ज्वाला गुट्टा का बड़ा खुलासा: 'वीके वर्मा ने मेरा करियर बर्बाद करने की कोशिश की, 2006 में बिना कारण टीम से निकाला'

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ज्वाला गुट्टा का बड़ा खुलासा: 'वीके वर्मा ने मेरा करियर बर्बाद करने की कोशिश की, 2006 में बिना कारण टीम से निकाला'

सारांश

ज्वाला गुट्टा ने BAI के पूर्व अध्यक्ष वीके वर्मा पर सीधा आरोप लगाया — 2006 में बिना कारण टीम से बाहर, रियो के बाद फिर किनारे, और 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में डबल्स गोल्ड की अनदेखी। बिना स्पॉन्सरशिप विश्व नंबर-5 बनने वाली गुट्टा का सवाल है — सही समर्थन मिलता तो क्या होता?

मुख्य बातें

ज्वाला गुट्टा ने BAI के पूर्व अध्यक्ष वीके वर्मा पर आरोप लगाया कि उन्होंने उनका करियर खत्म करने की कोशिश की।
2006 में गुट्टा को बिना किसी स्पष्टीकरण के भारतीय टीम से बाहर किया गया; रियो ओलंपिक्स के बाद दोबारा किनारे किया गया।
2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में अश्विनी पोनप्पा के साथ डबल्स गोल्ड जीतने के बावजूद उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा।
गुट्टा का दावा है कि बिना किसी आर्थिक सहयोग या स्पॉन्सरशिप के वह विश्व की नंबर-5 खिलाड़ी बनीं।
नीरज चोपड़ा का उदाहरण देते हुए उन्होंने खिलाड़ियों के लिए व्यक्तिगत निवेश और संस्थागत समर्थन की जरूरत पर जोर दिया।
गुट्टा ने कहा कि खेल जगत में आवाज़ उठाने के लिए अब राजनीति ही सबसे सीधा रास्ता है।

पूर्व भारतीय बैडमिंटन स्टार ज्वाला गुट्टा ने बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) के पूर्व अध्यक्ष वीके वर्मा पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि उन्होंने जानबूझकर उनके करियर को नष्ट करने की कोशिश की। 21 मई को दिए एक विशेष इंटरव्यू में गुट्टा ने कहा कि संस्थागत समर्थन और विवादों से दूरी मिलती, तो वह विश्व की नंबर-1 बैडमिंटन खिलाड़ी बन सकती थीं। 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स की गोल्ड मेडलिस्ट ने अपने करियर के दौरान झेली गई उपेक्षा और भेदभाव को खुलकर सामने रखा।

कॉमनवेल्थ गेम्स में भेदभाव का आरोप

2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने महिला डबल्स में गोल्ड जीता था — और उनके अनुसार, यह जीत साइना नेहवाल की सिंगल्स जीत से दो घंटे पहले हुई थी। गुट्टा ने कहा, 'अश्विनी और मैं गोल्ड जीतने वाली पहली खिलाड़ी थीं, क्योंकि हमने साइना से दो घंटे पहले खेला था।' उनका आरोप है कि जब साइना जीतीं, तो वर्मा कोर्ट पर दौड़कर आए और उनका जश्न मनाया, जबकि डबल्स जीत पर उन्होंने बेहद कम उत्साह दिखाया।

गुट्टा ने कहा, 'दो घंटे बाद, जब साइना जीतीं, तो वीके वर्मा कोर्ट पर दौड़कर आए और उनकी गोल्ड जीत का जश्न मनाया। हमारा गोल्ड कम क्यों था? उस दिन मैंने इंटरव्यू में कहा था कि वीके वर्मा इस बात से खुश नहीं हैं कि मैं जीती।'

बिना कारण टीम से बाहर किए जाने का दावा

गुट्टा ने कहा कि 2006 में वर्मा ने उन्हें बिना किसी स्पष्टीकरण के भारतीय टीम से बाहर कर दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि रियो ओलंपिक्स के बाद एक बार फिर उन्हें किनारे कर दिया गया। गुट्टा ने कहा, 'उन्होंने 2006 में मुझे टीम से बाहर निकाल दिया। कोई कारण नहीं बताया गया। यह सब रिकॉर्ड पर है। रियो ओलंपिक्स के बाद उन्होंने मुझे फिर से बाहर निकाल दिया। उसके बाद मैंने सोचा, लड़ने का क्या फायदा?'

गौरतलब है कि गुट्टा ने यह भी तर्क दिया कि टीम में रहकर वह जूनियर खिलाड़ियों को स्पैरिंग पार्टनर के रूप में फायदा पहुँचा सकती थीं। उनका कहना था, 'अगर मैं वहां रहूंगी, तो जूनियर खिलाड़ी मेरे साथ खेलेंगे, जिससे उन्हें अभ्यास में फायदा होगा। आप मुझे बाहर क्यों निकाल रहे हैं?'

बिना स्पॉन्सरशिप के विश्व नंबर-5 तक का सफर

गुट्टा ने दावा किया कि वह बिना किसी आर्थिक सहयोग या स्पॉन्सरशिप के विश्व की नंबर-5 बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं। उन्होंने कहा, 'बिना किसी सहयोग और बिना किसी आर्थिक मदद के, मैं दुनिया की नंबर-5 खिलाड़ी बनी। अगर मुझे सहयोग और स्पॉन्सर मिले होते, और अगर मुझे विवादों से दूर रखा गया होता, तो मैं दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी होती।'

उन्होंने ओलंपिक चैंपियन नीरज चोपड़ा का उदाहरण देते हुए कहा कि विश्व चैंपियन बनाने के लिए व्यक्तिगत ध्यान और निरंतर निवेश अनिवार्य है। गुट्टा के अनुसार, नीरज चोपड़ा पर किए गए निवेश से यह स्पष्ट होता है कि सही समर्थन मिले तो भारतीय खिलाड़ी शीर्ष पर पहुँच सकते हैं।

खेल और राजनीति पर ज्वाला का नजरिया

गुट्टा ने स्वीकार किया कि कोई भी खिलाड़ी जानबूझकर विवादों में नहीं पड़ना चाहता, लेकिन उन्हें अपने करियर की रक्षा के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने कहा, 'कौन-सा खिलाड़ी विवादों में पड़ना चाहता है? मुझे अपने हक के लिए लड़ना पड़ा। अगर मैं ऐसा नहीं करती, तो मेरा करियर बहुत पहले ही खत्म हो गया होता।'

उन्होंने यह भी कहा कि आज के खेल जगत में राजनीतिक प्रभाव ही तय करता है कि किसकी आवाज़ सुनी जाएगी। गुट्टा ने कहा, 'इसीलिए राजनेता बनना जरूरी है। अब अपनी बात साफ-साफ कहने का सबसे आसान तरीका राजनीति ही है, तब कोई भी आपको बागी नहीं कहेगा।' आगे चलकर वह भारतीय खेलों और जमीनी स्तर पर विकास में योगदान देने की इच्छा भी रखती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन जवाबदेही का तंत्र आज भी कमज़ोर है। 2006 में बिना कारण टीम से बाहर करने जैसी घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि प्रशासनिक मनमानी किस तरह प्रतिभाशाली खिलाड़ियों का करियर प्रभावित कर सकती है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इन व्यक्तिगत आरोपों को सनसनी के रूप में पेश करती है, लेकिन असली मुद्दा यह है कि BAI जैसी संस्थाओं में शिकायत निवारण का कोई स्वतंत्र और पारदर्शी ढाँचा है या नहीं। जब तक खिलाड़ियों को अपने हक के लिए राजनीति का सहारा लेना पड़े, तब तक खेल प्रशासन सुधार की बात अधूरी ही रहेगी।
RashtraPress
21 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ज्वाला गुट्टा ने वीके वर्मा पर क्या आरोप लगाए हैं?
ज्वाला गुट्टा ने दावा किया है कि BAI के पूर्व अध्यक्ष वीके वर्मा ने उनका करियर खत्म करने की कोशिश की — 2006 में बिना कारण टीम से बाहर किया और रियो ओलंपिक्स के बाद दोबारा किनारे किया। उन्होंने 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में डबल्स गोल्ड के प्रति भेदभावपूर्ण रवैये का भी आरोप लगाया।
2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में ज्वाला गुट्टा के साथ क्या हुआ था?
ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में महिला डबल्स का गोल्ड जीता था, जो साइना नेहवाल की सिंगल्स जीत से दो घंटे पहले हुआ था। गुट्टा का आरोप है कि वर्मा ने साइना की जीत का जोरदार जश्न मनाया, जबकि डबल्स जीत को नजरअंदाज किया।
ज्वाला गुट्टा विश्व रैंकिंग में कहाँ तक पहुँची थीं?
ज्वाला गुट्टा के अनुसार, बिना किसी आर्थिक सहयोग या स्पॉन्सरशिप के वह विश्व की नंबर-5 बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं। उनका मानना है कि उचित समर्थन मिलता तो वह विश्व नंबर-1 हो सकती थीं।
ज्वाला गुट्टा ने नीरज चोपड़ा का उदाहरण क्यों दिया?
गुट्टा ने नीरज चोपड़ा का उदाहरण यह समझाने के लिए दिया कि विश्व चैंपियन बनाने के लिए खिलाड़ी पर व्यक्तिगत ध्यान और निरंतर निवेश जरूरी है। उनके अनुसार, भारतीय बैडमिंटन में उन्हें यह सहयोग कभी नहीं मिला।
ज्वाला गुट्टा ने राजनीति का जिक्र क्यों किया?
गुट्टा ने कहा कि खेल जगत में राजनीतिक प्रभाव ही तय करता है कि किसकी बात सुनी जाएगी। उनके अनुसार, राजनेता बनने पर ही खिलाड़ी बिना 'बागी' कहलाए अपनी बात खुलकर कह सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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