मतुआ समुदाय में डर और बंगाल चुनाव में हिंसा पर अधीर रंजन चौधरी का बड़ा हमला
सारांश
Key Takeaways
- अधीर रंजन चौधरी ने 26 अप्रैल 2026 को मुर्शिदाबाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केंद्र सरकार पर मतुआ समुदाय से वादाखिलाफी का आरोप लगाया।
- एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के बाद बड़ी संख्या में मतुआ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने की बात सामने आई।
- चौधरी ने केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर मतुआ मतदाताओं को सूची में शामिल करने की मांग की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
- हुमायूं कबीर पर बाबरी मस्जिद मुद्दे को चुनाव में धर्म के नाम पर भुनाने का आरोप लगाया गया।
- केंद्रीय सशस्त्र बलों की तैनाती के बावजूद बंगाल चुनाव 2026 में हिंसा की घटनाएं जारी रहने पर गहरी चिंता व्यक्त की गई।
- मतुआ समुदाय की अनुमानित आबादी 1.5 करोड़ से अधिक है और यह बंगाल की करीब 50-60 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है।
मुर्शिदाबाद, 26 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में रविवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और बहरामपुर विधानसभा से प्रत्याशी अधीर रंजन चौधरी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मतुआ समुदाय के मतदाताओं में व्याप्त भय और उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने केंद्र सरकार पर मतुआ समुदाय से किए गए वादे पूरे न करने का आरोप लगाया और बंगाल विधानसभा चुनाव में जारी हिंसा पर गहरी चिंता जताई।
मतुआ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने का मुद्दा
अधीर रंजन चौधरी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि मतुआ समुदाय के लोगों के मन में गहरा भय बैठ गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के बाद बड़ी तादाद में मतुआ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जब इन मतदाताओं को इस बात की जानकारी मिली, तब तक समय निकल चुका था और वे मतदान के अधिकार से वंचित हो गए।
चौधरी ने बताया कि उन्होंने इस मामले को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर मांग की थी कि मतुआ मतदाताओं को सूची में पुनः शामिल किया जाए। लेकिन उनकी इस मांग पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिससे मतुआ समुदाय में केंद्र सरकार के प्रति गहरा मोहभंग उत्पन्न हो गया है। गौरतलब है कि मतुआ समुदाय पश्चिम बंगाल में एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है और इस समुदाय को लुभाने के लिए नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का सहारा कई दलों ने लिया था।
हुमायूं कबीर पर सीधा निशाना
अधीर रंजन चौधरी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुर्शिदाबाद के नेता हुमायूं कबीर पर भी कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि ईडी और सीबीआई जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियां हुमायूं कबीर के खिलाफ चुनाव से पहले कोई कार्रवाई नहीं करेंगी। उनके अनुसार, बाबरी मस्जिद के मुद्दे को चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया।
चौधरी ने सवाल उठाया कि मस्जिद निर्माण के लिए चंदा कितना जमा हुआ, यह जांच का विषय हो सकता है। उन्होंने कहा कि हुमायूं कबीर ने चुनाव में धर्म के नाम पर प्रचार किया और अब जब चुनाव समाप्त हो गए तो अचानक यह मुद्दा उठाया जा रहा है, जो संदेह पैदा करता है।
बंगाल चुनाव में हिंसा पर गहरी चिंता
अधीर रंजन चौधरी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में जारी हिंसा पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने माना कि हिंसा की घटनाएं बड़े पैमाने पर भले न हों, लेकिन छिटपुट हिंसा और खून-खराबे की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।
उन्होंने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया — जब केंद्रीय सशस्त्र बलों की तैनाती के बावजूद हिंसा नहीं रुक रही, तो बलों की वापसी के बाद राज्य की कानून-व्यवस्था की क्या दशा होगी? यह सवाल बंगाल की राजनीतिक स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करता है।
मतुआ समुदाय और बंगाल की राजनीति — गहरा संदर्भ
मतुआ समुदाय मुख्यतः बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों का एक बड़ा तबका है, जो उत्तर 24 परगना, नदिया और दक्षिण 24 परगना जिलों में बड़ी संख्या में निवास करता है। इस समुदाय की अनुमानित आबादी 1.5 करोड़ से अधिक बताई जाती है, जो करीब 50-60 विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव डाल सकती है।
CAA लागू होने के बाद भाजपा ने इस समुदाय को नागरिकता का भरोसा दिलाया था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि जमीनी स्तर पर नागरिकता की प्रक्रिया अब तक स्पष्ट नहीं हुई। ऐसे में एसआईआर के दौरान मतुआ मतदाताओं के नाम सूची से हटना एक गंभीर राजनीतिक विडंबना है — जो समुदाय नागरिकता की मांग कर रहा था, उसके मतदाता अधिकार ही खतरे में पड़ गए।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब बंगाल चुनाव 2026 के नतीजे तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और कांग्रेस तीनों के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं। अधीर रंजन चौधरी का यह बयान न केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा है, बल्कि एक वास्तविक सामुदायिक समस्या की ओर ध्यान भी दिलाता है जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नजरअंदाज कर देती है।
आगे देखना होगा कि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार मतुआ मतदाताओं के मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या बंगाल में चुनावी हिंसा को नियंत्रित करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं।