क्या देवभूमि उत्तराखंड सत्यम, शिवम और सुंदरम का प्रतीक है? : उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन
सारांश
Key Takeaways
- उत्तराखंड का गठन पहाड़ी जनता की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है।
- राज्य ने सड़क, रेल, और हवाई संपर्क में अभूतपूर्व प्रगति की है।
- उत्तराखंड ने हरित विकास और नवीकरणीय ऊर्जा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
- यह राज्य राष्ट्रीय सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
- उत्तराखंड का विकास आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली, १७ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शनिवार को उत्तराखंड के देहरादून में जागरण फोरम का उद्घाटन किया, जिसे राज्य के गठन के २५ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। उद्घाटन समारोह में उन्होंने उत्तराखंड को त्याग, दृढ़ता और राष्ट्र सेवा का प्रतीक बताया और इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर राज्य की जनता को हार्दिक बधाई दी।
उत्तराखंड के गठन की याद करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि राज्य का गठन पहाड़ी जनसंख्या की लंबे समय से चली आ रही आकांक्षाओं का लोकतांत्रिक उत्तर था और इसने भारत की संघीय प्रणाली की मजबूती को पुनः स्थापित किया। उन्होंने लोकसभा सदस्य के रूप में उत्तराखंड के गठन के विधेयक के समर्थन में मतदान करने का अपना व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किया।
उपराष्ट्रपति ने देवभूमि उत्तराखंड के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर गौर करते हुए कहा कि भारत की सभ्यता की चेतना में इस राज्य का विशेष स्थान है। वैदिक और पौराणिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उत्तराखंड सत्यम, शिवम और सुंदरम के सार को दर्शाता है। इसके हिमनद, नदियां और वन इसकी भौगोलिक सीमाओं से कहीं अधिक दूर तक जीवन को पोषित करते हैं।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दूरदर्शी नेतृत्व में राज्य ने सड़क, रेल, हवाई और संचार संपर्क के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है।
विकास पर जोर देते हुए उपराष्ट्रपति ने पर्यावरणीय जिम्मेदारी के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने हरित विकास को बढ़ावा देने, विशेषकर सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उत्तराखंड के प्रयासों की सराहना की और बताया कि उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जो सकल घरेलू उत्पाद के साथ-साथ सकल पर्यावरण उत्पाद की अवधारणा को अपनाता है।
उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय सुरक्षा में राज्य के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों में बड़ी संख्या में अधिकारी उत्तराखंड से आते हैं।
उत्तराखंड के रणनीतिक महत्व का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने सीमावर्ती गांवों को अंतिम चौकी नहीं, बल्कि शक्ति, विरासत और लचीलापन का प्रतीक बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण को याद किया, जिसमें गांव को 'भारत का पहला गांव' कहा गया था।
भारत को २०४७ तक आत्मनिर्भर और विकसित बनाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा, जैविक कृषि, बागवानी, पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों, आयुष, पर्यावरण पर्यटन, स्टार्टअप और कौशल विकास में उत्तराखंड की विशाल क्षमता है।