क्या विपक्ष संसद का दुरुपयोग कर रहा है? नीति निर्माण पर चर्चा नहीं, सिर्फ ड्रामेबाजी: तरुण चुघ
सारांश
Key Takeaways
- संसद का उपयोग नीति निर्माण के लिए होना चाहिए।
- विपक्ष की ड्रामेबाजी से लोकतंत्र को खतरा है।
- जनता को कांग्रेस के काले कारनामों का ज्ञान है।
नई दिल्ली, २ दिसंबर (राष्ट्र प्रेस)। संसद के शीतकालीन सत्र में मंगलवार को एसआईआर के मुद्दे पर हुए हंगामे को लेकर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने विपक्ष पर जोरदार हमला किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष लगातार संसद का दुरुपयोग कर रहा है।
तरुण चुघ ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में कहा कि कांग्रेस और ‘इंडी अलायंस’ के नेता संसद जैसी सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था का लगातार दुरुपयोग कर रहे हैं। सदन का उद्देश्य नीति निर्माण, कानूनों पर चर्चा और जनकल्याणकारी योजनाओं पर विचार-विमर्श होना चाहिए, लेकिन विपक्ष इसे “सिर्फ राजनीतिक ड्रामा” का मंच बना रहा है। यही वजह है कि संसद में डिलीवरी की प्रक्रिया बाधित होती है।
प्रधानमंत्री मोदी के ‘टिप्स और डिलीवरी’ वाले बयान का समर्थन करते हुए तरुण चुघ ने कहा कि यह बयान देश के १४० करोड़ नागरिकों की वास्तविक भावना को प्रतिबिंबित करता है।
तरुण चुघ ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि वे “अनुभवहीन और भ्रष्ट साथियों” के साथ मिलकर भारत व सनातन धर्म के खिलाफ विदेशी एजेंडा चला रहे हैं और झूठ व भ्रम फैलाने की “ब्रिगेड” खड़ी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जनता कांग्रेस के इन काले कारनामों को भलीभांति समझती है और चुनाव दर चुनाव उन्हें सबक सिखा रही है।
चुघ ने विपक्ष से अपील की कि सदन को ड्रामेबाजी का मंच न बनाकर नीतियों की डिलीवरी और जनता की भलाई के लिए उसका इस्तेमाल करें, क्योंकि यही देश के नागरिकों की वास्तविक आवाज है।
तरुण चुघ ने कांग्रेस द्वारा उठाए गए ‘वोट चोरी’ के आरोपों को पूरी तरह निराधार करार देते हुए इसे हाई प्रोफाइल, सिनेमाई ड्रामा और झूठ का प्रोपेगैंडा बताया। उन्होंने कहा कि देश की जनता कांग्रेस के इस प्रोपेगैंडा को पहले ही समझ चुकी है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां भी उसके झूठे दावों के खिलाफ खड़ी हो रही हैं।
चुघ ने कहा कि जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हैं, वहां न तो चुनाव आयोग पर सवाल उठाए जाते हैं और न ही मतदाता सूचियों पर, लेकिन जहां कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ता है, वहां वह तुरंत ईवीएम और चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर देती है, जो उसके दोहरे मापदंड को दर्शाता है।