29 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

पोस्टल बैलेट विवाद: केरल हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा मंगलवार तक जवाब

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
पोस्टल बैलेट विवाद: केरल हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा मंगलवार तक जवाब

सारांश

केरल हाईकोर्ट ने पोस्टल बैलेट न डाल पाए मतदाताओं के मामले में चुनाव आयोग से मंगलवार तक जवाब मांगा है। 4 मई को मतगणना से पहले यह हस्तक्षेप चुनावी निष्पक्षता के लिहाज से अहम है। 140 सीटों पर नतीजे दांव पर हैं।

मुख्य बातें

केरल हाईकोर्ट ने 24 अप्रैल को चुनाव आयोग को मंगलवार तक पोस्टल बैलेट पर जवाब देने का निर्देश दिया।
9 अप्रैल को हुए केरल विधानसभा चुनाव में बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी पोस्टल बैलेट से वोट नहीं डाल पाए।
कई कर्मचारियों को 6 अप्रैल तक बैलेट पेपर ही नहीं मिले, जबकि अंतिम तारीख 8 अप्रैल थी।
केरल एनजीओ यूनियन की रिट याचिका में 'कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961' के तहत कर्मचारियों के अधिकार का हवाला दिया गया।
चुनाव आयोग ने 8 अप्रैल को अदालत को आश्वस्त किया था, लेकिन जमीनी हकीकत अलग रही।
4 मई 2026 को 140 विधानसभा सीटों पर मतगणना होनी है, जिससे पहले यह मामला अहम हो गया है।

कोच्चि: केरल हाईकोर्ट ने शुक्रवार, 24 अप्रैल को भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) को निर्देश दिया कि वह मंगलवार तक यह स्पष्ट करे कि क्या उन मतदाताओं को अतिरिक्त सुविधा दी जा सकती है, जो 9 अप्रैल को हुए केरल विधानसभा चुनावों में पोस्टल बैलेट के जरिए अपना वोट नहीं डाल पाए। यह मामला चुनावी निष्पक्षता और मताधिकार वंचन की गंभीर चिंताओं को सामने लाता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद एक राज्य सरकार के कर्मचारी की याचिका से शुरू हुआ, जिसने अदालत में दलील दी कि पोस्टल वोटिंग के लिए सभी जरूरी प्रक्रियाओं का पालन करने के बावजूद उसे अपने संवैधानिक मताधिकार से वंचित कर दिया गया। इससे पहले केरल एनजीओ यूनियन ने भी एक रिट याचिका दायर कर चुनाव ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारियों की व्यापक समस्याओं को उजागर किया था।

यूनियन ने बताया कि 'कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961' के अंतर्गत ऐसे कर्मचारियों को पोस्टल बैलेट से मतदान का अधिकार प्राप्त है, लेकिन व्यवस्थागत खामियों के चलते यह अधिकार हकीकत में नहीं मिल पाया।

बैलेट वितरण में देरी बनी बड़ी बाधा

अधिकारियों ने स्वीकार किया कि कई चुनाव कर्मचारियों को 6 अप्रैल तक भी बैलेट पेपर नहीं मिले थे। मतदान की अंतिम तारीख 8 अप्रैल थी, जिस दिन अधिकांश समय ईवीएम और अन्य चुनावी सामग्री जुटाने में बीत गया। इस कारण वोट डालने के लिए बेहद कम समय बचा।

मतदान की समय-सीमा 1 अप्रैल से 8 अप्रैल के बीच निर्धारित थी, जो पहले से ही अत्यंत व्यस्त लॉजिस्टिक शेड्यूल के साथ टकराती थी। इस व्यवस्थागत विफलता ने बड़ी संख्या में कर्मचारियों को मताधिकार से वंचित कर दिया।

चुनाव आयोग का पूर्व आश्वासन और अदालत का रुख

8 अप्रैल को चुनाव आयोग ने केरल हाईकोर्ट को आश्वस्त किया था कि पोलिंग कर्मचारी ड्यूटी पर जाने से पहले पोस्टल बैलेट से वोट डाल सकेंगे और इसके लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे। लेकिन जमीनी हकीकत इस आश्वासन से बिल्कुल अलग रही।

अदालत ने इस विरोधाभास का संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह डाक मतदान व्यवस्था के विस्तार या उसे सुगम बनाने की व्यावहारिकता पर अपना सुविचारित मत रिकॉर्ड पर रखे। बेंच ने अगली सुनवाई मंगलवार के लिए निर्धारित की है।

मतगणना से पहले का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप

यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब 4 मई 2026 को मतगणना होनी है और 140 विधानसभा सीटों पर नतीजे तय होने हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कड़े मुकाबले वाले निर्वाचन क्षेत्रों में पोस्टल बैलेट निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब भारत में पोस्टल बैलेट व्यवस्था की खामियां सामने आई हों। पिछले कई चुनावों में भी ऐसी शिकायतें दर्ज हुई हैं, लेकिन मतगणना से ठीक पहले अदालत का इस तरह का हस्तक्षेप असाधारण माना जा रहा है।

व्यापक प्रभाव और आगे की राह

इस मामले का असर केवल केरल तक सीमित नहीं रहेगा। अगर अदालत चुनाव आयोग को वंचित मतदाताओं के लिए अतिरिक्त व्यवस्था करने का आदेश देती है, तो यह देशभर में पोस्टल बैलेट प्रक्रिया में सुधार की मिसाल बन सकती है। यह फैसला भविष्य के चुनावों में लाखों चुनाव कर्मचारियों के मताधिकार को सुनिश्चित करने की दिशा में एक नजीर साबित हो सकता है।

अब सभी की नजरें मंगलवार को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां चुनाव आयोग को यह बताना होगा कि क्या 4 मई की मतगणना से पहले कोई व्यावहारिक समाधान संभव है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत की चुनाव प्रणाली की एक गहरी खामी को उजागर करता है — जहां चुनाव कराने वाले कर्मचारी खुद अपने मताधिकार से वंचित रह जाते हैं। विडंबना यह है कि चुनाव आयोग ने 8 अप्रैल को अदालत को आश्वस्त किया था, लेकिन जमीन पर वह आश्वासन खोखला साबित हुआ। मतगणना से ठीक पहले यह मामला उठना बताता है कि प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही की कमी किस हद तक लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर कर सकती है। यह केवल केरल का मसला नहीं — देशभर में पोस्टल बैलेट सुधार की मांग अब अदालती दरवाजे तक पहुंच चुकी है।
RashtraPress
29 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केरल हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को क्या निर्देश दिया?
केरल हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को मंगलवार तक यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि क्या उन मतदाताओं के लिए अतिरिक्त पोस्टल बैलेट सुविधा दी जा सकती है जो 9 अप्रैल के चुनाव में वोट नहीं डाल पाए। अदालत ने अगली सुनवाई मंगलवार के लिए तय की है।
पोस्टल बैलेट से वोट क्यों नहीं डाल पाए कर्मचारी?
बैलेट पेपर के वितरण में देरी के कारण कई कर्मचारियों को 6 अप्रैल तक भी बैलेट नहीं मिले थे। 8 अप्रैल का अधिकांश समय ईवीएम और चुनावी सामग्री जुटाने में बीत गया, जिससे वोट डालने का समय नहीं बचा।
यह मामला किसने उठाया और क्यों?
यह मामला एक राज्य सरकार के कर्मचारी की याचिका से शुरू हुआ जिसने कहा कि सभी प्रक्रियाएं पूरी करने के बावजूद उसे मताधिकार नहीं मिला। इससे पहले केरल एनजीओ यूनियन ने भी रिट याचिका दाखिल कर चुनाव ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों की समस्याएं उजागर की थीं।
केरल में मतगणना कब होगी?
केरल विधानसभा चुनाव की मतगणना 4 मई 2026 को होगी। राज्य की 140 विधानसभा सीटों पर मतदान 9 अप्रैल को हुआ था।
पोस्टल बैलेट का चुनाव परिणाम पर क्या असर हो सकता है?
कड़े मुकाबले वाले निर्वाचन क्षेत्रों में पोस्टल बैलेट निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। यदि बड़ी संख्या में कर्मचारी मताधिकार से वंचित रहे, तो इससे कुछ सीटों के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 3 घंटे पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 4 महीने पहले
  5. 4 महीने पहले
  6. 4 महीने पहले
  7. 7 महीने पहले
  8. 7 महीने पहले