होर्मुज़ संकट में भारत ने पड़ोसियों को बिना शर्त ईंधन दिया, चीन ने बनाया राजनीतिक दबाव का हथियार
सारांश
Key Takeaways
मध्य पूर्व के सशस्त्र संघर्ष के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से उपजे वैश्विक ऊर्जा संकट ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि भारत और चीन संकट के समय अपने पड़ोसी देशों के साथ किस कदर अलग-अलग रवैया अपनाते हैं। डेली मिरर ऑनलाइन में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, जहाँ भारत ने अपनी 'पड़ोसी पहले' नीति के तहत बिना किसी राजनीतिक शर्त के ईंधन आपूर्ति जारी रखी, वहीं चीन ने इस संकट को अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए भुनाने की कोशिश की।
चीन की रणनीति: संकट को हथियार बनाना
डेली मिरर ऑनलाइन के लेख के अनुसार, बीजिंग ने मध्य पूर्व युद्ध के कारण वैश्विक ईंधन बाज़ार पर बढ़ते दबाव का फायदा उठाने की कोशिश की। चीन ने नए ईंधन निर्यात सौदों को रोकने का आदेश दिया और पहले से तय आपूर्ति को भी रद्द करने का प्रयास किया। इसका सीधा असर ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों पर पड़ा, जो चीनी ईंधन पर निर्भर थे और अचानक गंभीर आपूर्ति संकट में फँस गए।
लेख में कहा गया है कि चीन के पास कच्चे तेल का विशाल भंडार और सुदृढ़ नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र है, जिसके बलबूते वह इस संकट को अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से झेल सकता है। फिर भी, रिपोर्ट के मुताबिक, बीजिंग का आकलन था कि यदि पूरे क्षेत्र में ऊर्जा की कमी बनी रहती है, तो यह स्थिति उसके लिए रणनीतिक रूप से अधिक लाभदायक होगी।
ताइवान को शर्त के साथ प्रस्ताव, तत्काल अस्वीकृति
रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने इस मौके पर ताइवान को तेल आपूर्ति की पेशकश की, लेकिन इसके बदले में 'शांतिपूर्ण एकीकरण' की राजनीतिक शर्त जोड़ी। ताइवान ने इस प्रस्ताव को तत्काल अस्वीकार कर दिया। डेली मिरर ऑनलाइन के विश्लेषण के अनुसार,