क्या लोकतंत्र की वैधता ईमानदार जवाबदेही से तय होती है?: विधानसभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता
Key Takeaways
- लोकतंत्र की वैधता जवाबदेही पर निर्भर करती है।
- विधायिकाएं प्रक्रियात्मक संस्थाएं नहीं हैं।
- नियमित बैठकों से जवाबदेही सुदृढ़ होती है।
- विधानसभा के इतिहास में विठ्ठलभाई पटेल का योगदान महत्वपूर्ण है।
- प्रौद्योगिकी से विधायी कार्यप्रणाली में सुधार संभव है।
नई दिल्ली, 20 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि लोकतंत्र की वैधता जवाबदेही के प्रावधानों के अस्तित्व से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि विधायिकाएं उन्हें कितनी गंभीरता और ईमानदारी से लागू करती हैं। वे लखनऊ में आयोजित तीन दिवसीय 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (एआईपीओसी) को संबोधित कर रहे थे।
देशभर से आए पीठासीन अधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विधायी जवाबदेही जनता और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच एक जीवंत और गतिशील संबंध है, जो लोकतंत्र की नैतिक और संवैधानिक आधारशिला है।
संवैधानिक लोकतंत्र में विधायिकाओं की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करते हुए अध्यक्ष ने कहा कि विधायिकाएं केवल प्रक्रियात्मक संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की सबसे प्रत्यक्ष और सशक्त अभिव्यक्ति हैं। न्यायपालिका जहां संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करती है और कार्यपालिका शासन का संचालन करती है, वहीं कार्यपालिका की सत्ता विधायिका से ही प्रवाहित होती है और वह सदन के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी रहती है।
विधानसभाओं की बैठकों की घटती संख्या और प्रभावी कार्यघंटों में कमी पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि इससे कार्यपालिका की निगरानी कमजोर होती है और जनहित के मुद्दों पर सार्थक चर्चा के अवसर सीमित होते हैं। उन्होंने संविधान के उस प्रावधान की याद दिलाई, जिसके अनुसार प्रत्येक सदन को कम से कम छह माह में एक बार बैठक करनी अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि जवाबदेही केवल औपचारिक नहीं, बल्कि नियमित बैठकों, अनुशासित आचरण और सत्तापक्ष-विपक्ष के सार्थक विमर्श से ही सुदृढ़ होती है।
विधायी संस्थाओं की ऐतिहासिक विरासत का उल्लेख करते हुए उन्होंने विठ्ठलभाई पटेल को स्मरण किया, जिन्होंने 1925 में केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष का पद संभाला था। 20 जनवरी 1930 की घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किस प्रकार विठ्ठलभाई पटेल ने अध्यक्ष की गरिमा और सदन की सर्वोच्चता की रक्षा कर विधायिका की स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण की परंपरा को मजबूत किया।
अध्यक्ष ने कहा कि सदन में दिए गए मंत्रिस्तरीय आश्वासन औपचारिक दायित्व होते हैं और विधायी जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। आश्वासन समितियों सहित विभिन्न विधायी समितियों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ये समितियां आश्वासनों के क्रियान्वयन की निगरानी कर जनता के विश्वास को मजबूत करती हैं।
समकालीन सुधारों की चर्चा करते हुए उन्होंने विधायी कार्यप्रणाली में प्रौद्योगिकी और डेटा-आधारित शासन की भूमिका पर बल दिया। राष्ट्रीय ई-विधान अनुप्रयोग (नेवा) के तहत दिल्ली विधानसभा में हुए पेपरलेस सत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इससे पारदर्शिता और दक्षता बढ़ी है और पर्यावरण संरक्षण में योगदान मिला है, जिससे लगभग 80 पेड़ों की बचत संभव हुई है।
उन्होंने राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (एनएलआई) को भी महत्वपूर्ण बताया, जो बैठकों की संख्या, कार्यघंटों, बहस की उत्पादकता और समितियों की प्रभावशीलता जैसे मानकों पर राज्यों की विधायी कार्यक्षमता का तुलनात्मक आकलन प्रस्तुत करता है। उनके अनुसार यह ढांचा पारदर्शिता, आत्ममूल्यांकन और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने के साथ-साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को भी प्रोत्साहित करता है।