी से जुड़े खिलाड़ियों को संस्थागत स्तर पर 'विद्रोही' की छवि दे दी गई है। उन्होंने कहा, 'जो भी ज्वाला गुट्टा अकादमी में ट्रेनिंग लेता है, वह विद्रोही बन जाता है। उन्होंने मेरी ऐसी ही छवि बना रखी है।'
डबल्स बैडमिंटन में योगदान और उपेक्षा
गुट्टा ने रेखांकित किया कि भारत में डबल्स बैडमिंटन को पहचान दिलाने का श्रेय काफी हद तक उन्हीं को जाता है। उन्होंने कहा, 'अगर 2006 में मैंने कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल नहीं जीता होता, तो बैडमिंटन खिलाड़ियों को प्राथमिकता सूची में जगह नहीं मिलती। आज जूनियर खिलाड़ियों को जितने भी एक्सपोजर दौरे मिल रहे हैं, वे सब डबल्स खिलाड़ी के तौर पर मेरे द्वारा दिखाए गए रास्ते की ही देन हैं।'
यह ऐसे समय में आया है जब हाल के वर्षों में भारतीय डबल्स बैडमिंटन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय सफलताएँ हासिल की हैं, फिर भी गुट्टा का मानना है कि इस विधा को अभी भी वह तवज्जो नहीं मिल रही जिसकी वह हकदार है।
हैदराबाद अकादमी और आर्थिक संघर्ष
गुट्टा ने बताया कि हैदराबाद में उनकी अकादमी देश की सबसे बड़ी बैडमिंटन अकादमियों में से एक है — 50,000 वर्ग फुट में फैले 14 कोर्ट — जिसे उन्होंने बिना किसी संस्थागत सहयोग के खड़ा किया है। उन्होंने स्वीकार किया कि खेल मंत्रालय से सहयोग माँगने की शुरुआती कोशिशें भी बेनतीजा रहीं। उनके शब्दों में, 'मैंने शुरू में कोशिश की थी, लेकिन उनका रवैया बहुत अच्छा नहीं था। मेरी छवि अच्छी नहीं है।'
पद्म श्री और पीआर की राजनीति
गुट्टा ने अपनी सबसे बड़ी पीड़ा — पद्म श्री न मिलना — को लेकर बेबाकी से बात की। उन्होंने कहा, 'मुझे पद्म श्री क्यों नहीं मिल रहा है? क्योंकि मैंने पीआर नहीं किया, मैंने गरीबी और संघर्ष के बारे में रोना नहीं रोया, जबकि मैंने यह सब झेला है। मैंने कड़ी मेहनत की, मैंने 10 घंटे ट्रेनिंग की, लेकिन कोई इस पर यकीन नहीं करता।'
उन्होंने यह भी कहा कि बाहरी दिखावे को लेकर समाज की सोच महिला खिलाड़ियों के मूल्यांकन को प्रभावित करती है। उनके अनुसार, 'अगर मुझे अपने बालों को कलर करना और पेडीक्योर-मैनिक्योर करवाना पसंद है, तो इसका मतलब यह निकाला जाता है कि मैं एक गंभीर एथलीट नहीं हूं।' गुट्टा ने यह भी जोड़ा कि एक पुरुष और एक महिला खिलाड़ी के बीच का यह दोहरा मानदंड उनके करियर में बाधक रहा है।
आगे की राह
गुट्टा ने अपनी पीढ़ी की मानसिकता को रेखांकित करते हुए कहा, 'हम ऐसी पीढ़ी से आते हैं जहाँ हमारा मानना था कि अगर आप अच्छा प्रदर्शन करेंगे, तो बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा। अगर मुझे पता होता कि पीआर इतना जरूरी होता है, तो मैं गानों पर नाचती और रील्स बनाती।' उनका यह बयान भारतीय खेल जगत में मेरिट बनाम मीडिया-मैनेजमेंट की बहस को नए सिरे से खड़ा करता है। गौरतलब है कि यह बातचीत ऐसे समय में आई है जब भारत में खेल पुरस्कारों की चयन-प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठते रहे हैं।