कर्नाटक कांग्रेस में बड़ी खींचतान: शिवकुमार दिल्ली में गांधी परिवार से मिले, सिद्दारमैया ने बुलाई गुप्त बैठक
सारांश
Key Takeaways
- 24 अप्रैल को उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार भाई डीके सुरेश के साथ दिल्ली पहुंचे और गांधी परिवार के नेताओं से मुलाकात की।
- मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने बेंगलुरु के कनिंघम रोड पर जी. परमेश्वर, के. एच. मुनियप्पा, सतीश जरकीहोली, जमीर अहमद खान और दिनेश गुंडू राव के साथ गुप्त बैठक की।
- दावणगेरे उपचुनाव विवाद ने कांग्रेस के दोनों खेमों के बीच की दरार को नई धार दी है।
- शिवकुमार ने संकेत दिया कि 20 मई से पहले 'अप्रत्याशित घटनाक्रम' हो सकता है और कैबिनेट फेरबदल संभव है।
- यतींद्र सिद्दारमैया ने दावा किया कि उनके पिता पूरे पांच साल सीएम रहेंगे, जबकि शिवकुमार समर्थक विधायक इसी कार्यकाल में बदलाव की बात कर रहे हैं।
- कांग्रेस हाईकमान का रुख ही तय करेगा कि कर्नाटक में सत्ता समीकरण किस दिशा में जाएगा।
बेंगलुरु, 24 अप्रैल — कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर सत्ता संघर्ष एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार जहां दिल्ली पहुंचकर गांधी परिवार के शीर्ष नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने बेंगलुरु के कनिंघम रोड स्थित एक निजी स्थान पर अपने विश्वस्त मंत्रियों के साथ 24 अप्रैल को बंद कमरे में अहम मंत्रणा की। यह घटनाक्रम दावणगेरे उपचुनाव के बाद पार्टी के भीतर उभरे नए तनाव की परिणति माना जा रहा है।
दावणगेरे उपचुनाव बना विवाद की जड़
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, दावणगेरे उपचुनाव को लेकर उठे विवाद ने पार्टी के भीतर दोनों खेमों के बीच की दरार को और गहरा कर दिया है। शिवकुमार खेमे ने इस मुद्दे को सिद्दारमैया समर्थकों के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
दूसरी ओर, सिद्दारमैया खेमे की ओर से भी जल्द जवाबी रणनीति सामने आने के संकेत मिल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उपचुनाव के नतीजों के बाद नेतृत्व परिवर्तन की बहस फिर से तेज हो सकती है।
शिवकुमार का दिल्ली दौरा और हाईकमान से संपर्क
डीके शिवकुमार अपने भाई डीके सुरेश के साथ दिल्ली रवाना हुए। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस हाईकमान हाल तक पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में व्यस्त था। अब जब वे चुनाव लगभग संपन्न हो चुके हैं, तब शिवकुमार का दिल्ली पहुंचना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
दिल्ली से शिवकुमार ने कहा कि उन्हें सिद्दारमैया की बैठक की कोई जानकारी नहीं है और वे 'करीबी या दूर' का भेद नहीं करते। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सरकार के तीन साल पूरे होने पर कैबिनेट फेरबदल हो सकता है और 20 मई से पहले कुछ 'अप्रत्याशित घटनाक्रम' भी संभव हैं।
सिद्दारमैया की गुप्त बैठक में कौन-कौन शामिल हुए
मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने बेंगलुरु के कनिंघम रोड पर एक निजी स्थान पर बंद कमरे में बैठक बुलाई। इसमें जी. परमेश्वर, के. एच. मुनियप्पा, सतीश जरकीहोली, जमीर अहमद खान और दिनेश गुंडू राव सहित कई वरिष्ठ मंत्री मौजूद रहे।
सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में कैबिनेट फेरबदल और पार्टी के अंदरूनी मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। यह चिंता भी जताई गई कि मुख्यमंत्री के करीबी नेताओं को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है और उनकी चुप्पी स्थिति को और पेचीदा बना रही है।
समर्थकों के बयानों में साफ दिखती है दरार
दोनों नेता सार्वजनिक रूप से एकजुटता का दिखावा करते हैं, लेकिन उनके समर्थक विधायकों के बयान इस एकता की पोल खोल देते हैं। सिद्दारमैया के बेटे और कांग्रेस एमएलसी यतींद्र सिद्दारमैया ने दावा किया कि उनके पिता पूरे पांच साल तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
दूसरी ओर, शिवकुमार समर्थक विधायकों का कहना है कि मौजूदा कार्यकाल में ही शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलेगी। यह बयानबाजी दर्शाती है कि दोनों खेमों के बीच सत्ता का यह खेल किसी समझौते पर नहीं, बल्कि दबाव की राजनीति पर टिका है।
ऐतिहासिक संदर्भ और व्यापक राजनीतिक तस्वीर
गौरतलब है कि 2023 में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ही सिद्दारमैया और शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर अनकहा तनाव बना हुआ है। हाईकमान ने उस समय सिद्दारमैया को मुख्यमंत्री और शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाकर एक अस्थायी संतुलन बनाया था। लेकिन यह व्यवस्था शुरू से ही विवादों में घिरी रही।
यह स्थिति राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चले सत्ता संघर्ष की याद दिलाती है, जहां आंतरिक कलह अंततः पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाती रही। कर्नाटक में भी यही खतरा मंडरा रहा है — जहां एक ओर गारंटी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं नेतृत्व की अनिश्चितता सरकारी कामकाज को प्रभावित कर सकती है।
बजट के बाद सीएम सिद्दारमैया ने कहा था कि राज्य की जनता चाहती है कि वे मुख्यमंत्री बने रहें, लेकिन अंतिम निर्णय पार्टी हाईकमान का होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अवसर मिला तो वे दो और बजट पेश करने के लिए तैयार हैं — जो स्पष्ट रूप से पांच साल तक बने रहने की उनकी मंशा जाहिर करता है।
आने वाले दिनों में 20 मई से पहले कर्नाटक की राजनीति में बड़े बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस हाईकमान किस खेमे को तरजीह देता है, यह न केवल कर्नाटक की सत्ता समीकरण बल्कि दक्षिण भारत में पार्टी की रणनीतिक दिशा भी तय करेगा।