दिल्ली में धुंध से पहले पराली पर अभियान: हरियाणा में 53% कमी, केंद्र ने ₹4,266 करोड़ किए जारी
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में सर्दी और धुंध का मौसम दस्तक देने से पहले ही पराली जलाने पर रोक का अभियान एक बार फिर तेज़ हो गया है। उत्तर भारत में अक्टूबर 2026 से धान की कटाई शुरू होते ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के निवासियों के लिए वायु गुणवत्ता एक गंभीर चिंता बन गई है। वैज्ञानिक अध्ययनों और सरकारी आकलन के अनुसार, फसल अवशेष जलाना अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली की भीषण शीतकालीन धुंध का एक प्रमुख मौसमी कारक है।
पराली जलाने की मजबूरी और पर्यावरणीय नुकसान
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान सितंबर के अंत से अक्टूबर तक धान की कटाई करते हैं और उन्हें गेहूँ की बुवाई के लिए खेत तैयार करने की जल्दी रहती है। दोनों फसलों के बीच का अंतराल अक्सर केवल दो से तीन सप्ताह का होता है, जिस कारण कई किसान पराली जलाना सबसे सस्ता और तीव्र विकल्प मानते हैं।
सरकार के फसल अवशेष प्रबंधन परिचालन दिशानिर्देश 2026 में कहा गया है कि धान के भूसे या फसल अवशेषों का एक बड़ा हिस्सा अगली फसल की बुवाई के लिए खेत साफ करने हेतु जला दिया जाता है, जिससे वातावरण में अभूतपूर्व प्रदूषण उत्पन्न होता है और मिट्टी को भारी मात्रा में पोषक तत्वों का नुकसान होता है।
आँकड़ों के अनुसार, एक टन पराली जलाने से अनुमानित 3 किलोग्राम कण पदार्थ, 60 किलोग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 1,460 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड, 199 किलोग्राम राख और 2 किलोग्राम सल्फर डाइऑक्साइड निकलती है — जो वायु गुणवत्ता, मानव स्वास्थ्य और मिट्टी की सेहत को गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं।
ताज़ा आँकड़े: घटनाओं में उल्लेखनीय कमी
हाल की रिपोर्टों के अनुसार, 15 सितंबर से 12 अक्टूबर 2026 के बीच पराली जलाने की घटनाओं में पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई है। हरियाणा में 53.3 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जबकि उत्तर प्रदेश में लगभग 32 प्रतिशत की गिरावट आई।
हालाँकि, मध्य प्रदेश और राजस्थान में इसी दौरान अधिक घटनाएँ दर्ज की गई हैं — जो यह संकेत देता है कि समस्या का भूगोल बदल रहा है और निगरानी का दायरा विस्तृत करने की ज़रूरत है।
केंद्र सरकार का फसल अवशेष प्रबंधन अभियान
2018 से केंद्र सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) योजना लागू की है, जिसके तहत किसानों को मशीनरी और वैकल्पिक अवशेष प्रबंधन प्रणालियों की सहायता दी जाती है। 2018-19 से 2025-26 के बीच केंद्र सरकार ने इस योजना के अंतर्गत राज्यों को कुल ₹4,266.47 करोड़ जारी किए।
राज्यवार आवंटन में पंजाब को ₹2,056.50 करोड़, हरियाणा को ₹1,171.71 करोड़, उत्तर प्रदेश को ₹868.67 करोड़ और मध्य प्रदेश को ₹59 करोड़ शामिल हैं। चालू वित्त वर्ष के लिए ₹592.57 करोड़ आवंटित किए गए, जिनमें से ₹430.87 करोड़ पहले ही जारी किए जा चुके हैं। हालाँकि आवंटित धनराशि का धीमा उपयोग चिंता का विषय बना हुआ है।
ज़मीनी बुनियादी ढाँचा और वैकल्पिक समाधान
इस अवधि में 3.23 लाख से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें और 41,900 से अधिक कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC) स्थापित किए गए हैं। ये CHC कृषि मशीनरी को किराए पर उपलब्ध कराते हैं, ताकि छोटे किसान भी उत्पादक और टिकाऊ खेती के लिए ज़रूरी उपकरण इस्तेमाल कर सकें।
इसके अलावा, संशोधित दिशानिर्देशों के तहत भूसे की आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने और बायोमास, बायोफ्यूल तथा पेलेटाइजेशन उद्योगों के लिए फीडस्टॉक उपलब्ध कराने वाली परियोजनाओं के लिए 65 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता की अनुमति दी गई है। थर्मल पावर प्लांट, संपीड़ित बायोगैस संयंत्र और बायोमास-ऊर्जा परियोजनाएँ दीर्घकालिक समाधान के रूप में उभर रही हैं, क्योंकि ये कृषि अपशिष्ट को खेतों में जलाने के बजाय ईंधन में बदलते हैं।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब दिल्ली की वायु गुणवत्ता हर साल सर्दियों में 'गंभीर' श्रेणी तक पहुँच जाती है। आने वाले हफ्तों में पराली जलाने की घटनाओं का रुख और सरकारी मशीनरी की सक्रियता ही तय करेगी कि इस बार दिल्लीवासियों को कितनी राहत मिलती है।