पेसा प्रेरकों की सेवाएं बहाल करें: उमंग सिंघार ने CM मोहन यादव को लिखा पत्र
सारांश
मुख्य बातें
मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 21 मई 2026 को मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर मांग की है कि पंचायत उपबंध अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार अधिनियम 1996 (पेसा एक्ट) के क्रियान्वयन के लिए नियुक्त पेसा प्रेरकों की सेवाएं तत्काल बहाल की जाएं। राज्य सरकार द्वारा बजट आवंटन बंद कर इन प्रेरकों की सेवाएं समाप्त किए जाने के निर्णय को सिंघार ने आदिवासी हितों के विरुद्ध बताया है।
मुख्य घटनाक्रम
सिंघार ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि शिवराज सिंह चौहान सरकार के कार्यकाल में पेसा प्रेरकों की नियुक्ति की गई थी और 15 नवम्बर 2022 को राष्ट्रपति द्वारा इस कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया गया था। अब मोहन यादव सरकार ने राज्य के बजट से इन प्रेरकों की सेवाएं जारी न रखते हुए उन्हें समाप्त कर दिया है, जिससे लगभग पाँच हजार प्रेरक प्रभावित हुए हैं।
आदिवासी जिलों पर असर
नेता प्रतिपक्ष ने चेताया कि इस निर्णय से प्रदेश के आदिवासी जिलों में पेसा एक्ट से जुड़े कार्य बाधित होंगे। ये प्रेरक गाँव-गाँव जाकर सरकारी योजनाओं के फॉर्म भरने और आदिवासी समुदायों को उनके अधिकारों से जोड़ने का काम करते थे। सिंघार के अनुसार, अचानक सेवा समाप्ति से हजारों परिवारों की आजीविका संकट में पड़ गई है — कई प्रेरकों ने घर चलाने के लिए कर्ज लिया था और बच्चों की पढ़ाई के लिए योजनाएं बनाई थीं।
सरकार पर राजनीतिक सवाल
सिंघार ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप लगाते हुए सवाल उठाया कि क्या सरकार इन प्रेरकों की जगह RSS से जुड़े लोगों की भर्ती करना चाहती है। उन्होंने कहा कि सरकार के लिए ये महज आँकड़े हो सकते हैं, लेकिन हजारों परिवारों के लिए यह फैसला जीवन उजाड़ देने वाला है।
नेता प्रतिपक्ष की माँग
सिंघार ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि पेसा एक्ट के प्रभावी क्रियान्वयन और लगभग पाँच हजार प्रेरकों के हित को ध्यान में रखते हुए उनकी सेवाएं निरंतर जारी रखने पर ठोस निर्णय लिया जाए। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब मध्यप्रदेश में आदिवासी अधिकारों और पेसा एक्ट के क्रियान्वयन को लेकर विपक्ष पहले से ही सरकार को घेरता रहा है।
आगे क्या होगा
अब यह देखना होगा कि मुख्यमंत्री मोहन यादव इस पत्र पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या राज्य सरकार पेसा प्रेरकों की सेवाएं बहाल करने पर विचार करती है। विपक्ष के इस दबाव के बीच आदिवासी समुदायों और प्रेरकों की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।