महंत स्वामी महाराज ने लंदन के निअस्डेन टेम्पल में अक्षर-पुरुषोत्तम संस्कृत पाठशाला का उद्घाटन किया
सारांश
मुख्य बातें
महंत स्वामी महाराज ने 13 अक्टूबर 2026 को लंदन स्थित बीएपीएस श्री स्वामिनारायण मंदिर — जिसे लोकप्रिय रूप से निअस्डेन टेम्पल के नाम से जाना जाता है — में अक्षर-पुरुषोत्तम संस्कृत पाठशाला का औपचारिक उद्घाटन किया। यह संस्था भारत से बाहर संस्कृत-शिक्षा को व्यवस्थित रूप देने की एक महत्त्वपूर्ण पहल है, जो पाश्चात्य देशों में भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को जीवित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
पाठशाला की स्थापना का संकल्प
इस पाठशाला की परिकल्पना स्वयं महंत स्वामी महाराज ने की थी। उन्होंने 24 सितंबर को सत्संग दीक्षा सन्मान महोत्सव के अवसर पर लिखे एक पत्र में यह इच्छा व्यक्त की थी कि लंदन प्रवास के दौरान मंदिर परिसर में एक संस्कृत विद्यालय आरंभ किया जाए। उन्होंने इस संस्था का नामकरण भी स्वयं किया। उल्लेखनीय है कि औपचारिक उद्घाटन से पूर्व ही लगभग 350 युवा विद्यार्थी इस पाठशाला से जुड़ चुके थे, जो इस पहल के प्रति युवाओं की रुचि को दर्शाता है।
ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ाव
उद्घाटन समारोह में महामहोपाध्याय भद्रेशदास स्वामी ने सभा को संबोधित करते हुए उस गौरवशाली शैक्षणिक परंपरा का स्मरण कराया, जिसकी नींव भगवान स्वामिनारायण ने रखी थी। उन्होंने संतों को संस्कृत और शास्त्रों के अध्ययन के लिए प्रेरित किया तथा उच्च शिक्षा हेतु अनेक संतों को काशी भेजा।
इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 1961 में योगीजी महाराज ने मुंबई में अक्षर-पुरुषोत्तम संस्कृत पाठशाला की स्थापना की। तत्पश्चात् 1973 में प्रमुखस्वामी महाराज ने सारंगपुर में यज्ञपुरुष संस्कृत पाठशाला शुरू की। लंदन में स्थापित यह नई पाठशाला उसी श्रृंखला की अगली कड़ी है, जो अब पहली बार पश्चिम के किसी प्रमुख शहर में अपनी जड़ें जमा रही है।
शैक्षणिक एवं शोध आयाम
भद्रेशदास स्वामी ने उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्रों पर संस्कृत में पाँच खंडों की विस्तृत टीका लिखी है। 2018 में वैंकूवर में आयोजित 17वें विश्व संस्कृत सम्मेलन में अक्षर-पुरुषोत्तम दर्शन को वेदांत परंपरा के अंतर्गत एक विशिष्ट दर्शन-परंपरा के रूप में मान्यता प्रदान की गई।
आधुनिक विज्ञान में भी संस्कृत की प्रासंगिकता बढ़ रही है। पाणिनि की व्याकरण-व्यवस्था की सटीकता का अध्ययन संगणकीय भाषा विज्ञान में किया जाता है, जिसमें संस्कृत ग्रंथों के भाषा-प्रसंस्करण उपकरणों पर शोध भी शामिल है। इसके अतिरिक्त, 2016 में शोध-पत्रिका न्यूरोइमेज में प्रकाशित एक समकक्ष-समीक्षित अध्ययन के अनुसार, वैदिक संस्कृत के पेशेवर पाठकों के मस्तिष्क के उन क्षेत्रों में संरचनात्मक भिन्नताएँ पाई गईं जो भाषा, स्मृति और दृश्य-प्रसंस्करण से जुड़े हैं। शोधकर्ताओं ने इन भिन्नताओं को वर्षों के गहन कंठस्थ-अभ्यास और पाठ से संबंधित बताया।
उद्घाटन समारोह का विवरण
समारोह में युवा विद्वानों ने संस्कृत में एक विशेष प्रस्तुति दी। संवाद के माध्यम से उन्होंने महंत स्वामी महाराज की पेरिस और लंदन यात्रा का उल्लेख किया और नई पाठशाला के लिए कृतज्ञता व्यक्त की। समारोह में अक्षर-पुरुषोत्तम महाराज का पूजन, उद्घाटन-शिलालेख का पूजन तथा महंत स्वामी महाराज द्वारा मंगलदीप प्रज्वलन किया गया।
आशीर्वचन में महंत स्वामी महाराज ने स्वयं संस्कृत में बोलते हुए इस भाषा की महत्ता का वर्णन किया और विद्यार्थियों को इसके अध्ययन के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत का ज्ञान आने वाली पीढ़ियों को अक्षर-पुरुषोत्तम महाराज की महानता को समझने और अपनी आध्यात्मिक नींव को सुदृढ़ करने में सहायक होगा।
आगे की राह
यह नई पाठशाला भाषा, शिक्षा और आध्यात्मिक परंपरा को एकसूत्र में पिरोती है। लंदन के बच्चों और युवाओं को संस्कृत सीखने तथा उसके चिरस्थायी ज्ञान से जुड़ने के अवसर प्राप्त होंगे। यह संस्था न केवल प्रवासी भारतीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को सँजोने का माध्यम बनेगी, बल्कि पश्चिमी जगत में भारतीय भाषा-विरासत की एक जीवंत उपस्थिति भी दर्ज कराएगी।