क्या पद्म पुरस्कारों की अहमियत वास्तव में कम हो गई है? : उदित राज
सारांश
Key Takeaways
- पद्म पुरस्कार का महत्व घट रहा है।
- उदित राज का बयान राजनीतिक विवाद को जन्म दे सकता है।
- पुरस्कार सिर्फ राजनीति का साधन बनते जा रहे हैं।
- संविधान का उल्लंघन करने वालों को पुरस्कार देने पर सवाल उठाना जरूरी है।
- लोकतंत्र और संविधान की सुरक्षा पर ध्यान देना आवश्यक है।
नई दिल्ली, 26 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने पद्म पुरस्कारों की घोषणा की। भगत सिंह कोश्यारी को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है। इस पर कांग्रेस नेता उदित राज ने कहा कि इन पुरस्कारों की महत्वता में काफी कमी आई है।
राष्ट्र प्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा कि क्या अब ये पुरस्कार उन लोगों को दिए जा रहे हैं जो संविधान के खिलाफ हैं और जिन्होंने एक सरकार को गिराने का कार्य किया है। जब बिहार में चुनाव हो रहे थे, तभी अचानक यह ख्याल आया कि किसे भारत रत्न दिया जाना चाहिए और किसे कौन-सा पुरस्कार देना चाहिए। इन पुरस्कारों की महत्वता अब पहले जैसी नहीं रही है। 25 जनवरी की शाम को जब पद्म पुरस्कारों की घोषणा हो रही थी, तब भी इस पर चर्चा हो रही थी। अब इन पुरस्कारों का वह महत्व नहीं रह गया है।
उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार भगत सिंह कोश्यारी को दिया गया है, जिन्होंने संविधान का उल्लंघन किया है और एक सरकार को समाप्त करने का कार्य किया है। जो संविधान विरोधी हैं, क्या उन्हें पुरस्कार दिए जाएंगे। इसीलिए इन पुरस्कारों का महत्व बहुत कम हो गया है। इनका मकसद केवल राजनीतिक लाभ लेना है।
कांग्रेस नेता उदित राज ने कहा कि पद्म पुरस्कार को लेकर कार्ति चिदंबरम ने जो कहा है, वह बिल्कुल सही है।
पूर्व कांग्रेसी नेता शकील अहमद के बयान पर उदित राज ने कहा कि हमें संविधान और लोकतंत्र को बचाने की चुनौती का सामना करना है। मैंने भाजपा छोड़ दी है। शायद हर कोई अपनी मर्जी से नहीं छोड़ता। संघ नाराज था और नहीं चाहता था कि मैं चुनाव लड़ूं। उन्होंने मुझे प्रस्ताव दिया कि मैं लोकसभा चुनाव न लड़ूं। मैंने भाजपा छोड़ दी।
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का जिक्र करते हुए उदित राज ने कहा कि जब वे राष्ट्रपति नहीं बने थे, तो 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें उम्मीदवार के तौर पर तरजीह नहीं दी गई थी। 20 मई 2014 को जब मैं सांसद बना, तो वे खुद अपना बायोडाटा लेकर मेरे पास आए और भाजपा में सिफारिश करने का अनुरोध किया। जब वे राष्ट्रपति बन सकते थे, मैं भी बहुत कुछ बन सकता था। मुझे मंत्रालय का ऑफर भी मिला था।
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे समय में शकील अहमद को पार्टी नहीं छोड़नी चाहिए थी। भले ही मतभेद थे, लेकिन क्या सत्ता ही सब कुछ होती है? एक समय वे महासचिव थे, वरिष्ठ प्रवक्ता थे और दो मंत्रालयों के मंत्री रह चुके थे। और क्या चाहिए? मुझे लगता है कि उन्होंने ठीक नहीं किया।