इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: 'बधाई' वसूली को कानूनी मान्यता नहीं, किन्नर समुदाय की याचिका खारिज

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: 'बधाई' वसूली को कानूनी मान्यता नहीं, किन्नर समुदाय की याचिका खारिज

सारांश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि 'बधाई' या 'जजमानी' वसूली का कोई कानूनी आधार नहीं है — न ट्रांसजेंडर संरक्षण अधिनियम 2019 में, न किसी अन्य कानून में। गोंडा की किन्नर सदस्य रेखा देवी की याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने चेताया कि ऐसी राहत देना जबरन वसूली को वैधता देने जैसा होगा।

Key Takeaways

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 28 अप्रैल 2026 को किन्नर सदस्य रेखा देवी की रिट याचिका खारिज की।
  • याचिका में गोंडा जिले के जरवल और कर्नलगंज क्षेत्र में 'बधाई' वसूली के लिए विशेष क्षेत्रीय अधिकार की माँग थी।
  • जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने कहा— कानून की अनुमति के बिना किसी से भी धन वसूली का कोई अधिकार नहीं।
  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 या कोई अन्य कानून ऐसे 'जजमानी' दावों को मान्यता नहीं देता।
  • कोर्ट ने चेताया कि ऐसी राहत देना भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध मानी जाने वाली अवैध वसूली को वैधता देने जैसा होगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 28 अप्रैल 2026 को ट्रांसजेंडर (किन्नर) समुदाय की एक सदस्य द्वारा दायर रिट याचिका खारिज कर दी, जिसमें उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में पारंपरिक 'बधाई' या 'जजमानी' अधिकारों के लिए न्यायिक सुरक्षा और क्षेत्रीय सीमांकन की माँग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति या समूह कानून की अनुमति के बिना नागरिकों से धन वसूलने का कोई कानूनी या मौलिक अधिकार नहीं रखता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता रेखा देवी ने अदालत से माँग की थी कि जरवल कस्बे में 'काटी का पुल' से 'घाघरा घाट' तक और कर्नलगंज में 'सरयू पुल' तक के इलाके में 'बधाई' (शुभ अवसरों पर दिया जाने वाला दान) संग्रह के लिए उनके पक्ष में एक विशेष क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र घोषित किया जाए। याचिका में तर्क दिया गया था कि समुदाय के विभिन्न गुटों के बीच क्षेत्रीय दावों के टकराव के कारण जानलेवा हमले और गंभीर चोटों सहित हिंसक झड़पें हो चुकी हैं।

अदालत का निर्णय

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की डिवीजन बेंच ने राहत देने से इनकार कर दिया। बेंच ने कहा,

Point of View

लेकिन आजीविका के व्यावहारिक पहलुओं पर मौन है। अदालत ने 'जबरन वसूली' की भाषा का प्रयोग करते हुए एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है, परंतु सवाल यह भी उठता है कि जब तक राज्य इस समुदाय के लिए वैकल्पिक आजीविका के रास्ते नहीं खोलता, तब तक केवल कानूनी निषेध से समस्या का समाधान नहीं होगा।
NationPress
30/04/2026

Frequently Asked Questions

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किन्नर समुदाय की 'बधाई' याचिका क्यों खारिज की?
अदालत ने कहा कि न तो ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 और न ही कोई अन्य कानून किन्नर समुदाय को किसी क्षेत्र विशेष में 'बधाई' वसूली का विशेष अधिकार देता है। कानून की अनुमति के बिना किसी से भी धन संग्रह न्यायिक संरक्षण का पात्र नहीं है।
'बधाई' या 'जजमानी' अधिकार क्या होते हैं?
'बधाई' किन्नर समुदाय की वह परंपरा है जिसमें वे शुभ अवसरों जैसे विवाह, जन्म आदि पर घरों में जाकर आशीर्वाद देते हैं और बदले में दान या भेंट लेते हैं। 'जजमानी' एक पारंपरिक सेवा-क्षेत्र व्यवस्था है, परंतु भारतीय कानून इसे कोई संरक्षित अधिकार नहीं मानता।
इस मामले में याचिकाकर्ता ने क्या माँग की थी?
याचिकाकर्ता रेखा देवी ने गोंडा जिले के जरवल कस्बे में 'काटी का पुल' से 'घाघरा घाट' तक और कर्नलगंज में 'सरयू पुल' तक के क्षेत्र में 'बधाई' वसूली के लिए विशेष क्षेत्रीय अधिकार घोषित करने की माँग की थी, ताकि समुदाय के भीतर हिंसक विवाद रोके जा सकें।
अदालत ने जबरन वसूली का उल्लेख क्यों किया?
बेंच ने स्पष्ट किया कि ऐसी राहत देना भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध मानी जाने वाली अवैध वसूली को वैधता देने के समान होगा। कोर्ट ने चेताया कि इस तरह का न्यायिक हस्तक्षेप भविष्य में अन्य गैर-कानूनी समूहों के लिए गलत मिसाल बन सकता है।
ट्रांसजेंडर संरक्षण अधिनियम 2019 इस मामले में क्यों लागू नहीं हुआ?
अदालत ने दर्ज किया कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 ट्रांसजेंडर समुदाय के सामाजिक अधिकारों की बात करता है, लेकिन यह किसी विशेष क्षेत्र में 'जजमानी' या 'बधाई' वसूली के क्षेत्रीय अधिकार को न मान्यता देता है और न ही संरक्षण प्रदान करता है।
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