कृष्णा नदी जल विवाद: सूखे में तेलंगाना को पानी देने का आरोप, जेडी-एस ने कर्नाटक सरकार को घेरा
सारांश
मुख्य बातें
जनता दल (सेकुलर) ने बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर गंभीर आरोप लगाए कि उसने उत्तरी कर्नाटक के अलमट्टी और नारायणपुर जलाशयों से कृष्णा नदी का पानी तेलंगाना की ओर कथित तौर पर छोड़ा है, जबकि राज्य के किसान सूखे की मार झेल रहे हैं। पार्टी का कहना है कि यह कदम कर्नाटक के किसानों और आम नागरिकों के हितों की बलि देकर राजनीतिक गठबंधन को साधने की कोशिश है।
जेडी-एस के आरोप और मुख्य बिंदु
जनता दल (सेकुलर) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में सवाल उठाया कि जब उत्तरी कर्नाटक के लोग पेयजल के लिए संघर्ष कर रहे हैं और किसान फसल बर्बादी से जूझ रहे हैं, तो ऐसे में अलमट्टी और नारायणपुर जलाशयों से पड़ोसी राज्य को चुपके से पानी छोड़ना 'अक्षम्य विश्वासघात' है। पार्टी ने आरोप लगाया कि यह निर्णय मुख्यमंत्री के मौखिक निर्देशों पर लिया गया, जो किसी पारदर्शी नीतिगत प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है।
पार्टी ने तर्क दिया कि कर्नाटक के करदाताओं के संसाधनों और जल का लाभ केवल उन्हीं राज्यों को मिल रहा है जिनका कांग्रेस के साथ राजनीतिक तालमेल है। इसके साथ ही जेडी-एस ने कावेरी नदी पर मेकेदातु परियोजना का भी उल्लेख करते हुए कहा कि यह एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है।
मुआवजे पर भी उठाए सवाल
जेडी-एस ने केवल जल आवंटन पर ही नहीं, बल्कि फसल क्षति के मुआवजे पर भी सरकार को घेरा। पार्टी का कहना है कि सूखे से प्रभावित किसानों को पर्याप्त मुआवजा नहीं दिया जा रहा, जो सरकार के 'किसान विरोधी रवैये' को दर्शाता है। गौरतलब है कि उत्तरी कर्नाटक के कई जिले पहले से ही सूखाग्रस्त घोषित हैं और वहाँ पेयजल की उपलब्धता गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।
सरकार से तत्काल माँगें
पार्टी ने कर्नाटक सरकार से तीन तत्काल कदम उठाने की माँग की है — तेलंगाना को कृष्णा नदी का पानी छोड़ना तुरंत बंद किया जाए, उत्तरी कर्नाटक के नागरिकों की पेयजल आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जाए, और किसानों की सिंचाई संबंधी ज़रूरतों को पूरा किया जाए। पार्टी ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इन चिंताओं का समाधान नहीं किया, तो किसान सड़कों पर उतर सकते हैं।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और व्यापक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक में कांग्रेस सरकार और जेडी-एस के बीच राजनीतिक तनाव पहले से उच्च है। आलोचकों का कहना है कि अंतर-राज्यीय जल विवाद अक्सर राजनीतिक रंग ले लेते हैं, जिससे असली जल नीति और किसान कल्याण के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। कर्नाटक सरकार ने इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
यह भी उल्लेखनीय है कि कृष्णा नदी जल आवंटन पहले से ही कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा रहा है। किसी भी जलाशय से पानी छोड़ने का निर्णय तकनीकी, कानूनी और अंतर-राज्यीय समझौतों के दायरे में आता है। जेडी-एस के आरोप इसी संवेदनशील पृष्ठभूमि में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।
आगे क्या होगा
आने वाले दिनों में कर्नाटक सरकार का इन आरोपों पर जवाब आना अपेक्षित है। यदि पानी छोड़ने के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह विवाद विधानसभा में भी गूंज सकता है। किसान संगठनों की प्रतिक्रिया भी महत्त्वपूर्ण होगी, क्योंकि जेडी-एस ने आंदोलन की चेतावनी दी है।