होर्मुज़ संकट में भारत ने पड़ोसियों को बिना शर्त ईंधन दिया, चीन ने बनाया राजनीतिक दबाव का हथियार

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होर्मुज़ संकट में भारत ने पड़ोसियों को बिना शर्त ईंधन दिया, चीन ने बनाया राजनीतिक दबाव का हथियार

सारांश

होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने से उपजे ऊर्जा संकट ने भारत और चीन के बीच का फर्क साफ कर दिया। जहाँ चीन ने ईंधन को राजनीतिक दबाव का हथियार बनाया और ताइवान के सामने एकीकरण की शर्त रखी, वहीं भारत ने श्रीलंका, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश को बिना किसी शर्त के ईंधन आपूर्ति जारी रखी।

Key Takeaways

होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने से उपजे ऊर्जा संकट ने भारत और चीन के पड़ोसी नीति में बुनियादी अंतर उजागर किया। चीन ने नए ईंधन निर्यात सौदे रोके और ऑस्ट्रेलिया , बांग्लादेश , फिलीपींस को आपूर्ति संकट में डाला। ताइवान को तेल देने की पेशकश में चीन ने 'शांतिपूर्ण एकीकरण' की राजनीतिक शर्त जोड़ी, जिसे ताइवान ने तत्काल ठुकरा दिया। भारत ने श्रीलंका को करीब 38,000 मीट्रिक टन ईंधन भेजा और नेपाल , भूटान की आपूर्ति बिना रुके जारी रखी। बांग्लादेश को अतिरिक्त डीजल भेजा गया और पाइपलाइन के ज़रिए भविष्य में आपूर्ति जारी रखने का आश्वासन दिया गया। डेली मिरर ऑनलाइन के अनुसार, ये कदम भारत की ' पड़ोसी पहले ' नीति के व्यावहारिक प्रमाण हैं।

मध्य पूर्व के सशस्त्र संघर्ष के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से उपजे वैश्विक ऊर्जा संकट ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि भारत और चीन संकट के समय अपने पड़ोसी देशों के साथ किस कदर अलग-अलग रवैया अपनाते हैं। डेली मिरर ऑनलाइन में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, जहाँ भारत ने अपनी 'पड़ोसी पहले' नीति के तहत बिना किसी राजनीतिक शर्त के ईंधन आपूर्ति जारी रखी, वहीं चीन ने इस संकट को अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए भुनाने की कोशिश की।

चीन की रणनीति: संकट को हथियार बनाना

डेली मिरर ऑनलाइन के लेख के अनुसार, बीजिंग ने मध्य पूर्व युद्ध के कारण वैश्विक ईंधन बाज़ार पर बढ़ते दबाव का फायदा उठाने की कोशिश की। चीन ने नए ईंधन निर्यात सौदों को रोकने का आदेश दिया और पहले से तय आपूर्ति को भी रद्द करने का प्रयास किया। इसका सीधा असर ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों पर पड़ा, जो चीनी ईंधन पर निर्भर थे और अचानक गंभीर आपूर्ति संकट में फँस गए।

लेख में कहा गया है कि चीन के पास कच्चे तेल का विशाल भंडार और सुदृढ़ नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र है, जिसके बलबूते वह इस संकट को अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से झेल सकता है। फिर भी, रिपोर्ट के मुताबिक, बीजिंग का आकलन था कि यदि पूरे क्षेत्र में ऊर्जा की कमी बनी रहती है, तो यह स्थिति उसके लिए रणनीतिक रूप से अधिक लाभदायक होगी।

ताइवान को शर्त के साथ प्रस्ताव, तत्काल अस्वीकृति

रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने इस मौके पर ताइवान को तेल आपूर्ति की पेशकश की, लेकिन इसके बदले में 'शांतिपूर्ण एकीकरण' की राजनीतिक शर्त जोड़ी। ताइवान ने इस प्रस्ताव को तत्काल अस्वीकार कर दिया। डेली मिरर ऑनलाइन के विश्लेषण के अनुसार,

Point of View

लेकिन यह ध्यान देना ज़रूरी है कि भारत की यह उदारता पूरी तरह निःस्वार्थ नहीं है — दक्षिण एशिया में रणनीतिक प्रभाव बनाए रखना भी इसका एक प्रमुख उद्देश्य है। चीन की आक्रामक ऊर्जा कूटनीति निश्चित रूप से अल्पकालिक रूप से उसके पड़ोसियों को नुकसान पहुँचाती है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से यह उसकी क्षेत्रीय विश्वसनीयता को भी कमज़ोर करती है। भारत के लिए असली परीक्षा यह है कि क्या वह इस कूटनीतिक पूँजी को ठोस आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी में बदल पाता है, या यह सद्भावना महज़ संकटकालीन राहत तक सिमटी रह जाती है।
NationPress
01/05/2026

Frequently Asked Questions

होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने से ऊर्जा संकट कैसे पैदा हुआ?
मध्य पूर्व के सशस्त्र संघर्ष के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद हो गया, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है। इससे वैश्विक ईंधन बाज़ार पर भारी दबाव पड़ा और कई देशों में ऊर्जा आपूर्ति संकट उत्पन्न हो गया।
भारत ने ऊर्जा संकट के दौरान अपने पड़ोसियों की कैसे मदद की?
डेली मिरर ऑनलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने श्रीलंका को करीब 38,000 मीट्रिक टन ईंधन भेजा। नेपाल और भूटान को ईंधन आपूर्ति बिना किसी रुकावट के जारी रही, और बांग्लादेश को अतिरिक्त डीजल के साथ पाइपलाइन से भविष्य में आपूर्ति का भरोसा दिया गया।
चीन ने ऊर्जा संकट में ताइवान के सामने क्या शर्त रखी?
रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने ताइवान को तेल आपूर्ति की पेशकश की, लेकिन इसके बदले में 'शांतिपूर्ण एकीकरण' की राजनीतिक शर्त रखी। ताइवान ने इस प्रस्ताव को तत्काल अस्वीकार कर दिया।
भारत की 'पड़ोसी पहले' नीति क्या है?
'पड़ोसी पहले' नीति भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख स्तंभ है, जिसके तहत भारत अपने पड़ोसी देशों — नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि — को प्राथमिकता के आधार पर आर्थिक, ऊर्जा और मानवीय सहायता प्रदान करता है। डेली मिरर ऑनलाइन के अनुसार, यह नीति बिना किसी राजनीतिक शर्त या दबाव के लागू की जाती है।
चीन के ईंधन प्रतिबंध से कौन से देश प्रभावित हुए?
रिपोर्ट के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देश सबसे अधिक प्रभावित हुए, क्योंकि वे चीनी ईंधन आपूर्ति पर निर्भर थे। चीन द्वारा नए सौदे रोकने और पुरानी आपूर्ति रद्द करने की कोशिश से ये देश अचानक गंभीर ऊर्जा संकट में फँस गए।
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