पराली से इथेनॉल और बायो-सीएनजी बना रहा भारत, गडकरी बोले — जल्द खत्म होगी पराली जलाने की समस्या
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने मंगलवार, 1 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में घोषणा की कि देश में पराली जलाने की समस्या अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। उन्होंने कहा कि पराली को अब कचरे की बजाय उपयोगी संसाधन के रूप में देखा जा रहा है, जिससे इथेनॉल और बायो-सीएनजी का उत्पादन किया जा रहा है। गडकरी के अनुसार, आने वाले दिनों में यह समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।
कार्यक्रम का संदर्भ
यह बयान दिल्ली विधानसभा के पहले स्पीकर चार्टी लाल गोयल की 99वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में दिया गया। इस अवसर पर गडकरी ने पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण की चुनौतियों और 'वेस्ट टू वेल्थ' की अवधारणा पर विस्तार से बात की।
पराली से 'वेस्ट टू वेल्थ' की ओर
गडकरी ने बताया कि पहले पंजाब और हरियाणा में बड़े पैमाने पर पराली जलाने के कारण दिल्ली के वायु प्रदूषण पर गंभीर असर पड़ता था। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए 'वेस्ट टू वेल्थ' की नीति अपनाई। उनके अनुसार, पराली का उपयोग अब इथेनॉल, बायो-सीएनजी और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) बनाने में किया जा रहा है। यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों और अर्थव्यवस्था के लिए भी लाभकारी बताई जा रही है।
प्रदूषण पर चिंता और दिल्ली की स्थिति
केंद्रीय मंत्री ने वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण को गंभीर चिंता का विषय बताया और कहा कि ये तीनों मिलकर लोगों की जीवन प्रत्याशा को कम कर रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली लंबे समय से प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझती रही है, लेकिन अब स्थिति में सुधार के संकेत मिल रहे हैं। गौरतलब है कि दिल्ली का वायु प्रदूषण हर सर्दी में एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले लेता है, जिसमें पराली का धुआँ एक प्रमुख कारक रहा है।
पारिस्थितिकी और जीवन-मूल्य पर विचार
गडकरी ने कार्यक्रम में दार्शनिक टिप्पणी भी की। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का वास्तविक मूल्यांकन उसकी आयु से नहीं, बल्कि उसके जीवन के उद्देश्य और समाज के प्रति योगदान से होता है। उन्होंने उस स्थान की भी सराहना की जहाँ पहले कबाड़ का ढेर था और अब उसे एक सुंदर बगीचे में बदल दिया गया है — इसे उन्होंने पर्यावरण और समाज दोनों के लिए सकारात्मक बदलाव का प्रतीक बताया।
आगे की राह
केंद्रीय मंत्री के अनुसार, कृषि अवशेषों को ऊर्जा संसाधन में बदलने की यह पहल न केवल प्रदूषण में कमी लाएगी, बल्कि किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत भी देगी। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो यह भारत की हरित ऊर्जा और स्वच्छ वायु की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हो सकता है।