बड़ा फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय नाबालिग को गर्भपात की अनुमति दी, महिला के प्रजनन अधिकार सर्वोच्च
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल 2025 को 15 वर्षीय नाबालिग को गर्भपात की अनुमति दी।
- दिल्ली हाई कोर्ट के इनकार के आदेश को शीर्ष अदालत ने पलट दिया।
- दिल्ली एम्स को सभी चिकित्सीय सावधानियों के साथ तत्काल प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश।
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 7 माह की उन्नत गर्भावस्था का हवाला देते हुए गर्भपात का विरोध किया।
- जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा — जबरदस्ती से पीड़ित असुरक्षित रास्ते अपनाने को मजबूर होंगे।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रजनन स्वायत्तता महिला का मौलिक अधिकार है और गोद देने का विकल्प यह अधिकार नहीं छीन सकता।
नई दिल्ली, 24 अप्रैल: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसले में 15 वर्षीय नाबालिग लड़की को गर्भपात की अनुमति प्रदान की और स्पष्ट किया कि किसी भी महिला को अनचाही गर्भावस्था को जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे को जन्म के बाद गोद देने के विकल्प की आड़ में महिला का गर्भपात का अधिकार नहीं छीना जा सकता। दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व आदेश को पलटते हुए कोर्ट ने दिल्ली एम्स को सभी आवश्यक चिकित्सीय सुरक्षा उपायों के साथ शीघ्र गर्भपात की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि और हाई कोर्ट का रुख
यह मामला एक 15 वर्षीय नाबालिग की 7 महीने की उन्नत गर्भावस्था से जुड़ा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद पीड़िता के परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इससे पहले 6 फरवरी की सुनवाई में भी शीर्ष अदालत यह रेखांकित कर चुकी थी कि कोई भी अदालत किसी महिला — विशेषकर नाबालिग — को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए विवश नहीं कर सकती।
उस सुनवाई में अदालत ने 30 सप्ताह की गर्भवती एक अन्य नाबालिग को भी गर्भपात की अनुमति दी थी और मुंबई के जेजे अस्पताल को सभी एहतियाती उपायों के साथ प्रक्रिया सम्पन्न कराने का निर्देश दिया था।
केंद्र सरकार का विरोध और सॉलिसिटर जनरल की दलीलें
शुक्रवार की सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गर्भपात की मांग का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार गर्भावस्था 7 माह की उन्नत अवस्था में है और इस स्थिति में गर्भपात से मां की जान को गंभीर खतरा हो सकता है।
तुषार मेहता ने यह भी सुझाव दिया कि सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स ऑथोरिटी (CARA) के माध्यम से बच्चे को गोद दिया जा सकता है। परिवार की आर्थिक कठिनाइयों को देखते हुए उन्होंने सरकारी आर्थिक सहायता का प्रस्ताव भी रखा। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को नाबालिग के मौलिक अधिकारों के समक्ष अपर्याप्त माना।
जस्टिस नागरत्ना की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने एक महत्वपूर्ण चेतावनी देते हुए कहा कि यदि गर्भवती महिलाओं को जबरन गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो भविष्य में पीड़ित लोग अदालत का रुख करने के बजाय असुरक्षित और अवैध तरीके अपना सकते हैं — जो कहीं अधिक खतरनाक होगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अजन्मे बच्चे के अधिकार और गर्भ धारण करने वाली महिला के अधिकार के बीच चुनाव करते समय प्रजनन स्वायत्तता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया कि प्रजनन से जुड़े निर्णयों में महिला की सहमति और इच्छा सर्वोपरि है।
व्यापक कानूनी और सामाजिक संदर्भ
यह फैसला मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट की भावना के अनुरूप है, जिसे 2021 में संशोधित कर गर्भपात की समय-सीमा को कुछ विशेष परिस्थितियों में 24 सप्ताह तक बढ़ाया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के ये लगातार फैसले नाबालिगों और यौन हिंसा पीड़ितों के लिए न्यायिक संरक्षण की एक मजबूत मिसाल कायम कर रहे हैं।
गौरतलब है कि भारत में हर साल हजारों नाबालिग लड़कियां अनचाही गर्भावस्था का शिकार होती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़ों के अनुसार देश में किशोर गर्भावस्था की दर अभी भी चिंताजनक है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के ये निर्णय न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक बदलाव की दिशा में भी मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दिल्ली एम्स इस प्रक्रिया को किस तत्परता से पूरा करता है और क्या केंद्र सरकार नाबालिगों से जुड़े ऐसे मामलों में अपनी नीतिगत स्थिति में कोई बदलाव करती है।