टंका तोरानी: ओडिशा का पारंपरिक सुपरड्रिंक जो गर्मी में देता है ठंडक और सेहत का खजाना
सारांश
Key Takeaways
- टंका तोरानी ओडिशा का पारंपरिक किण्वित चावल पेय है जो भगवान जगन्नाथ मंदिर, पुरी में महाप्रसाद के रूप में दिया जाता है।
- यह एक दिन पुराने पके चावल को रातभर पानी में भिगोकर और दही, मसाले मिलाकर तैयार किया जाता है।
- प्राकृतिक किण्वन (फर्मेंटेशन) के कारण यह एक शक्तिशाली प्रोबायोटिक पेय है जो पाचन सुधारता है।
- इसमें करी पत्ते, काला नमक, भुना जीरा, हरी मिर्च और नींबू जैसी सामग्री मिलाई जाती है।
- यह पेय पूरी तरह रासायनिक मुक्त है और बाजारी कोल्ड ड्रिंक का एक स्वस्थ देसी विकल्प है।
- ओडिशा सरकार और उद्यमियों के लिए इसे GI टैग दिलाकर वैश्विक बाजार में पहुंचाने का अवसर मौजूद है।
पुरी, 26 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। ओडिशा की सदियों पुरानी पाककला परंपरा में एक ऐसा चमत्कारी पेय छिपा है जिसे आज की भाषा में 'सुपरड्रिंक' कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसका नाम है टंका तोरानी — एक किण्वित चावल आधारित पेय जो भगवान जगन्नाथ मंदिर, पुरी में महाप्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। यह पेय न केवल गर्मियों में शरीर को भीतर से ठंडा रखता है, बल्कि इसके प्राकृतिक प्रोबायोटिक गुण इसे आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी खरा उतारते हैं।
क्या है टंका तोरानी और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
टंका तोरानी मूलतः एक दिन पुराने पके चावल को रात भर पानी में भिगोकर हल्का किण्वित (फर्मेंटेड) करके बनाया जाने वाला पारंपरिक पेय है। ओडिशा में यह पेय सैकड़ों वर्षों से घर-घर में बनाया जाता रहा है और इसका उल्लेख जगन्नाथ मंदिर की प्रसाद परंपराओं में भी मिलता है।
गौरतलब है कि जब देश के बाकी हिस्सों में लोग महंगे एनर्जी ड्रिंक और कोल्ड ड्रिंक की तरफ भाग रहे थे, ओडिशा के ग्रामीण और शहरी परिवार इस देसी पेय को अपनी रसोई में संजोए रहे। यह पेय ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा है।
टंका तोरानी बनाने की पारंपरिक विधि
टंका तोरानी तैयार करने की प्रक्रिया सरल लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। सबसे पहले एक दिन पुराने पके चावल को पर्याप्त मात्रा में पानी में डालकर रातभर के लिए रख दिया जाता है। इस दौरान चावल में प्राकृतिक किण्वन (फर्मेंटेशन) की प्रक्रिया शुरू होती है।
अगले दिन इस मिश्रण को हाथों से अच्छी तरह मसल दिया जाता है और इसमें ताजा दही मिलाया जाता है। इसके बाद स्वाद को निखारने के लिए इसमें मांगा अदरक, करी पत्ते, नींबू के टुकड़े, हरी मिर्च, धनिया पत्ता, भुना हुआ जीरा पाउडर और काला नमक डाला जाता है। जो लोग इसे और हल्का पसंद करते हैं वे थोड़ा अतिरिक्त पानी मिलाकर इसे पतला कर लेते हैं।
तैयार होने पर इसका स्वाद हल्का खट्टा, मसालेदार और ताजगी से भरपूर होता है — ठीक वैसे जैसे शरीर और मन दोनों को एक साथ राहत मिले।
सेहत के लिए टंका तोरानी के फायदे
टंका तोरानी को आधुनिक पोषण विज्ञान की नजर से देखें तो यह एक प्राकृतिक प्रोबायोटिक पेय है। किण्वन की प्रक्रिया से इसमें लाभकारी बैक्टीरिया (गुड बैक्टीरिया) उत्पन्न होते हैं जो पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं।
इसके नियमित सेवन से पेट की गैस, भारीपन और अपच जैसी समस्याओं में राहत मिलती है। गर्मियों में यह शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को बनाए रखने में भी मदद करता है क्योंकि इसमें मौजूद काला नमक और दही शरीर को आवश्यक खनिज प्रदान करते हैं। थकान और लू से बचाव में भी यह पेय प्रभावी माना जाता है।
आधुनिक जीवनशैली में टंका तोरानी की प्रासंगिकता
आज जब बाजार आर्टिफिशियल फ्लेवर, केमिकल प्रिजर्वेटिव और अत्यधिक चीनी से भरे पैकेट बंद पेय पदार्थों से पटा पड़ा है, टंका तोरानी जैसे पारंपरिक पेय की अहमियत और भी बढ़ जाती है। यह पूरी तरह रासायनिक मुक्त, घरेलू सामग्री से बना एक जीवित पेय है।
तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो दक्षिण भारत में पचड़ी, राजस्थान में छाछ और पंजाब में लस्सी जिस तरह स्थानीय जलवायु के अनुकूल पारंपरिक पेय के रूप में विकसित हुए, उसी तरह टंका तोरानी ओडिशा की गर्म और आर्द्र जलवायु के लिए एकदम उपयुक्त पेय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी किण्वित खाद्य पदार्थों को पाचन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानता है।
जैसे-जैसे देश में आयुर्वेद और पारंपरिक भारतीय खानपान के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, टंका तोरानी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने की पूरी संभावना है। ओडिशा सरकार और खाद्य उद्यमियों के लिए यह एक अवसर है कि वे इस पारंपरिक पेय को GI टैग और ब्रांडिंग के जरिए वैश्विक बाजार तक पहुंचाएं।