क्या देवघर में श्रद्धालु 'दामाद' के घर नहीं जाते?

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क्या देवघर में श्रद्धालु 'दामाद' के घर नहीं जाते?

सारांश

देवघर का बाबा बैद्यनाथ धाम बसंत पंचमी के मौके पर श्रद्धालुओं से भरा हुआ है। सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का प्रतीक, यह उत्सव श्रद्धा और उल्लास का अनूठा संगम है। जानें कैसे श्रद्धालु इस दिन का आनंद लेते हैं और अपनी परंपराओं का पालन करते हैं।

मुख्य बातें

देवघर में बसंत पंचमी पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है।
श्रद्धालु खुले आसमान के नीचे रात बिताते हैं।
Mithilanchal की विशेष मान्यता है कि दामाद के घर नहीं जाना चाहिए।
श्रद्धालु गंगा जल लेकर 108 किलोमीटर की यात्रा करते हैं।
बसंत पंचमी उत्सव धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है।

देवघर, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भगवान शंकर के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक, बाबा बैद्यनाथ धाम, बसंत पंचमी से पहले ही श्रद्धालुओं की भीड़ से गुलजार है। चारों ओर 'बाबा बैद्यनाथ' के जयघोष सुनाई दे रहे हैं और पूरा माहौल शिवमय हो गया है। लोग दूर-दूर से आकर इस पावन स्थल पर अपनी श्रद्धा अर्पित कर रहे हैं।

बसंत पंचमी के दिन शुक्रवार को देशभर में मां सरस्वती की पूजा होगी, वहीं देवघर में बाबा बैद्यनाथ का पारंपरिक तिलकोत्सव मनाया जाएगा। तिलक-अभिषेक के बाद श्रद्धालु अबीर-गुलाल के साथ उल्लास में डूबेंगे।

बाबा बैद्यनाथ धाम का यह उत्सव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पारंपरिक आस्था का भी प्रतीक है। बसंत पंचमी से पहले ही यहां उमड़ी भीड़ और आस्था का नजारा हर किसी के लिए अविस्मरणीय है।

देवी पार्वती पर्वतराज हिमालय की पुत्री मानी जाती हैं और भगवान शंकर मिथिला के दामाद। इसलिए मिथिलांचल के श्रद्धालु विशेष आस्था के साथ इस दिन देवघर पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर भगवान शंकर और माता पार्वती का विवाह उत्सव मनाने से पहले ही लोग बसंत पंचमी के दिन बाबा बैद्यनाथ का तिलक कर जलार्पण करते हैं।

इस बार भी मिथिलांचल के लाखों श्रद्धालु पहले ही देवघर पहुंच चुके हैं। तिरहुत, दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, पूर्णिया, कटिहार, कोसी क्षेत्र, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मधेपुरा, मुंगेर और नेपाल की तराई से श्रद्धालु बाबा के दरबार तक पहुंचे हैं। पूरा देवघर हर ओर श्रद्धालुओं और आस्था से जगमगा उठा है।

तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, श्रद्धालु होटल या धर्मशाला में नहीं ठहरते, बल्कि खुले मैदान या सड़कों के किनारे ही रुकते हैं। मिथिलांचल की मान्यता है कि दामाद के घर जाकर सीधे ठहरना उचित नहीं होता। कई श्रद्धालु बिहार के सुल्तानगंज से गंगा जल लेकर 108 किलोमीटर की कठिन कांवड़ यात्रा पैदल करते हुए आए हैं। रास्ते भर नचारी और वैवाहिक गीत गाते हुए वे भोलेनाथ को रिझाते हैं।

बसंत पंचमी के दिन जलार्पण के साथ श्रद्धालु अपने खेत की पहली फसल की बाली और घर में बने शुद्ध घी का भोग अर्पित करेंगे। इसके बाद अबीर-गुलाल के साथ उत्सव मनाया जाएगा। मिथिलांचल में इस दिन से होली के आगमन की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन श्रृंगार पूजा से पहले बाबा पर फुलेल लगाया जाएगा और लक्ष्मी नारायण मंदिर में पुजारियों द्वारा तिलक की विधि संपन्न कराई जाएगी। इसके ठीक 25 दिन बाद महाशिवरात्रि पर भगवान शंकर और माता पार्वती का दिव्य विवाह रचाया जाएगा।

वहीं, श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन पूरी तरह सतर्क है और हर प्रकार की सुविधा और सुरक्षा का इंतजाम किया गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि सांस्कृतिक महत्व भी रखता है। प्रशासन द्वारा की गई व्यवस्थाएँ इस पवित्र स्थल की महत्ता को दर्शाती हैं।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बसंत पंचमी पर क्या विशेष आयोजन होता है?
बसंत पंचमी पर बाबा बैद्यनाथ का तिलकोत्सव मनाया जाता है, जिसमें श्रद्धालु जलार्पण और भोग अर्पित करते हैं।
श्रद्धालु देवघर में क्यों नहीं रुकते?
मिथिलांचल की मान्यता के अनुसार, श्रद्धालु दामाद के घर जाकर नहीं रुकते, बल्कि खुले में रुकते हैं।
कौन-कौन से क्षेत्र से श्रद्धालु आते हैं?
श्रद्धालु तिरहुत, दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, पूर्णिया, और नेपाल की तराई से आते हैं।
क्या श्रद्धालु यात्रा के दौरान गाना गाते हैं?
हाँ, श्रद्धालु यात्रा के दौरान नचारी और वैवाहिक गीत गाते हैं।
महाशिवरात्रि पर क्या होता है?
महाशिवरात्रि पर भगवान शंकर और माता पार्वती का विवाह उत्सव मनाया जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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