झांसी में दीपावली पर मिट्टी के दीयों की मांग बरकरार, महंगाई से कुम्हारों की कमाई पर असर
सारांश
मुख्य बातें
झांसी में दीपावली 2026 से पहले बाज़ारों में रौनक तो है, लेकिन उत्तर प्रदेश के इस शहर के कुम्हार परिवार बढ़ती लागत और सुस्त बिक्री की दोहरी मार झेल रहे हैं। पारंपरिक मिट्टी के दीयों की माँग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, मगर महंगाई के कारण ग्राहक और कारीगर — दोनों सीमित बजट में त्योहार मनाने को मजबूर हैं।
कुम्हारों की मेहनत, लेकिन बिक्री उम्मीद से कम
झांसी के कुम्हार परिवार दीपावली से हफ्तों पहले से दिन-रात दीये और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ तैयार करने में जुटे हैं। उन्होंने बड़ी संख्या में माल तैयार कर रखा है, लेकिन बाज़ार में अपेक्षित खरीदारी नहीं हो रही। कारीगरों को चिंता है कि यदि तैयार सामान समय पर नहीं बिका, तो उनकी मेहनत और लगाई गई पूँजी — दोनों पर असर पड़ेगा।
लागत बढ़ी, मुनाफा घटा
कुम्हार किशोरीलाल प्रजापति ने बताया, 'एक हज़ार दीये बनाने में लगभग ₹200–250 का खर्च आता है, लेकिन अभी बिक्री बहुत कम है। एक बार हमें सरकारी योजना के तहत सिर्फ चाक मिला था।' उन्होंने यह भी कहा कि मिट्टी की उपलब्धता सबसे बड़ी समस्या बन गई है — बर्तन और दीये बनाने लायक गुणवत्ता की मिट्टी अब पहले जैसी नहीं मिलती।
एक महिला कारीगर ने बताया कि मिट्टी की किल्लत, ईंधन की बढ़ती कीमत और रंग-सामान की महंगाई के बीच उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि मेहनत के अनुपात में आमदनी नहीं हो पा रही। मिट्टी, रंग और ईंधन — तीनों की कीमतें बढ़ने से पारंपरिक शिल्प का आर्थिक समीकरण बिगड़ता जा रहा है।
ग्राहकों पर भी महंगाई की मार
दीपावली की खरीदारी करने पहुँच रहे ग्राहक भी सीमित बजट में त्योहार मनाने की कोशिश कर रहे हैं। एक ग्राहक ने बताया, '10 रुपए में 15 दीये मिल रहे हैं, फिर भी महंगाई के कारण हम दीये भी कम खरीद रहे हैं।' लोगों का कहना है कि रोज़मर्रा के बढ़ते खर्च के बीच त्योहार का बजट घटाना मजबूरी बन गई है।
परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन
बाज़ार में एक साथ दो रुझान देखे जा रहे हैं — कुछ लोग पारंपरिक मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता दे रहे हैं, तो कुछ रंग-बिरंगी इलेक्ट्रॉनिक झालरों और एलईडी सजावट की ओर मुड़ रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब 'वोकल फॉर लोकल' और स्थानीय कारीगरों को बढ़ावा देने की बात जोर-शोर से की जाती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में कुम्हार समुदाय अपनी आजीविका की लड़ाई लड़ रहा है।
आगे क्या
गौरतलब है कि कुम्हार समुदाय ने सरकारी सहायता की माँग की है — विशेषकर गुणवत्तापूर्ण मिट्टी की आपूर्ति और बाज़ार तक सीधी पहुँच सुनिश्चित करने के लिए। यदि उत्पादन लागत और बिक्री के बीच की खाई नहीं पाटी गई, तो यह पीढ़ियों पुराना शिल्प धीरे-धीरे दम तोड़ सकता है। दीपावली के बाद कुम्हार परिवारों की आर्थिक स्थिति इस त्योहारी सीज़न की असली परीक्षा होगी।