14 अक्टूबर 2026
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नवरात्र पर भारत-पाक सीमा के पास टाली माता मंदिर में हजारों श्रद्धालु, पाकिस्तान तक गूंजते हैं जयकारे

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नवरात्र पर भारत-पाक सीमा के पास टाली माता मंदिर में हजारों श्रद्धालु, पाकिस्तान तक गूंजते हैं जयकारे

सारांश

भारत-पाकिस्तान सीमा के ज़ीरो पॉइंट पर बसा टाली वाली माता मंदिर नवरात्र में आस्था और राष्ट्रभाव का संगम बन जाता है — जहाँ जयकारे सरहद पार पहुँचते हैं, फ़ौजी और आम भक्त कंधे से कंधा मिलाकर माथा टेकते हैं, और दशकों की सीमापार फायरिंग के बावजूद मंदिर अछूता रहा है।

मुख्य बातें

टाली वाली माता मंदिर जम्मू से 25 किलोमीटर दूर भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट मढ़ गांव में स्थित है।
नवरात्र के दौरान हर दिन हज़ारों श्रद्धालु माता काली के दर्शन के लिए पहुँच रहे हैं; नवमी पर भीड़ सर्वाधिक रहने की उम्मीद है।
मंदिर में लगने वाले जयकारों और भजन-कीर्तन की आवाज़ पाकिस्तान सीमा तक सुनाई देती है।
भारतीय सेना के जवान भी नियमित रूप से यहाँ दर्शन-पूजन करते हैं।
मंदिर में सिख, मुस्लिम सहित सभी धर्मों के श्रद्धालु आते हैं; मुस्लिम समुदाय के सदस्य मंदिर में सेवा भी करते हैं।
सीमापार फायरिंग और हमलों में आज तक मंदिर और सटे गांव को कोई क्षति नहीं पहुँची।

नवरात्र के पावन अवसर पर जम्मू से करीब 25 किलोमीटर दूर भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट स्थित प्राचीन टाली वाली माता मंदिर में हर दिन हज़ारों श्रद्धालु माता काली के दर्शन के लिए उमड़ रहे हैं। जम्मू जिले के मढ़ गांव में शीशम के एक प्राचीन पेड़ के भीतर स्थित इस मंदिर में भक्तगण शांति, समृद्धि और खुशहाली की कामना लेकर आते हैं। 14 अक्टूबर 2026 को नवमी तिथि पर भीड़ के और अधिक बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

टाली वाली माता मंदिर भारत-पाकिस्तान सीमा के ज़ीरो पॉइंट के समीप स्थित है और सदियों पुराना माना जाता है। इसका नाम एक प्राचीन टाली (शीशम) के पेड़ पर रखा गया है, जिसके नीचे और जिसके भीतर माता की प्रतिमा स्थापित है। मान्यता है कि यह पेड़ कभी नहीं सूखता। इस विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण मंदिर में लगने वाले जयकारों और भजन-कीर्तन की आवाज़ें पाकिस्तान की सीमा तक सुनाई देती हैं।

गौरतलब है कि यह क्षेत्र दशकों से सीमापार तनाव का साक्षी रहा है, फिर भी इस मंदिर और इससे सटे गांव को पड़ोसी देश की ओर से की गई फायरिंग या हमलों में आज तक कोई क्षति नहीं पहुँची — यह तथ्य यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था को और गहरा करता है।

श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया

श्रद्धालु मानसी चौधरी ने बताया, 'जब यहां श्रद्धालु नारे लगाते हैं, तो उनकी आवाज़ पाकिस्तान बॉर्डर तक सुनाई देती है। नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में लोग मंदिर आ रहे हैं और नौवें दिन भीड़ के और बढ़ने की उम्मीद है। इतिहास में इस मंदिर पर आज तक कोई हमला नहीं हुआ और न ही कोई धमाका हुआ। इस मंदिर में सेना के जवान भी दर्शन-पूजन करने आते हैं।'

एक अन्य महिला श्रद्धालु ने कहा, 'जीरो पॉइंट पर स्थित इस मंदिर पर आर्मी के जवानों के साथ-साथ दूर-दूर से लोग यहाँ माथा टेकने आते हैं। इस मंदिर में आने वाले लोगों की मुरादें काली माता पूरी करती हैं। नवमी के दिन यहाँ काफी भीड़ होती है और दिन भर लंगर चलता है।'

सुरेंद्र शर्मा ने कहा, 'जीरो पॉइंट पर स्थित टाली वाली माता मंदिर में लगने वाले नारों की गूंज पाकिस्तान तक सुनाई देती है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होती है। हर नवरात्रि पर यह मेला लगता है।'

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल

मंदिर की एक उल्लेखनीय विशेषता इसकी सामाजिक समावेशिता है। श्रद्धालुओं के अनुसार यहाँ सिख, मुस्लिम सहित सभी धर्मों के लोग दर्शन के लिए आते हैं और मुस्लिम समुदाय के सदस्य भी मंदिर में सेवा करते हैं। यह इस संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में सांप्रदायिक सौहार्द का एक विरल उदाहरण है। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब देश में धार्मिक एकता की चर्चाएँ अक्सर सुर्खियों में रहती हैं।

नवमी पर विशेष आयोजन

नवरात्र के नौवें दिन मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना और दिनभर लंगर का आयोजन किया जाता है। भारतीय सेना के जवान भी इस अवसर पर दर्शन के लिए आते हैं, जो इस धार्मिक स्थल और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रतीकात्मक संगम को दर्शाता है। आने वाले दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या में और वृद्धि की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भूगोल और पहचान की भी है — एक ऐसा स्थल जहाँ सीमा की कठोरता और सांप्रदायिक सौहार्द एक साथ मौजूद हैं। जम्मू का यह सीमावर्ती क्षेत्र दशकों से सुरक्षा तनाव का केंद्र रहा है, फिर भी यह मंदिर अपनी सामाजिक समावेशिता — हिंदू, सिख, मुस्लिम सभी की भागीदारी — के कारण एक वैकल्पिक आख्यान प्रस्तुत करता है जिसे मुख्यधारा की सीमा-विमर्श अक्सर नज़रअंदाज़ करती है। सेना के जवानों का यहाँ दर्शन करना इस स्थल को राष्ट्रीय भावना से भी जोड़ता है। हालाँकि, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि श्रद्धालुओं के बयान व्यक्तिगत आस्था पर आधारित हैं — इन्हें प्रशासनिक या सुरक्षा रिकॉर्ड से स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया गया है।
RashtraPress
14 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

टाली वाली माता मंदिर कहाँ स्थित है?
टाली वाली माता मंदिर जम्मू से लगभग 25 किलोमीटर दूर जम्मू जिले के मढ़ गांव में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट स्थित है। यह मंदिर एक प्राचीन टाली (शीशम) के पेड़ के नीचे और उसी के भीतर बना है।
टाली वाली माता मंदिर का नाम ऐसा क्यों पड़ा?
इस मंदिर का नाम एक प्राचीन टाली यानी शीशम के पेड़ पर रखा गया है, जिसके नीचे और जिसके भीतर माता की प्रतिमा स्थापित है। मान्यता है कि यह पेड़ कभी नहीं सूखता, जो इसे चमत्कारी बनाता है।
नवरात्र के दौरान इस मंदिर में क्या विशेष होता है?
नवरात्र में इस मंदिर में हर दिन हज़ारों श्रद्धालु पहुँचते हैं और नवमी के दिन सबसे अधिक भीड़ होती है। इस दिन दिनभर लंगर चलता है और विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है।
क्या इस मंदिर में केवल हिंदू श्रद्धालु ही आते हैं?
नहीं, इस मंदिर में सिख, मुस्लिम सहित सभी धर्मों के लोग दर्शन के लिए आते हैं। श्रद्धालुओं के अनुसार मुस्लिम समुदाय के सदस्य भी यहाँ सेवा कार्य करते हैं, जो इसे सांप्रदायिक सौहार्द की एक मिसाल बनाता है।
सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित होने के बावजूद यह मंदिर कैसे सुरक्षित रहा है?
श्रद्धालुओं का कहना है कि पड़ोसी देश की ओर से की गई फायरिंग और हमलों में आज तक इस मंदिर और इससे सटे गांव को कोई नुकसान नहीं हुआ। भारतीय सेना के जवान भी यहाँ नियमित रूप से दर्शन के लिए आते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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