नंदिता दास: असहज सिनेमा ही सोच में बदलाव लाता है
सारांश
Key Takeaways
- सिनेमा का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह सोचने को मजबूर करने वाली कहानियाँ प्रस्तुत करना है।
- सेंसरशिप कला के लिए हानिकारक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जरूरी है।
- महिलाओं के खिलाफ किसी भी प्रकार का अन्याय अस्वीकार्य है।
नई दिल्ली, 26 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली में आयोजित 'सशक्त नारी, विकसित भारत' कार्यक्रम में अभिनेत्री और निर्देशक नंदिता दास ने अपने विचारों और अनुभवों को साझा किया। उन्होंने सिनेमा, सेंसरशिप, राजनीति और महिलाओं के अधिकारों जैसे ज्वलंत मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी।
जब राष्ट्र प्रेस ने उनसे पूछा कि उन्होंने अक्सर ऐसी फिल्में क्यों चुनी हैं जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती हैं, तो नंदिता ने कहा, "मेरे लिए सिनेमा का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है। जिन कहानियों में गहराई होती है, जो पूर्वाग्रहों को चुनौती देती हैं, और जो भीतर की संवेदनाओं को जगाती हैं, वही मेरे लिए प्रेरणादायक होती हैं। व्यक्तिगत रूप से भी मुझे वही फिल्में पसंद हैं जो लोगों को चिंतन करने के लिए प्रेरित करती हैं। यही कारण है कि मैं ऐसी फिल्में बनाना चाहती हूं।"
इसके बाद, जब राष्ट्र प्रेस ने उनसे पूछा कि जब उनके विचारों को 'राजनीतिक' करार दिया जाता है, तो वह आलोचना का सामना कैसे करती हैं, तो उन्होंने कहा, "जब कोई कलाकार मौजूदा व्यवस्था को चुनौती देता है, तो प्रतिक्रियाएं आना स्वाभाविक है। कुछ लोग समर्थन करते हैं और कुछ विरोध। दूसरों की राय से प्रभावित होना व्यक्ति को कमजोर कर सकता है। समाज में लोगों को लेबल करना आसान होता है, लेकिन यदि आपके भीतर किसी बात का गहरा विश्वास है, तो वही आपको आगे बढ़ने की शक्ति देता है। इस स्थिति में आलोचनाएं आपके रास्ते में बाधा नहीं बनतीं।"
राष्ट्र प्रेस ने नंदिता दास से 'केरल स्टोरी 2' पर चल रहे विवाद और सेंसरशिप के मुद्दे पर भी पूछा। उन्होंने कहा, "कला के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अत्यंत आवश्यक है। जब कला को खुलकर अभिव्यक्त होने का मौका मिलता है, तभी अच्छी और बुरी दोनों प्रकार की रचनाएं सामने आती हैं। यही प्रक्रिया समाज को समझदार बनाती है, और लोग खुद तय करते हैं कि क्या मूल्यवान है। मैं किसी भी प्रकार की सेंसरशिप के खिलाफ हूं।"
वैश्विक मुद्दों पर भी नंदिता दास ने अपने विचार साझा किए। जब राष्ट्र प्रेस ने तालिबान द्वारा महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा को कानूनी मान्यता देने पर उनकी राय मांगी, तो उन्होंने कहा, "किसी धर्म या व्यवस्था के नाम पर महिलाओं को दबाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है। एक बेहतर समाज के लिए सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी। मैं अपने स्तर पर, चाहे अपने काम या शब्दों के जरिए हो, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती रहूंगी। अगर हम एक मानवीय दुनिया चाहते हैं, तो हमें अन्याय का प्रतिरोध करना होगा।"