25 अक्टूबर 2026
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पराली जलाने से दिल्ली में 40% शीतकालीन प्रदूषण, खेतों की उर्वरता को भी भारी नुकसान

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पराली जलाने से दिल्ली में 40% शीतकालीन प्रदूषण, खेतों की उर्वरता को भी भारी नुकसान

सारांश

हर साल अक्टूबर में दिल्ली की हवा ज़हरीली हो जाती है — और पराली इसकी बड़ी वजह है। लेकिन असली नुकसान सिर्फ हवा को नहीं, खेतों को भी है। एक टन पराली जलाने से 400 किलो कार्बन और अरबों लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट होते हैं। समाधान कानून में नहीं, किसानों को व्यावहारिक विकल्प देने में है।

मुख्य बातें

पराली जलाने से दिल्ली के शीतकालीन प्रदूषण में 40 प्रतिशत तक का योगदान होता है।
IARI के CREAMS बुलेटिन के अनुसार 15 सितंबर से 6 अक्टूबर 2026 के बीच सात राज्यों में 287 स्थानों पर फसल अवशेष जलाने की घटनाएँ दर्ज हुईं।
एक टन पराली जलाने पर लगभग 400 किलो कार्बन , 5.5 किलो नाइट्रोजन , 2.3 किलो फॉस्फोरस और 2.5 किलो पोटाश का नुकसान होता है।
मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव भी पराली जलाने से नष्ट हो जाते हैं, जिससे दीर्घकालिक भूमि उर्वरता प्रभावित होती है।
रोटावेटर, हैप्पी सीडर, बायो-डीकंपोज़र और कम्पोस्टिंग जैसे विकल्प किसानों के लिए उपलब्ध हैं।
पराली जलाना कानूनन अपराध है; NGT और सरकार ने प्रतिबंध व जुर्माने का प्रावधान किया है।

हर वर्ष अक्टूबर माह में दिल्ली-NCR और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक गिर जाती है। घना स्मॉग छा जाता है, जो न केवल दृश्यता को प्रभावित करता है बल्कि सांस की बीमारियों और हृदय संबंधी समस्याओं को भी बढ़ावा देता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रदूषण के प्रमुख कारणों में पड़ोसी राज्यों में होने वाली पराली जलाने की घटनाएँ शामिल हैं, जो अकेले दिल्ली के शीतकालीन प्रदूषण में 40 प्रतिशत तक का योगदान करती हैं।

पराली जलाने की स्थिति और कानूनी प्रावधान

सरकार और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों और कानूनी कार्रवाई के प्रावधानों के बावजूद, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के कुछ हिस्सों में खरीफ सीजन में धान की कटाई के बाद खेतों में पराली जलाई जा रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के अंतर्गत गठित CREAMS (Consortium for Research on Agroecosystem Monitoring and Modelling from Space) द्वारा 6 अक्टूबर 2026 को जारी एक बुलेटिन के अनुसार, 15 सितंबर से 6 अक्टूबर 2026 के बीच सात राज्यों में कुल 287 स्थानों पर फसल अवशेष जलाने की घटनाएँ दर्ज की गईं। पराली जलाना कानूनन अपराध है और इसके लिए जुर्माना एवं कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।

मिट्टी और पोषक तत्वों को नुकसान

पराली जलाने से वायु प्रदूषण के साथ-साथ खेतों को भी भारी क्षति होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, एक टन धान की पराली जलाने से लगभग 400 किलो कार्बन, 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 2.5 किलो पोटाश और 1.2 किलो सल्फर का नुकसान होता है। इसके अतिरिक्त, मिट्टी में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्मजीव भी नष्ट हो जाते हैं, जो दीर्घकालिक रूप से भूमि की उर्वरक क्षमता को कमज़ोर करते हैं। यह ऐसे समय में चिंताजनक है जब देश पहले से ही मृदा स्वास्थ्य की गिरावट से जूझ रहा है।

स्वास्थ्य पर असर

पराली जलाने से निकलने वाले सूक्ष्म कणीय पदार्थ (Particulate Matter) इतने महीन होते हैं कि ये लंबी दूरी तक हवा में बने रहते हैं। इनके संपर्क में आने से सांस की बीमारियाँ, आँखों में जलन और हृदय संबंधी जटिलताएँ बढ़ती हैं। गौरतलब है कि प्रदूषण का यह सिलसिला हर साल दोहराया जाता है और बच्चों, बुज़ुर्गों तथा पहले से बीमार व्यक्तियों पर इसका असर सबसे गंभीर होता है।

पराली के वैकल्पिक उपयोग

किसानों के पास पराली जलाने के बजाय कई व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध हैं। पराली में नाइट्रोजन 0.5 से 1 प्रतिशत, फॉस्फोरस लगभग 0.6 प्रतिशत और पोटाश लगभग 1.5 प्रतिशत होता है, साथ ही जिंक, आयरन और मैगनीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। इसे खेत में मिलाकर जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए रोटावेटर, हैप्पी सीडर, पैडी स्ट्रॉ रीपर और डिस्क हैरो जैसी मशीनें सहायक सिद्ध होती हैं।

इसके अलावा पराली को कम्पोस्टिंग, बायो-डीकंपोज़र और ट्राइकोडर्मा के माध्यम से खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। पराली में उच्च गुणवत्ता का फाइबर और पर्याप्त प्रोटीन भी होता है, जो पशु चारे के रूप में भी उपयोगी है।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि पराली प्रबंधन की चुनौती को केवल कानूनी दंड से नहीं, बल्कि किसानों को सस्ती मशीनरी, सब्सिडी और जागरूकता कार्यक्रमों के ज़रिए व्यावहारिक विकल्प देकर ही हल किया जा सकता है। IARI और अन्य कृषि संस्थानों के शोध इस दिशा में किसानों को मार्गदर्शन दे रहे हैं। यदि समय रहते ठोस नीतिगत कदम नहीं उठाए गए, तो दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

प्रतिबंध लगते हैं और जुर्माने की चेतावनी दी जाती है — फिर भी घटनाएँ दोहराई जाती हैं। यह नीति-निष्पादन की विफलता है, किसानों की ज़िद नहीं। जब तक हैप्पी सीडर और बायो-डीकंपोज़र जैसे विकल्प हर छोटे किसान की पहुँच में नहीं आते, कानूनी दंड केवल कागज़ी हथियार बना रहेगा। IARI के आँकड़े बताते हैं कि 287 घटनाएँ सिर्फ 22 दिनों में हुईं — यानी समस्या की जड़ें गहरी हैं। असली सवाल यह है कि मशीनरी सब्सिडी और खरीद गारंटी की घोषणाएँ ज़मीन पर कब उतरेंगी।
RashtraPress
25 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पराली जलाने से दिल्ली में कितना प्रदूषण होता है?
पराली जलाने से दिल्ली के शीतकालीन प्रदूषण में 40 प्रतिशत तक का योगदान होता है। यह सूक्ष्म कणीय पदार्थ लंबी दूरी तय करके दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता को खतरनाक स्तर पर ले जाते हैं।
पराली जलाने से खेतों को क्या नुकसान होता है?
वैज्ञानिकों के अनुसार एक टन पराली जलाने से लगभग 400 किलो कार्बन, 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 2.5 किलो पोटाश और 1.2 किलो सल्फर नष्ट होते हैं। साथ ही मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीव भी मर जाते हैं, जिससे दीर्घकालिक भूमि उर्वरता कमज़ोर होती है।
IARI के CREAMS बुलेटिन में क्या बताया गया है?
IARI के CREAMS द्वारा 6 अक्टूबर 2026 को जारी बुलेटिन के अनुसार, 15 सितंबर से 6 अक्टूबर 2026 के बीच सात राज्यों में कुल 287 स्थानों पर फसल अवशेष जलाने की घटनाएँ दर्ज की गईं। यह आँकड़ा प्रतिबंध के बावजूद जारी उल्लंघन को दर्शाता है।
किसान पराली जलाने के बजाय क्या कर सकते हैं?
किसान रोटावेटर, हैप्पी सीडर, पैडी स्ट्रॉ रीपर और डिस्क हैरो जैसी मशीनों से पराली को खेत में मिला सकते हैं। इसे बायो-डीकंपोज़र, ट्राइकोडर्मा या कम्पोस्टिंग से जैविक खाद में भी बदला जा सकता है, जो खेत की उर्वरता बढ़ाती है।
पराली जलाने पर क्या कानूनी कार्रवाई हो सकती है?
पराली जलाना कानूनन अपराध है और NGT तथा सरकार ने इस पर जुर्माना एवं कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किया है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में उल्लंघन पर किसानों पर जुर्माना लगाने के आदेश हैं।
राष्ट्र प्रेस
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