25 अक्टूबर 2026
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गणेश शंकर विद्यार्थी जयंती: कलम से अंग्रेजों को चुनौती देने वाले पत्रकार-शहीद, गांधी ने किया था नमन

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गणेश शंकर विद्यार्थी जयंती: कलम से अंग्रेजों को चुनौती देने वाले पत्रकार-शहीद, गांधी ने किया था नमन

सारांश

कलम को हथियार बनाने वाले पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की आज जयंती है। 'प्रताप' से अंग्रेजों की नींद उड़ाने वाले इस शहीद ने 1931 में कानपुर दंगों में हिंदू-मुस्लिम एकता की रक्षा करते हुए अपने प्राण गँवाए। गांधी ने उनके साहस को नमन किया था।

मुख्य बातें

गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को हुआ था; आज उनकी जयंती है।
उन्होंने 9 नवंबर 1913 को कानपुर से साप्ताहिक अखबार 'प्रताप' की स्थापना की।
'प्रताप' के जरिए किसानों, मजदूरों और शोषितों की समस्याओं को राष्ट्रीय मंच मिला।
भगत सिंह , चंद्रशेखर आजाद और बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों से उनका सीधा संपर्क था।
25 मार्च 1931 को कानपुर सांप्रदायिक दंगों में लोगों को बचाते हुए हिंसक भीड़ ने उनकी हत्या कर दी।
महात्मा गांधी ने उनके साहस और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति समर्पण के लिए गहरा सम्मान व्यक्त किया।

गणेश शंकर विद्यार्थी — भारत के उन स्वतंत्रता सेनानियों में से एक, जिन्होंने बंदूक नहीं, कलम उठाई और अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी। 26 अक्टूबर 1890 को जन्मे विद्यार्थी ने अपनी निर्भीक पत्रकारिता से किसानों, मजदूरों और शोषितों की आवाज को राष्ट्रीय मंच दिया। 25 मार्च 1931 को कानपुर में सांप्रदायिक हिंसा के बीच लोगों को बचाते हुए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर किए — एक बलिदान जिसे स्वयं महात्मा गांधी ने गहरे सम्मान के साथ नमन किया।

एक पत्रकार का जन्म और संघर्ष

विद्यार्थी के पिता जयनारायण शिक्षक थे और उर्दू व फारसी के जानकार थे। इस साहित्यिक परिवेश ने बालक गणेश में पढ़ने-लिखने की ललक जगाई। परिवार की आर्थिक तंगी के कारण औपचारिक शिक्षा अधूरी रही, लेकिन स्वाध्याय से उन्होंने ज्ञान अर्जित करना जारी रखा। नौकरी करते हुए भी उनकी लेखनी सक्रिय रही और धीरे-धीरे पत्रकारिता उनके जीवन का केंद्रीय उद्देश्य बन गई। उन्होंने अपने नाम के साथ 'विद्यार्थी' उपनाम जोड़ा — यह संकेत था कि सीखना उनके लिए आजीवन प्रक्रिया थी।

'प्रताप' — एक अखबार, एक आंदोलन

विद्यार्थी के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने 9 नवंबर 1913 को कानपुर से साप्ताहिक अखबार 'प्रताप' की स्थापना की। यह महज एक अखबार नहीं था — यह शोषितों की अदालत थी। चंपारण के किसानों की पीड़ा हो, मिल मजदूरों की दुर्दशा हो, जमींदारों के अत्याचार हों या रायबरेली में किसानों पर हुई गोलीबारी — विद्यार्थी ने हर मुद्दे को प्रमुखता दी। यह ऐसे समय में आया जब अंग्रेजी शासन के विरुद्ध खुलकर लिखना जानलेवा जोखिम था।

गौरतलब है कि 'प्रताप' का दफ्तर स्वाधीनता आंदोलन का एक अनौपचारिक केंद्र भी बन गया था। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों का विद्यार्थी से सीधा संपर्क था। इस प्रकार विद्यार्थी की पहचान केवल गांधीवादी विचारों तक सीमित नहीं थी — वे स्वतंत्रता संग्राम की हर धारा के सेतु थे।

जेल और मुकदमे — पर कलम नहीं रुकी

'प्रताप' की निर्भीक पत्रकारिता अंग्रेजी हुकूमत की आँखों में कांटे की तरह चुभती थी। विद्यार्थी को कई बार मुकदमों और कारावास का सामना करना पड़ा। उन्होंने असहयोग आंदोलन और होम रूल आंदोलन में भी सक्रिय भागीदारी निभाई। हर बार जेल से लौटने के बाद उनकी कलम और तीखी हो जाती थी। उनके लिए पत्रकारिता पेशा नहीं, जनता के प्रति अनुबंध था।

शहादत — हिंसा के बीच एकता की अंतिम कोशिश

23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी के बाद देश में तनाव का माहौल था। इसी दौरान कानपुर में भयावह सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। जब अधिकांश लोग सुरक्षित ठिकानों की तरफ भाग रहे थे, विद्यार्थी दंगाग्रस्त इलाकों में उतर गए। बताया जाता है कि उन्होंने हिंदू और मुस्लिम — दोनों समुदायों के लोगों को हिंसक भीड़ से बचाने की कोशिश की। 25 मार्च 1931 को इसी प्रयास में हिंसक भीड़ ने उनकी जान ले ली।

महात्मा गांधी उनकी मृत्यु से अत्यंत दुखी हुए। गांधी ने उनके साहस और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति उनके समर्पण के लिए गहरा सम्मान व्यक्त किया। यह वह शहादत थी जो किसी युद्धभूमि पर नहीं, बल्कि भाईचारे की रक्षा करते हुए मिली।

विरासत और प्रासंगिकता

गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता आज भी भारतीय प्रेस स्वतंत्रता के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है। वे यह साबित करने वाले पहले पत्रकारों में थे कि जनपक्षधर लेखनी किसी भी हथियार से अधिक प्रभावशाली हो सकती है। उनकी 26 अक्टूबर 2026 को पड़ने वाली जयंती पर उनका स्मरण केवल एक ऐतिहासिक औपचारिकता नहीं — बल्कि उस पत्रकारिता के मूल्यों की पुनः पुष्टि है जो सत्ता से नहीं, जनता से जवाबदेह हो।

संपादकीय दृष्टिकोण

विद्यार्थी की विरासत एक कसौटी है — न केवल साहस की, बल्कि उस पत्रकारिता की जो सत्ता नहीं, जनता की भाषा बोले। उनका 'प्रताप' महज अखबार नहीं था; वह एक जनांदोलन का मुखपत्र था जो गांधीवादी और क्रांतिकारी — दोनों धाराओं को एकसाथ आश्रय देता था। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि उनकी वैचारिक परिपक्वता का प्रमाण था।
RashtraPress
25 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गणेश शंकर विद्यार्थी कौन थे?
गणेश शंकर विद्यार्थी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनका जन्म 26 अक्टूबर 1890 को हुआ था। उन्होंने 1913 में कानपुर से 'प्रताप' अखबार की स्थापना कर किसानों, मजदूरों और शोषितों की आवाज को मंच दिया।
'प्रताप' अखबार क्यों महत्वपूर्ण था?
'प्रताप' की स्थापना 9 नवंबर 1913 को कानपुर से हुई थी। यह अखबार अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लिखने का साहस रखता था और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों का अनौपचारिक केंद्र भी बन गया था।
गणेश शंकर विद्यार्थी की मृत्यु कैसे हुई?
25 मार्च 1931 को कानपुर में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के दौरान विद्यार्थी हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों को बचाने के प्रयास में निकले। इसी दौरान हिंसक भीड़ ने उनकी हत्या कर दी।
महात्मा गांधी ने गणेश शंकर विद्यार्थी के बारे में क्या कहा था?
गांधी विद्यार्थी की मृत्यु से अत्यंत दुखी हुए थे। उन्होंने विद्यार्थी के साहस और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति उनके समर्पण के लिए गहरा सम्मान व्यक्त किया था।
गणेश शंकर विद्यार्थी का क्रांतिकारी आंदोलन से क्या संबंध था?
विद्यार्थी का भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों से सीधा संपर्क था। 'प्रताप' का दफ्तर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण ठिकाना बन गया था, जिससे वे गांधीवादी और क्रांतिकारी दोनों धाराओं के बीच सेतु बने।
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