क्या 'हम दो, हमारे तीन' नीति सही है? मोहन भागवत का परिवार पर बयान

सारांश
Key Takeaways
- हर परिवार में तीन बच्चों का होना ज़रूरी है।
- जनसंख्या नीति का महत्व बढ़ता जा रहा है।
- नई शिक्षा नीति का उद्देश्य विकास करना है।
नई दिल्ली, 28 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित व्याख्यानमाला कार्यक्रम '100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज' के तीसरे दिन आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जनसंख्या नीति पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि हम दो, हमारे तीन की नीति अपनाई जानी चाहिए।
मोहन भागवत ने जन्मदर के बारे में कहा कि सभी शास्त्रों में यह कहा गया है कि जिनकी जन्मदर 3 से कम होती है, वे धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं, इसलिए हमें तीन बच्चों को बनाए रखना चाहिए। उन्होंने बताया कि डॉक्टरों का मानना है कि विवाह में देरी नहीं करनी चाहिए और तीन संतान रखने से माता-पिता और संतान तीनों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है।
उन्होंने आगे कहा कि जिन परिवारों में तीन बच्चे हैं, वे ईगो प्रबंधन में सुधार कर सकते हैं और आगे चलकर उनकी परिवार में कोई समस्या नहीं आती। हमारे देश की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति जन्मदर 2.1 की सिफारिश करती है, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि संतान कभी 0.1 नहीं होती। गणित में 2.1 का अर्थ 2 होता है, लेकिन मानव जन्म में इसका मतलब 3 होता है।
मोहन भागवत ने जोर देते हुए कहा कि भारत में हर नागरिक के घर में तीन बच्चे होने चाहिए। इसका उद्देश्य है कि जनसंख्या को नियंत्रित किया जाए ताकि यह बोझ न बने। जन्मदर सभी के लिए कम हो रहा है, खासकर हिंदुओं के लिए, इसलिए हर परिवार में कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए।
उन्होंने नई शिक्षा नीति पर भी अपने विचार रखे और कहा कि यह नीति इसलिए बनाई गई क्योंकि अतीत में विदेशी आक्रमणकारियों ने हमारे देश पर शासन किया था। अब जब हम स्वतंत्र हैं, हमारा उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि अपने लोगों की सेवा और देखभाल करना है।