क्या दिल्ली हाई कोर्ट ने विकास यादव की पैरोल याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा?
सारांश
Key Takeaways
- नीतीश कटारा की हत्या एक ऑनर किलिंग का मामला है।
- विकास यादव को 25 वर्षों की सजा मिली है, जिसमें से उसने 23 वर्ष जेल में बिताए हैं।
- कोर्ट ने पैरोल याचिका पर निर्णय सुरक्षित रखा है, जो गवाहों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
नई दिल्ली, 5 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली हाईकोर्ट ने नीतीश कटारा हत्याकांड से संबंधित विकास यादव की तीन सप्ताह की पैरोल (फर्लो) याचिका पर सुनवाई करते हुए अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान जस्टिस रविंद्र डूडेजा की पीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला लिया। विकास यादव इस मामले में 25 वर्षों की जेल की सजा भुगत रहा है।
सुनवाई के दौरान नीतीश कटारा के परिवार के वकील ने विकास यादव की याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यदि विकास यादव को पैरोल पर रिहा किया जाता है, तो गवाहों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
यह मामला फरवरी 2002 में नीतीश कटारा की हत्या से जुड़ा है। दरअसल, यह एक ऑनर किलिंग का मामला था। नीतीश कटारा की एक नेता डीपी यादव की बेटी के साथ दोस्ती थी, जिसके चलते उसका अपहरण कर हत्या कर दी गई थी। इस हत्या के आरोप विकास और उसके भाई विशाल पर लगे। विकास, डीपी यादव का बेटा है। निचली अदालत ने इस हत्या को ऑनर किलिंग मानते हुए 30 मई 2008 को विकास और विशाल को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हालाँकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान विकास यादव की उम्रकैद की सजा को 25 साल की सजा में परिवर्तित कर दिया था। बाद में, सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2016 में विकास और विशाल यादव की 25-25 वर्षों की सजा को बरकरार रखा।
विकास यादव ने अपनी सजा के 25 वर्षों में से 23 वर्ष जेल में बिताए हैं।