क्या टीएम कृष्णा ने शास्त्रीय संगीत को नई दिशा दी है?
सारांश
Key Takeaways
- टीएम कृष्णा ने शास्त्रीय संगीत में नई सोच प्रस्तुत की है।
- उनकी आवाज में सामाजिक मुद्दों को उजागर करने की क्षमता है।
- कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि परिवर्तन का एक साधन है।
- पर्यावरण संरक्षण के लिए भी उन्होंने संगीत का उपयोग किया है।
- कृष्णा का मानना है कि संगीत सभी के लिए होना चाहिए।
नई दिल्ली, 21 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। टीएम कृष्णा न केवल कर्नाटक संगीत के एक अद्वितीय गायक हैं, बल्कि वे इस कला को सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने वाले एक विचारशील कलाकार भी हैं। कृष्णा का मानना है कि शास्त्रीय संगीत केवल सुरों और रागों का समूह नहीं है। उन्होंने संगीत के माध्यम से यह दर्शाने का प्रयास किया है कि कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाने और सामाजिक बदलाव लाने का भी एक सशक्त उपकरण हो सकती है।
थोडुर मदबुसी कृष्णा का जन्म 22 जनवरी 1976 को मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ था। उनके माता-पिता को कर्नाटिक संगीत में गहरी रुचि थी, यही कारण है कि कृष्णा ने कम उम्र में ही संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दिया। उन्होंने इसे कभी केवल मनोरंजन की दृष्टि से नहीं देखा, बल्कि इसे समाज और सत्ता की समस्याओं को उजागर करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना लिया।
हिंदी जगत में उनका नाम शायद उतना प्रचलित नहीं है, लेकिन उनके लेख और विचार अवश्य पढ़े गए हैं। उनकी पुस्तक 'ए साउदर्न म्यूजिक—द कर्नाटक स्टोरी' हिंदी पाठकों के लिए दक्षिण भारतीय संगीत की दुनिया को उजागर करती है। इस पुस्तक में केवल संगीत के इतिहास और रागों का ही उल्लेख नहीं है, बल्कि यह भी दर्शाया गया है कि समाज में संगीत की भूमिका, उसके पारंपरिक ढांचे और उसमें मौजूद असमानताओं की क्या स्थिति है।
टीएम कृष्णा ने कर्नाटिक संगीत में ऊंची जातियों के वर्चस्व के खिलाफ खुलकर बात की है। उनका प्रयास है कि इस पारंपरिक मंच पर दलित और पिछड़ी जातियों की प्रतिभाएं भी अपनी पहचान बना सकें। इस कारण उन्हें कई बार पुराने उस्तादों की नाराजगी का सामना करना पड़ा, लेकिन कृष्णा ने कभी भी अपने विचारों से समझौता नहीं किया। उनका मानना है कि संगीत केवल कुछ खास लोगों का नहीं है, बल्कि यह सभी के लिए खुला होना चाहिए।
कृष्णा ने अपनी कला को केवल सामाजिक मुद्दों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने पर्यावरण और विकास की अंधी दौड़ के खिलाफ भी संगीत का प्रयोग किया है। तमिलनाडु में एनोर क्रीक पर चल रहे अतिक्रमण के खिलाफ उनके विरोधी गीत और प्रदर्शन इसके अच्छे उदाहरण हैं। एनोर क्रीक, एक संकरी खाड़ी है जहां कोसास्थलियर नदी समुद्र में मिलती है, लेकिन अब यह कारखानों और उद्योगों के कब्जे में है। कृष्णा इस गीत में बताते हैं कि किस प्रकार हमारी लापरवाह विकास की भूख ने इस प्राकृतिक स्थान को बदल दिया है।
उन्होंने अपने गाने में 'पोरंबोक' शब्द का इस्तेमाल किया है, जिसका अर्थ है सामूहिक भूमि या बिना पट्टे वाली जमीन। यह एक और अर्थ में आवारा भी है। कृष्णा इसे एक प्रतीक बनाकर समझाते हैं कि सामूहिकता का मतलब समाज में लांछन में कैसे बदल जाता है। उनका गाना एनोर क्रीक के बीचों-बीच गाया गया है, जिसमें वे दिखाते हैं कि कैसे कारखानों और पावर प्लांट के कारण नदी और समुद्र के बीच का प्राकृतिक मेल समाप्त हो रहा है। उनका कहना है कि अगर विकास की यह भूख इस तरह जारी रही, तो यही पोरंबोक हमारी जिंदगी को भी निगल जाएगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कृष्णा केवल विरोध नहीं करते, बल्कि अपनी आवाज को संगीत में बदलते हैं। वे शास्त्रीय संगीत को लोक संगीत के करीब लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी कला में केवल राग और ताल नहीं हैं, बल्कि इसमें सवाल, चेतना और चेतावनी भी शामिल हैं। उत्तर भारत में बहुत कम शास्त्रीय कलाकार ऐसे हैं जो सत्ता या दबाव को चुनौती देते हैं, और कृष्णा उन्हीं चुनिंदा लोगों में से हैं।