पराली जलाने से दिल्ली में 40% शीतकालीन प्रदूषण, खेतों की उर्वरता को भी भारी नुकसान
सारांश
मुख्य बातें
हर वर्ष अक्टूबर माह में दिल्ली-NCR और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक गिर जाती है। घना स्मॉग छा जाता है, जो न केवल दृश्यता को प्रभावित करता है बल्कि सांस की बीमारियों और हृदय संबंधी समस्याओं को भी बढ़ावा देता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रदूषण के प्रमुख कारणों में पड़ोसी राज्यों में होने वाली पराली जलाने की घटनाएँ शामिल हैं, जो अकेले दिल्ली के शीतकालीन प्रदूषण में 40 प्रतिशत तक का योगदान करती हैं।
पराली जलाने की स्थिति और कानूनी प्रावधान
सरकार और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों और कानूनी कार्रवाई के प्रावधानों के बावजूद, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के कुछ हिस्सों में खरीफ सीजन में धान की कटाई के बाद खेतों में पराली जलाई जा रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के अंतर्गत गठित CREAMS (Consortium for Research on Agroecosystem Monitoring and Modelling from Space) द्वारा 6 अक्टूबर 2026 को जारी एक बुलेटिन के अनुसार, 15 सितंबर से 6 अक्टूबर 2026 के बीच सात राज्यों में कुल 287 स्थानों पर फसल अवशेष जलाने की घटनाएँ दर्ज की गईं। पराली जलाना कानूनन अपराध है और इसके लिए जुर्माना एवं कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।
मिट्टी और पोषक तत्वों को नुकसान
पराली जलाने से वायु प्रदूषण के साथ-साथ खेतों को भी भारी क्षति होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, एक टन धान की पराली जलाने से लगभग 400 किलो कार्बन, 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 2.5 किलो पोटाश और 1.2 किलो सल्फर का नुकसान होता है। इसके अतिरिक्त, मिट्टी में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्मजीव भी नष्ट हो जाते हैं, जो दीर्घकालिक रूप से भूमि की उर्वरक क्षमता को कमज़ोर करते हैं। यह ऐसे समय में चिंताजनक है जब देश पहले से ही मृदा स्वास्थ्य की गिरावट से जूझ रहा है।
स्वास्थ्य पर असर
पराली जलाने से निकलने वाले सूक्ष्म कणीय पदार्थ (Particulate Matter) इतने महीन होते हैं कि ये लंबी दूरी तक हवा में बने रहते हैं। इनके संपर्क में आने से सांस की बीमारियाँ, आँखों में जलन और हृदय संबंधी जटिलताएँ बढ़ती हैं। गौरतलब है कि प्रदूषण का यह सिलसिला हर साल दोहराया जाता है और बच्चों, बुज़ुर्गों तथा पहले से बीमार व्यक्तियों पर इसका असर सबसे गंभीर होता है।
पराली के वैकल्पिक उपयोग
किसानों के पास पराली जलाने के बजाय कई व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध हैं। पराली में नाइट्रोजन 0.5 से 1 प्रतिशत, फॉस्फोरस लगभग 0.6 प्रतिशत और पोटाश लगभग 1.5 प्रतिशत होता है, साथ ही जिंक, आयरन और मैगनीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। इसे खेत में मिलाकर जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए रोटावेटर, हैप्पी सीडर, पैडी स्ट्रॉ रीपर और डिस्क हैरो जैसी मशीनें सहायक सिद्ध होती हैं।
इसके अलावा पराली को कम्पोस्टिंग, बायो-डीकंपोज़र और ट्राइकोडर्मा के माध्यम से खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। पराली में उच्च गुणवत्ता का फाइबर और पर्याप्त प्रोटीन भी होता है, जो पशु चारे के रूप में भी उपयोगी है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि पराली प्रबंधन की चुनौती को केवल कानूनी दंड से नहीं, बल्कि किसानों को सस्ती मशीनरी, सब्सिडी और जागरूकता कार्यक्रमों के ज़रिए व्यावहारिक विकल्प देकर ही हल किया जा सकता है। IARI और अन्य कृषि संस्थानों के शोध इस दिशा में किसानों को मार्गदर्शन दे रहे हैं। यदि समय रहते ठोस नीतिगत कदम नहीं उठाए गए, तो दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।