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केरल हाईकोर्ट ने दलित महिला यौन शोषण मामले में निष्कासित कांग्रेस पार्षद एमए प्रशोब को अग्रिम जमानत देने से किया इनकार

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केरल हाईकोर्ट ने दलित महिला यौन शोषण मामले में निष्कासित कांग्रेस पार्षद एमए प्रशोब को अग्रिम जमानत देने से किया इनकार

सारांश

केरल हाईकोर्ट ने पलक्कड़ के निष्कासित कांग्रेस पार्षद एमए प्रशोब को दलित महिला यौन शोषण मामले में अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति बदरुद्दीन ने स्पेशल एससी/एसटी कोर्ट के आदेश को सही ठहराया। अब प्रशोब की गिरफ्तारी लगभग तय मानी जा रही है।

मुख्य बातें

केरल हाईकोर्ट ने 26 मई को निष्कासित कांग्रेस पार्षद एमए प्रशोब की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की।
बदरुद्दीन ने स्पेशल एससी/एसटी कोर्ट के पूर्व आदेश को सही ठहराया, जिसमें प्रथमदृष्टया मामला माना गया था।
आरोप: भारतीय न्याय संहिता के तहत बलात्कार, झूठे वादों पर यौन शोषण, आपराधिक धमकी; साथ ही एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराएं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी ने डेढ़ वर्ष तक नौकरी और सुरक्षा का झूठा वादा कर महिला का शोषण किया।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रशोब पर गिरफ्तारी का खतरा मंडरा रहा है।

केरल हाईकोर्ट ने मंगलवार, 26 मई को पलक्कड़ के निष्कासित कांग्रेस नगर पार्षद एमए प्रशोब की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। यह मामला एक अनुसूचित जाति की महिला द्वारा लगाए गए यौन शोषण के आरोपों से जुड़ा है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद प्रशोब पर गिरफ्तारी का खतरा मंडराने लगा है।

न्यायालय का फैसला और कानूनी आधार

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने स्पेशल एससी/एसटी कोर्ट के पूर्व आदेश को सही ठहराते हुए अग्रिम जमानत देने से इनकार किया। स्पेशल कोर्ट ने पहले ही यह पाया था कि आरोपी के विरुद्ध प्रथमदृष्टया मामला बनता है, इसलिए गिरफ्तारी-पूर्व जमानत नहीं दी जा सकती।

पलक्कड़ टाउन साउथ पुलिस स्टेशन में दर्ज इस प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता की बलात्कार, झूठे वादों के आधार पर यौन शोषण और आपराधिक धमकी से संबंधित धाराओं के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं भी शामिल हैं।

अभियोजन पक्ष के आरोप

अभियोजन पक्ष के अनुसार, प्रशोब विवाहित होने के बावजूद शिकायतकर्ता के साथ करीब डेढ़ वर्ष तक संबंध में रहे। कथित तौर पर उन्होंने महिला को नौकरी दिलाने और जीवनभर साथ देने का वादा कर उसके साथ बार-बार शारीरिक संबंध बनाए।

शिकायतकर्ता ने बताया कि वह सबसे पहले प्रशोब के संपर्क में तब आई जब कथित तौर पर उनके पिता ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया था। इसके बाद आरोपी ने कथित रूप से उन्हें शिकायत न करने के लिए मनाया और धीरे-धीरे नौकरी व सुरक्षा का भरोसा दिलाकर उनका विश्वास जीता। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि इस रिश्ते के दौरान वह गर्भवती हो गईं और जब यह प्रसंग सार्वजनिक हुआ तो उन्हें धमकियां दी गईं और दुर्व्यवहार किया गया।

बचाव पक्ष की दलीलें

प्रशोब के वकील ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि आरोपों को स्वीकार भी कर लिया जाए तो यह केवल दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंध को दर्शाता है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि एससी/एसटी अधिनियम की धाराओं का गलत तरीके से प्रयोग किया गया है, इसलिए उस कानून के तहत जमानत पर लागू प्रतिबंध इस मामले में लागू नहीं होने चाहिए।

बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि स्पेशल कोर्ट बलात्कार के आरोप को प्रथमदृष्टया साबित करने में विफल रहा और उसने मुख्यतः एससी/एसटी अधिनियम के आधार पर याचिका खारिज की। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

राजनीतिक पृष्ठभूमि

यह मामला पलक्कड़ में कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। पार्टी पहले ही प्रशोब को निष्कासित कर चुकी है। गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने इस घटना को राजनीतिक मुद्दा बनाया था।

आगे क्या होगा

हाईकोर्ट द्वारा राहत देने से इनकार के बाद अब एमए प्रशोब की गिरफ्तारी का रास्ता खुल गया है। शिकायतकर्ता के वकील ने अदालत में जोरदार विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने लंबे समय तक महिला का भावनात्मक और यौन शोषण किया। मामले की अगली सुनवाई और पुलिस की आगामी कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन सवाल यह है कि पार्टी को इस पर कार्रवाई करने में इतना समय क्यों लगा। एससी/एसटी अधिनियम की धाराओं को 'दुरुपयोग' बताने की बचाव पक्ष की रणनीति एक परिचित कानूनी चाल है जिसे अदालतें अब सख्ती से परख रही हैं — और हाईकोर्ट का इनकार इसी सख्ती का संकेत है।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एमए प्रशोब कौन हैं और उन पर क्या आरोप हैं?
एमए प्रशोब पलक्कड़ के पूर्व कांग्रेस नगर पार्षद हैं जिन्हें पार्टी ने निष्कासित कर दिया है। उन पर एक दलित महिला ने बलात्कार, झूठे वादों के आधार पर यौन शोषण और आपराधिक धमकी के आरोप लगाए हैं; एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज है।
केरल हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत क्यों नहीं दी?
न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने स्पेशल एससी/एसटी कोर्ट के उस आदेश को सही माना जिसमें प्रथमदृष्टया मामला बनता पाया गया था। अदालत ने बचाव पक्ष की यह दलील नहीं मानी कि एससी/एसटी अधिनियम का गलत प्रयोग हुआ है।
शिकायतकर्ता महिला ने क्या आरोप लगाए हैं?
महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी ने नौकरी और जीवनभर साथ देने का वादा कर करीब डेढ़ वर्ष तक उनका शोषण किया। इस दौरान वह गर्भवती हो गईं और जब मामला सार्वजनिक हुआ तो उन्हें धमकियां दी गईं।
इस मामले का राजनीतिक असर क्या रहा है?
यह मामला पलक्कड़ में कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से शर्मिंदगी का सबब बना। पार्टी ने प्रशोब को निष्कासित किया और विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान सीपीआई(एम) ने इस घटना को राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाया था।
राष्ट्र प्रेस
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