पिपरवार में हाईवा से कुचलकर मौत: 30 घंटे से शव लेकर धरने पर ग्रामीण, 20 लाख मुआवजे की मांग

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पिपरवार में हाईवा से कुचलकर मौत: 30 घंटे से शव लेकर धरने पर ग्रामीण, 20 लाख मुआवजे की मांग

सारांश

झारखंड के चतरा में पिपरवार हाईवा हादसे में उरेश लोहार की मौत के बाद ग्रामीण 30 घंटे से शव लेकर धरने पर हैं। ₹20 लाख मुआवजा, नो-एंट्री और ओवरलोडिंग पर रोक की मांग। प्रशासन की उदासीनता से तनाव चरम पर।

Key Takeaways

  • 23 अप्रैल 2025 को झारखंड के चतरा जिले में पिपरवार के पास कोयला हाईवा की चपेट में आने से उरेश लोहार की मौत हो गई।
  • हादसे के 30 घंटे से अधिक समय बाद भी ग्रामीण शव लेकर टंडवा-पिपरवार मुख्य मार्ग पर धरने पर डटे हैं।
  • प्रदर्शनकारियों ने मृतक परिजनों को ₹20 लाख मुआवजा, हाईवा की नो-एंट्री और ओवरलोडिंग पर रोक की मांग रखी है।
  • सांसद प्रतिनिधि दिलीप कुमार अम्बष्ट धरना स्थल पर पहुंचे और समाधान का आश्वासन दिया, लेकिन कोई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी नहीं आया।
  • सड़क जाम के कारण शादी-विवाह के मौसम में यात्री, मरीज और व्यापारी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
  • ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि मांगें पूरी न होने तक आंदोलन जारी रहेगा, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण होने की आशंका है।

झारखंड के चतरा जिले में टंडवा-पिपरवार मुख्य मार्ग पर बुधवार, 23 अप्रैल 2025 को कोयला ढुलाई में लगे एक अनियंत्रित हाईवा वाहन ने उरेश लोहार उर्फ सुरेश लोहरा को कुचल दिया, जिससे उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। हादसे के 30 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी क्षेत्र के ग्रामीण शव के साथ धरने पर डटे हैं और प्रशासन की चुप्पी से तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

घटनाक्रम: कैसे हुई दुर्घटना

पिपरवार थाना क्षेत्र के कारो गांव के समीप यह दर्दनाक हादसा हुआ। मृतक उरेश लोहार चिरैयाटांड़ टांड़ के निवासी थे। कोयला खदानों से ढुलाई करने वाले भारी वाहन — जिन्हें स्थानीय भाषा में 'हाईवा' कहा जाता है — इस मार्ग पर बेरोकटोक चलते हैं और अक्सर ओवरलोड होते हैं।

घटना के तुरंत बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने टंडवा-पिपरवार मुख्य मार्ग पर सड़क जाम कर दिया। पोस्टमार्टम के बाद शव को भी धरना स्थल पर रखकर प्रदर्शन जारी रखा गया, जो इस क्षेत्र में भारी वाहनों से होने वाली मौतों के प्रति ग्रामीणों के दीर्घकालिक आक्रोश की अभिव्यक्ति है।

ग्रामीणों की प्रमुख मांगें

प्रदर्शनकारी ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने स्पष्ट मांगें रखी हैं। इनमें शामिल हैं:

• मृतक के परिजनों को ₹20 लाख का मुआवजा
• मुख्य मार्ग पर कोयला वाहनों की नो-एंट्री लागू करना
• वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था करना
• हाईवा वाहनों की ओवरलोडिंग पर सख्त रोक लगाना

ग्रामीणों का कहना है कि कोयला ढुलाई में लगे भारी वाहनों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है और इस मार्ग पर आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। यह कोई पहली घटना नहीं है — स्थानीय लोगों के अनुसार, इस मार्ग पर पहले भी कई जानें जा चुकी हैं।

राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक उदासीनता

चतरा संसदीय क्षेत्र के सांसद प्रतिनिधि दिलीप कुमार अम्बष्ट धरना स्थल पर पहुंचे और ग्रामीणों से बातचीत की। उन्होंने प्रशासन से वार्ता कर समाधान निकालने का आश्वासन दिया।

हालांकि, समाचार लिखे जाने तक कोई वरिष्ठ जिला प्रशासनिक अधिकारी धरना स्थल पर नहीं पहुंचा था। न ही कोयला परिवहन से जुड़े जिम्मेदार पक्षों — खदान प्रबंधन या ठेकेदारों — ने पीड़ित परिवार से संपर्क करने की पहल की। यह प्रशासनिक उदासीनता ग्रामीणों के गुस्से को और भड़का रही है।

आम जनता पर असर: यातायात ठप

सड़क जाम के कारण टंडवा-पिपरवार मुख्य मार्ग के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गई हैं। शादी-विवाह के मौसम में यातायात पहले से बढ़ा हुआ है, जिससे आम यात्रियों, मरीजों और व्यापारियों को भारी परेशानी हो रही है।

लोग वैकल्पिक रास्तों का सहारा लेने को मजबूर हैं, जो अक्सर कच्चे और लंबे होते हैं। ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि जब तक उनकी सभी मांगें पूरी नहीं होतीं, आंदोलन जारी रहेगा

गहरा सवाल: कोयला माफिया और सड़क सुरक्षा की अनदेखी

झारखंड कोयला उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों में से एक है, लेकिन इस समृद्धि की कीमत अक्सर स्थानीय ग्रामीण चुकाते हैं। पिपरवार क्षेत्र में कोयला खदानों की बड़ी संख्या है और यहां से गुजरने वाले भारी वाहनों की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है।

आलोचकों का कहना है कि कोयला ठेकेदारों और परिवहन माफिया के राजनीतिक संबंधों के कारण ओवरलोडिंग और यातायात नियमों के उल्लंघन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। जिस मार्ग पर ये वाहन चलते हैं, वह ग्रामीण आबादी का रोजमर्रा का रास्ता भी है — यह विरोधाभास ही इस त्रासदी की जड़ है।

यदि प्रशासन ने शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए तो यह आंदोलन व्यापक रूप ले सकता है और अन्य प्रभावित गांव भी इसमें शामिल हो सकते हैं।

Point of View

बल्कि झारखंड के कोयला क्षेत्रों में दशकों से चली आ रही उस व्यवस्थागत विफलता का प्रतीक है जहां खनन का मुनाफा कुछ लोगों की जेब में जाता है और उसकी कीमत स्थानीय ग्रामीण अपनी जान देकर चुकाते हैं। जिस मार्ग पर ओवरलोड हाईवा बेरोकटोक दौड़ते हैं, उसी मार्ग पर बच्चे स्कूल जाते हैं और महिलाएं बाजार — यह विरोधाभास प्रशासन की मिलीभगत के बिना संभव नहीं। 30 घंटे बाद भी कोई वरिष्ठ अधिकारी न पहुंचना यह बताता है कि सिस्टम की प्राथमिकता में ग्रामीण जीवन कहां है। मुख्यधारा की मीडिया इसे 'स्थानीय विरोध' बताकर छोड़ देगी, लेकिन असली कहानी कोयला परिवहन नेटवर्क और राजनीतिक संरक्षण की है जिसकी जांच होनी चाहिए।
NationPress
23/04/2026

Frequently Asked Questions

पिपरवार हाईवा हादसे में किसकी मौत हुई?
चतरा जिले के पिपरवार थाना क्षेत्र में कारो गांव के समीप हुए हादसे में चिरैयाटांड़ टांड़ निवासी उरेश लोहार उर्फ सुरेश लोहरा की मौत हुई। कोयला ढुलाई में लगे एक अनियंत्रित हाईवा वाहन ने उन्हें कुचल दिया और वे मौके पर ही दम तोड़ गए।
पिपरवार में ग्रामीण किन मांगों को लेकर धरने पर हैं?
ग्रामीण मृतक के परिजनों को ₹20 लाख मुआवजा, मुख्य मार्ग पर कोयला वाहनों की नो-एंट्री, वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था और हाईवा वाहनों की ओवरलोडिंग पर सख्त रोक की मांग कर रहे हैं। जब तक मांगें नहीं मानी जातीं, आंदोलन जारी रहेगा।
चतरा में हाईवा हादसे के बाद प्रशासन ने क्या कार्रवाई की?
हादसे के 30 घंटे बाद भी कोई वरिष्ठ जिला प्रशासनिक अधिकारी धरना स्थल पर नहीं पहुंचा। सांसद प्रतिनिधि दिलीप कुमार अम्बष्ट ने जरूर ग्रामीणों से मुलाकात कर समाधान का आश्वासन दिया, लेकिन ठोस कार्रवाई अभी तक नहीं हुई।
पिपरवार में सड़क जाम से किसे परेशानी हो रही है?
टंडवा-पिपरवार मुख्य मार्ग पर सड़क जाम के कारण दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गई हैं। शादी-विवाह के मौसम में यात्रियों, मरीजों और व्यापारियों को भारी परेशानी हो रही है और लोग लंबे वैकल्पिक रास्तों से जाने को मजबूर हैं।
झारखंड में कोयला हाईवा से दुर्घटनाएं क्यों होती हैं?
झारखंड के कोयला खनन क्षेत्रों में भारी वाहन अक्सर ओवरलोड होकर और यातायात नियमों की अनदेखी करते हुए चलते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि कोयला ठेकेदारों और परिवहन माफिया पर राजनीतिक संरक्षण के कारण कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती।
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