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काशीपुर के कुम्हारों पर दोहरा संकट: चीनी लाइटों और मिट्टी की कमी से घट रही दीयों की बिक्री

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काशीपुर के कुम्हारों पर दोहरा संकट: चीनी लाइटों और मिट्टी की कमी से घट रही दीयों की बिक्री

सारांश

काशीपुर के कुम्हार इस दीपावली चीनी लाइटों और मिट्टी की किल्लत के बीच पिस रहे हैं। ₹10 दर्जन के दाम पर भी ग्राहक मोलभाव करते हैं, बारिश ने माल बर्बाद किया, और ज़मीन न होने से कच्चा माल मिलना मुश्किल है। प्रजापति समाज की सरकार से एक ही गुज़ारिश — भूमि दो, हुनर बचाओ।

मुख्य बातें

काशीपुर, उत्तराखंड के कुम्हार इलेक्ट्रिक और चीनी सजावटी लाइटों की प्रतिस्पर्धा के कारण मिट्टी के दीयों की घटती बिक्री से जूझ रहे हैं।
कुम्हार अनिता ने बताया कि बारिश से उपले भीगे और कच्चे बर्तन खराब हुए, जिससे दो महीने की मेहनत पर नुकसान हुआ।
छोटे दीये ₹10 प्रति दर्जन और बड़े दीये ₹5 प्रति नग की दर से बिकते हैं, फिर भी ग्राहक मोलभाव करते हैं।
कुम्हार सोनू कुमार प्रजापति ने सरकार से भूमि आवंटन और मिट्टी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की माँग की।
प्रजापति समाज ने खुद को पिछड़े वर्गों में सबसे गरीब बताते हुए नीतिगत सहायता की अपील की।

काशीपुर, उत्तराखंड में पारंपरिक मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार समुदाय इस दीपावली 2026 में गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। इलेक्ट्रिक सजावटी लाइटों और चीनी झालरों की बढ़ती माँग के चलते मिट्टी के दीयों की बिक्री में भारी गिरावट आई है, जबकि उपयुक्त मिट्टी की किल्लत और बारिश से हुई क्षति ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।

महीनों की मेहनत, पर नुकसान ही हाथ

स्थानीय कुम्हार अनिता ने बताया कि वह दीपावली की तैयारी दो माह पहले से शुरू कर देती हैं और इस वर्ष भी विभिन्न प्रकार के मिट्टी के दीये तैयार किए गए। हालाँकि, बेमौसम बारिश ने उनकी कड़ी मेहनत पर पानी फेर दिया — उपले भीग गए और कच्चे मिट्टी के बर्तन खराब हो गए, जिससे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा।

अनिता ने यह भी बताया कि हर वस्तु की कीमतें बढ़ती महँगाई के साथ बढ़ रही हैं, लेकिन मिट्टी के दीयों के दाम में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही। उनके अनुसार, बाज़ार में चीनी सजावटी लाइटों की भरमार के कारण अब ग्राहक दीये खरीदने से कतराने लगे हैं।

प्रजापति समाज की पुकार: ज़मीन दो, अस्तित्व बचाओ

एक अन्य कुम्हार सोनू कुमार प्रजापति ने बताया कि दीपावली के लिए दीये बनाने की प्रक्रिया 2 से 3 माह पहले से शुरू हो जाती है, जिसमें सभी प्रकार के पारंपरिक दीयों का निर्माण किया जाता है। उन्होंने कहा कि प्रजापति समाज इस पर्व में रोशनी फैलाने में अहम भूमिका निभाता है।

सोनू कुमार प्रजापति ने सरकार से अपील करते हुए कहा कि 'प्रजापति समाज को भूमि दी जाए और हमारे बारे में सोचा जाए। हमारे पास भूमि नहीं है, मिट्टी की बहुत दिक्कत रहती है।' उन्होंने यह भी कहा कि प्रजापति समाज पिछड़े वर्गों में सबसे गरीब माना जाता है।

दाम इतने कम, फिर भी होती है मोलभाव

दीयों की कीमत के बारे में सोनू कुमार प्रजापति ने बताया कि छोटे दीये ₹10 प्रति दर्जन और बड़े व अन्य दीये ₹5 प्रति नग के हिसाब से बेचे जाते हैं। इतनी मामूली कीमत के बावजूद कई ग्राहक मोलभाव करने से नहीं चूकते, जिससे कुम्हारों की आमदनी और भी सिकुड़ जाती है।

गौरतलब है कि यह संकट सिर्फ काशीपुर तक सीमित नहीं है — देश के कई हिस्सों में कुम्हार समुदाय बाज़ार में बदलते चलन और आयातित उत्पादों की बाढ़ के सामने असहाय महसूस कर रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब 'वोकल फॉर लोकल' और स्थानीय दस्तकारों को प्रोत्साहन देने की बात हर मंच पर की जाती है।

क्या होगा आगे

विशेषज्ञों के अनुसार, कुम्हार समुदाय को सरकारी सहायता, उचित भूमि आवंटन और मिट्टी की आपूर्ति सुनिश्चित करने की ज़रूरत है। साथ ही, उपभोक्ताओं को स्थानीय पारंपरिक उत्पादों की ओर प्रेरित करने के लिए जागरूकता अभियान भी ज़रूरी है। यदि नीतिगत हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो आने वाले वर्षों में इस पुश्तैनी कला का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस पूरे तंत्र की विफलता है जो दस्तकारों को बाज़ार से जोड़ने का दावा करता है। भूमि और मिट्टी की माँग कोई नई नहीं है, लेकिन हर दीपावली पर यही दर्द दोहराया जाता है और सुर्खियाँ बनाकर भुला दिया जाता है।
RashtraPress
5 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

काशीपुर के कुम्हारों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?
काशीपुर के कुम्हारों को मुख्य रूप से तीन समस्याएँ हैं — चीनी सजावटी लाइटों और इलेक्ट्रिक लाइटों से प्रतिस्पर्धा, उपयुक्त मिट्टी की कमी, और बारिश से कच्चे माल को हुआ नुकसान। इन सबके चलते दीयों की बिक्री में गिरावट आई है और आमदनी घट रही है।
काशीपुर में मिट्टी के दीये कितने में बिकते हैं?
काशीपुर में छोटे मिट्टी के दीये ₹10 प्रति दर्जन और बड़े व अन्य प्रकार के दीये ₹5 प्रति नग के हिसाब से बेचे जाते हैं। इतनी कम कीमत के बावजूद कई ग्राहक मोलभाव करते हैं, जिससे कुम्हारों की आजीविका और प्रभावित होती है।
प्रजापति समाज ने सरकार से क्या माँग की है?
प्रजापति समाज के कुम्हारों ने सरकार से भूमि आवंटन और मिट्टी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की माँग की है। उनका कहना है कि ज़मीन न होने और मिट्टी की दिक्कत के कारण पारंपरिक दीये बनाना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।
दीपावली से पहले कुम्हार कितने समय से तैयारी करते हैं?
काशीपुर के कुम्हार दीपावली की तैयारी 2 से 3 माह पहले से शुरू कर देते हैं। इस दौरान विभिन्न प्रकार के पारंपरिक मिट्टी के दीये तैयार किए जाते हैं, लेकिन इस वर्ष बेमौसम बारिश ने महीनों की मेहनत को नुकसान पहुँचाया।
चीनी लाइटों का कुम्हारों पर क्या असर पड़ रहा है?
बाज़ार में चीनी सजावटी लाइटों की उपलब्धता के कारण उपभोक्ता अब पारंपरिक मिट्टी के दीयों की जगह इन्हें प्राथमिकता देने लगे हैं। इससे कुम्हारों की बिक्री घट रही है और उनकी आजीविका पर सीधा असर पड़ रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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