19 अक्टूबर 2026
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दिल्ली में कम दोषसिद्धि दर पर एलजी टी.एस. संधू सख्त, अभियोजन तंत्र में जवाबदेही और समन्वय बढ़ाने के निर्देश

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दिल्ली में कम दोषसिद्धि दर पर एलजी टी.एस. संधू सख्त, अभियोजन तंत्र में जवाबदेही और समन्वय बढ़ाने के निर्देश

सारांश

दिल्ली के एलजी टी.एस. संधू ने अभियोजन निदेशालय की समीक्षा बैठक में कम दोषसिद्धि दर और लंबित मामलों पर कड़ा रुख अपनाया। जवाबदेही, बेहतर केस ट्रैकिंग, बरी मामलों का विश्लेषण और एजेंसियों के बीच दैनिक समन्वय — ये चार स्तंभ हैं जिन पर दिल्ली की न्याय व्यवस्था को दुरुस्त करने की कोशिश हो रही है।

मुख्य बातें

दिल्ली के एलजी टी.एस.
संधू ने 19 अक्टूबर 2026 को अभियोजन निदेशालय (GNCTD) की समीक्षा बैठक में कम दोषसिद्धि दर और लंबित मामलों पर गहरी चिंता जताई।
संधू ने चार्जशीट की प्री-ट्रायल जाँच मज़बूत करने, सुनवाई टालने की घटनाएँ कम करने और गवाहों को समय पर पेश करने पर जोर दिया।
जहाँ कानूनी रूप से संभव हो, वहाँ 'ट्रायल इन एब्सेंशिया' की प्रक्रिया शुरू करने और जाँच अधिकारियों को सीधे जवाबदेह ठहराने का निर्देश दिया गया।
बरी होने वाले मामलों का विश्लेषण कर कमियाँ चिन्हित करने और हर स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कहा गया।
अभियोजकों, दिल्ली पुलिस और FSL के बीच दैनिक समन्वय बढ़ाने तथा BNSS की समय-सीमाओं का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया गया।

दिल्ली के उपराज्यपाल टी.एस. संधू ने 19 अक्टूबर 2026 को अभियोजन निदेशालय (GNCTD) के अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में राष्ट्रीय राजधानी की कम दोषसिद्धि दर, लंबित मामलों की बढ़ती संख्या और अदालती प्रक्रियाओं में हो रही अनावश्यक देरी पर कड़ी चिंता जताई। संधू ने स्पष्ट निर्देश दिए कि जहाँ भी टाली जा सकने वाली प्रक्रियागत चूकें हो रही हैं, उन्हें तत्काल दूर किया जाए, ताकि न्याय व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सके।

बैठक में उठाई गई मुख्य चिंताएँ

उपराज्यपाल संधू ने अभियोजन निदेशालय की कार्यप्रणाली की गहन समीक्षा की। उन्होंने कहा कि दोषसिद्धि की निम्न दर दिल्ली की आपराधिक न्याय प्रणाली की सबसे बड़ी कमज़ोरियों में से एक है। बैठक में विशेष रूप से सुनवाई टलने की आवर्ती घटनाओं, गवाहों को समय पर अदालत में पेश न कर पाने और चार्जशीट की प्री-ट्रायल जाँच में कमज़ोरियों को रेखांकित किया गया।

संधू ने एक्स पर अपनी बात रखते हुए लिखा, 'न्याय में देरी का मतलब न्याय से इनकार नहीं है। हर ऐसी देरी और चूक को दूर किया जाना चाहिए जिसे टाला जा सकता है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि सभी संबंधित एजेंसियों को 'तत्परता, आपसी समन्वय और जवाबदेही के साथ काम करने' का निर्देश दिया गया है।

अभियोजन तंत्र सुधार के प्रमुख निर्देश

उपराज्यपाल के निर्देशों में कई ठोस सुधारात्मक कदम शामिल हैं। पहला, चार्जशीट की प्री-ट्रायल जाँच को मज़बूत करना ताकि मुकदमे के दौरान तकनीकी कमज़ोरियाँ सामने न आएँ। दूसरा, केस ट्रैकिंग सिस्टम में व्यापक सुधार लाना और फाइलों के आवंटन को व्यवस्थित करना।

इसके अतिरिक्त, संधू ने जहाँ कानूनी रूप से संभव हो, वहाँ 'ट्रायल इन एब्सेंशिया' — अर्थात आरोपी की अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने — की प्रक्रिया शुरू करने का सुझाव दिया। उन्होंने यह भी कहा कि जाँच की गुणवत्ता और सबूत संग्रह के मामले में जाँच अधिकारियों को सीधे जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

बरी होने वाले मामलों की जवाबदेही

संधू का एक महत्वपूर्ण सुझाव उन मामलों से जुड़ा था जिनमें आरोपी बरी हो जाते हैं। उन्होंने कहा, 'बरी होने वाले मामलों का विश्लेषण करें, कमियों या चूकों की पहचान करें और हर स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करें।' यह दृष्टिकोण अभियोजन पक्ष की विफलताओं को सांस्थानिक स्तर पर दर्ज करने और भविष्य में उनसे सीखने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

गौरतलब है कि दिल्ली जैसे महानगर में, जहाँ आपराधिक मामलों की संख्या अत्यधिक है, बरी होने की ऊँची दर न केवल पीड़ितों के लिए अन्यायपूर्ण है, बल्कि पुलिस और अभियोजन तंत्र की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाती है।

एजेंसियों के बीच समन्वय और बीएनएसएस अनुपालन

उपराज्यपाल ने अभियोजकों, दिल्ली पुलिस और फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (FSL) के बीच दैनिक समन्वय को मज़बूत करने पर विशेष ज़ोर दिया। उन्होंने एक्स पर लिखा, 'जाँच अधिकारियों को प्रभावी ढंग से ब्रीफ करना भी इसी समन्वय का हिस्सा होना चाहिए।'

इसके साथ ही संधू ने वरिष्ठ अधिकारियों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में निर्धारित समय-सीमाओं का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया, ताकि समय पर न्याय मिलने की संवैधानिक गारंटी ज़मीन पर साकार हो सके।

आगे क्या होगा

बैठक में दिए गए निर्देशों के अनुपालन की समयसीमा फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन उपराज्यपाल ने 'परिणाम-उन्मुख कदम' उठाने पर ज़ोर दिया है। यह ऐसे समय में आया है जब दिल्ली की अदालतों में मामलों का बोझ लगातार बढ़ रहा है और लंबित मुकदमे न्यायपालिका के लिए एक गंभीर चुनौती बने हुए हैं। अभियोजन निदेशालय में यदि ये सुधार प्रभावी रूप से लागू होते हैं, तो दोषसिद्धि दर में सुधार दिल्ली की आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक निर्णायक बदलाव साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ये बैठकरूमी आदेश ज़मीन पर बदलाव ला पाएँगे — दिल्ली में ऐसी समीक्षाएँ पहले भी होती रही हैं, पर दोषसिद्धि दर में ठोस सुधार का कोई सार्वजनिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। 'ट्रायल इन एब्सेंशिया' और बरी मामलों की जवाबदेही जैसे सुझाव प्रगतिशील हैं, पर इनके लिए विधायी ढाँचे और प्रशिक्षित जनशक्ति की भी दरकार होगी। BNSS की समय-सीमाओं का पालन तब तक संभव नहीं जब तक अदालतों पर मामलों का अत्यधिक बोझ कम नहीं होता — जो एकल विभागीय निर्देश से नहीं, बल्कि समग्र न्यायिक सुधार से ही संभव है।
RashtraPress
19 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिल्ली में दोषसिद्धि दर को लेकर एलजी संधू ने क्या कदम उठाए हैं?
दिल्ली के उपराज्यपाल टी.एस. संधू ने 19 अक्टूबर 2026 को अभियोजन निदेशालय की समीक्षा बैठक बुलाई और कम दोषसिद्धि दर, लंबित मामलों तथा अदालती देरी पर सख्त चिंता जताई। उन्होंने जवाबदेही बढ़ाने, केस ट्रैकिंग में सुधार और एजेंसियों के बीच दैनिक समन्वय के निर्देश दिए।
'ट्रायल इन एब्सेंशिया' क्या है और इसे दिल्ली में क्यों लागू करने की बात हो रही है?
'ट्रायल इन एब्सेंशिया' वह प्रक्रिया है जिसमें आरोपी की अनुपस्थिति में भी मुकदमा चलाया जा सकता है, जहाँ कानूनी प्रावधान इसकी अनुमति देते हों। एलजी संधू ने इसे उन मामलों में लागू करने का सुझाव दिया है जहाँ आरोपी जानबूझकर सुनवाई से बच रहे हैं, ताकि मुकदमे अनिश्चित काल तक न लटकें।
अभियोजकों, दिल्ली पुलिस और FSL के बीच समन्वय कैसे बेहतर होगा?
उपराज्यपाल ने तीनों एजेंसियों के बीच दैनिक समन्वय बढ़ाने का निर्देश दिया है, जिसमें जाँच अधिकारियों को मुकदमे से पहले प्रभावी तरीके से ब्रीफ करना शामिल है। यह कदम साक्ष्य की गुणवत्ता और फोरेंसिक रिपोर्टों की समयबद्ध उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी माना गया है।
बरी होने वाले मामलों में जवाबदेही कैसे तय होगी?
एलजी संधू ने निर्देश दिया है कि जिन मामलों में आरोपी बरी होते हैं, उनका व्यवस्थित विश्लेषण किया जाए और कमियाँ चिन्हित की जाएँ। इसके आधार पर संबंधित अभियोजकों और जाँच अधिकारियों को हर स्तर पर जवाबदेह ठहराने की प्रक्रिया शुरू की जानी है।
BNSS की समय-सीमाओं का दिल्ली के अभियोजन से क्या संबंध है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) आपराधिक प्रक्रिया के विभिन्न चरणों के लिए समय-सीमाएँ निर्धारित करती है। संधू ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि इन समय-सीमाओं का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए, जिससे मुकदमों में अनावश्यक देरी पर लगाम लग सके और नागरिकों को समय पर न्याय मिल सके।
राष्ट्र प्रेस
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