मणिपुर: बम हमले में मारे गए दो मासूमों के शव 19 दिन बाद भी मुर्दाघर में, सीएम ने परिजनों से की अपील
सारांश
Key Takeaways
- 7 अप्रैल को बिष्णुपुर के ट्रोंगलाओबी गांव में बम हमले में 5 वर्षीय लड़के और 6 महीने की बच्ची की मौत हुई, मां गंभीर रूप से घायल हुईं।
- दोनों बच्चों के शव 19 दिनों से मुर्दाघर में हैं; परिवार ने दोषियों की गिरफ्तारी तक शव न लेने की शर्त रखी है।
- सीएम युमनम खेमचंद सिंह ने परिजनों से शव स्वीकार करने की अपील की और कहा कि सुरक्षा एजेंसियां दिन-रात ऑपरेशन चला रही हैं।
- COCOMI के नेतृत्व में इंफाल में हजारों लोगों ने विरोध रैली निकाली; पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया।
- बिष्णुपुर बम हमले और 18 अप्रैल के उखरुल हमले दोनों की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंपी गई।
- गृह मंत्री कोंथौजम गोविंददास सिंह ने COCOMI के सात सूत्री ज्ञापन पर सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।
इंफाल, 25 अप्रैल। मणिपुर के मुख्यमंत्री युमनम खेमचंद सिंह ने शनिवार को बिष्णुपुर जिले के ट्रोंगलाओबी गांव में हुए बम हमले में मारे गए दो मासूम बच्चों के परिजनों से भावुक अपील की कि वे अपने बच्चों के शव स्वीकार करें, जो पिछले 19 दिनों से मुर्दाघर में रखे हुए हैं। यह अपील ऐसे समय में आई जब इंफाल घाटी में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए और प्रदर्शनकारियों व सुरक्षा बलों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया।
बम हमले की पृष्ठभूमि और परिवार का रुख
7 अप्रैल की रात को बिष्णुपुर जिले के ट्रोंगलाओबी गांव में उस समय दिल दहला देने वाली घटना हुई, जब पीड़ित परिवार गहरी नींद में सो रहा था। कुछ संदिग्ध कुकी उग्रवादियों ने उनके घर पर एक शक्तिशाली बम फेंका। इस नृशंस हमले में 5 वर्षीय एक मासूम लड़के और उसकी 6 महीने की नवजात बहन की मौत हो गई, जबकि उनकी मां गंभीर रूप से घायल हो गईं।
पीड़ित परिवार ने शुरू से ही साफ कर दिया था कि जब तक हमले के दोषियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार और सजा नहीं दी जाती, तब तक वे अपने बच्चों के शव स्वीकार नहीं करेंगे। यह शर्त न्याय की मांग का एक मार्मिक प्रतीक बन गई है।
इंफाल घाटी में उबाल — हजारों लोग सड़कों पर
शनिवार को कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी (सीओसीओएमआई) के आह्वान पर इंफाल घाटी के विभिन्न हिस्सों से हजारों लोग — जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल थीं — एकत्रित हुए। सीओसीओएमआई मैतेई समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली एक प्रमुख शीर्ष संस्था है।
प्रदर्शनकारियों ने कांगला किले के पश्चिमी द्वार और मुख्यमंत्री के सरकारी आवास की ओर मार्च करने की कोशिश की। सुरक्षा बलों ने कई स्थानों पर बैरिकेड लगाकर उन्हें रोका। जब प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने का प्रयास किया, तो पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे।
प्रदर्शनकारियों की मांगें तीन मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित थीं — मारे गए बच्चों के लिए न्याय, विस्थापित लोगों का पुनर्वास, और राज्य में स्थायी शांति की बहाली।
सीएम और गृह मंत्री की प्रतिक्रिया
सीओसीओएमआई के प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक के बाद मुख्यमंत्री युमनम खेमचंद सिंह ने कहा कि सुरक्षा एजेंसियां दोषियों को पकड़ने के लिए दिन-रात अभियान चला रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वे पीड़ित परिवारों और संयुक्त कार्य समिति के लगातार संपर्क में हैं।
सीएम ने कहा कि राज्य सरकार इस बात से अत्यंत दुखी है कि दोनों मासूमों के शव अभी भी मुर्दाघर में हैं। उन्होंने यह भी घोषणा की कि इस मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया गया है।
गृह मंत्री कोंथौजम गोविंददास सिंह ने बताया कि सीओसीओएमआई के ज्ञापन में सात प्रमुख मुद्दे और मांगें शामिल थीं। उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार स्वदेशी समुदायों की सुरक्षा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि 18 अप्रैल को उखरुल जिले में हुए उस हमले की जांच भी — जिसमें दो नागा नागरिकों की जान गई थी — एनआईए को सौंपी जा चुकी है।
एनआईए की जांच और जमीनी स्थिति
चल रही जांच के तहत एक इंस्पेक्टर जनरल के नेतृत्व में एनआईए की एक विशेष टीम ने बिष्णुपुर जिले के ट्रोंगलाओबी गांव में विस्फोट स्थल का दौरा कर फोरेंसिक साक्ष्य एकत्र किए हैं।
मुख्यमंत्री सिंह ने बिष्णुपुर धमाके और उखरुल हमले दोनों को अमानवीय कृत्य करार देते हुए कहा कि इन घटनाओं ने लोगों के मन में गहरा भय और आक्रोश पैदा किया है। उन्होंने चेताया कि लंबे समय से जारी बंद, आंदोलन और अशांति ने दिहाड़ी मजदूरों, व्यापारियों और छात्रों सहित समाज के हर वर्ग को बुरी तरह प्रभावित किया है।
गहरा संदर्भ: मणिपुर संकट की व्यापक तस्वीर
गौरतलब है कि मई 2023 से मणिपुर में जातीय हिंसा का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह अब भी थमने का नाम नहीं ले रहा। दो वर्षों में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है, हजारों लोग विस्थापित हैं और राज्य की अर्थव्यवस्था लगातार चरमरा रही है। यह पहली बार नहीं है जब मासूम बच्चे इस संघर्ष की भेंट चढ़े हों — यह उस व्यापक पैटर्न का हिस्सा है जिसमें नागरिक, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
विडंबना यह है कि जहां एक ओर सरकार शांति और संवाद की बात करती है, वहीं दो नवजात-सी उम्र के बच्चों के शव 19 दिनों से मुर्दाघर में पड़े हैं — यह स्थिति राज्य की कानून-व्यवस्था और न्याय वितरण प्रणाली पर गहरे सवाल खड़े करती है। एनआईए को जांच सौंपना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इससे पहले भी मणिपुर के कई मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की जांच वर्षों तक खिंचती रही है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि एनआईए कितनी जल्दी दोषियों तक पहुंचती है, और क्या पीड़ित परिवार अपने बच्चों को अंतिम विदाई दे पाते हैं। मणिपुर में स्थायी शांति की राह तब तक नहीं खुलेगी, जब तक न्याय की यह छोटी-सी मांग पूरी नहीं होती।