आईआईटी गुवाहाटी शोध: कार्यस्थल संस्कृति और नेतृत्व शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य को करते हैं सीधे प्रभावित
सारांश
Key Takeaways
आईआईटी गुवाहाटी के स्कूल ऑफ बिजनेस में हुए एक नए अध्ययन के अनुसार, स्कूलों की कार्यस्थल संस्कृति और नेतृत्व शैली सीधे शिक्षकों के भावनात्मक स्वास्थ्य और कार्य संतुष्टि को प्रभावित करती है। 1 मई 2026 को सामने आए इस शोध में पाया गया कि जब शिक्षक कार्यस्थल पर अपनी वास्तविक पहचान के साथ सहज नहीं रह पाते, तो उनमें तनाव और असंतोष बढ़ता है। यह अध्ययन भारतीय स्कूल शिक्षा प्रणाली में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है।
शोध की पृष्ठभूमि और पद्धति
यह शोध आईआईटी गुवाहाटी के सहायक प्रोफेसर डॉ. अब्राहम सिरिल इसाक और शोधार्थी एम.ए. जयशंकर ने मिलकर किया। शोधकर्ताओं ने 30 अलग-अलग शिक्षकों से विस्तृत बातचीत की और उनके जवाबों का गहन विश्लेषण किया। इसी आधार पर एक नया वैचारिक ढाँचा तैयार किया गया, जिसे 'शिक्षक कार्यस्थल प्रमाणिकता प्रभाव मॉडल' नाम दिया गया है।
मुख्य निष्कर्ष: कक्षा बनाम प्रशासन का द्वंद्व
शोध में एक अहम तथ्य उजागर हुआ — शिक्षक कक्षा में छात्रों के साथ बातचीत के दौरान सहज और खुले महसूस करते हैं। लेकिन जब संस्थागत दबाव या वरिष्ठ सहकर्मियों की उपस्थिति होती है, तो वे अपनी वास्तविक पहचान को दबा लेते हैं। यही असंतुलन कार्य संतुष्टि में कमी और भावनात्मक तनाव में वृद्धि का प्रमुख कारण बनता है।
शोध 'कार्यस्थल प्रमाणिकता' की अवधारणा पर केंद्रित है, यानी शिक्षक अपने असली स्वभाव में कितना सहज महसूस करते हैं। अध्ययन के अनुसार, भारतीय स्कूलों में मौजूद पदानुक्रम आधारित संस्कृति इस प्रमाणिकता को सबसे अधिक प्रभावित करती है। गौरतलब है कि नए शिक्षकों को इस दबाव का सबसे अधिक सामना करना पड़ता है।
आत्म-प्रमाणिकता से बेहतर होते हैं परिणाम
शोधकर्ताओं के अनुसार, जिन शिक्षकों में आत्म-प्रमाणिकता अधिक थी, वे कार्य में अधिक संतुष्ट पाए गए। ऐसे शिक्षक आलोचना और कार्यभार को बेहतर तरीके से संभालते हैं और संस्थान से उनका जुड़ाव भी मज़बूत रहता है। इसके विपरीत, दबावपूर्ण संस्कृति शिक्षकों को कमज़ोर बनाती है और उनकी कार्यक्षमता घटाती है।
डॉ. इसाक के अनुसार,