आज भी बलि चढ़ाकर मां तरकुलहा देवी को प्रसन्न करते हैं भक्त, नवरात्रि में होते हैं विशेष अनुष्ठान

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आज भी बलि चढ़ाकर मां तरकुलहा देवी को प्रसन्न करते हैं भक्त, नवरात्रि में होते हैं विशेष अनुष्ठान

सारांश

उत्तर प्रदेश के मां तरकुलहा देवी मंदिर की अनूठी परंपरा अब भी जीवित है, जहां भक्त बलि चढ़ाकर मां को प्रसन्न करते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष अनुष्ठान होते हैं। इस मंदिर का इतिहास और मान्यता जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।

मुख्य बातें

मां तरकुलहा देवी: भक्तों की रक्षा करने वाली देवी।
स्थान: गोरखपुर के निकट।
बलि की परंपरा: शहीद बाबू बंधू सिंह की याद में।
नवरात्रि में विशेष अनुष्ठान: भक्त नारियल और बलि चढ़ाते हैं।
आस्था का महत्व: भक्तों की भीड़ हर नवरात्रि में।

नई दिल्ली, 11 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। उत्तर प्रदेश की पवित्र भूमि पर पूर्वांचल की मां विंध्यवासिनी से लेकर पश्चिम में स्थित मां शाकंभरी देवी भक्तों की सुरक्षा के लिए तैनात हैं। यही कारण है कि हर नवरात्रि में उत्तर प्रदेश के सभी मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

उत्तर प्रदेश में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां मां को श्रद्धांजलि देने के लिए अंग्रेजों के सिर काटे गए थे और यह प्रथा आज भी जारी है। हम बात कर रहे हैं मां तरकुलहा देवी की, जिन्हें मां दुर्गा का उग्र रूप माना जाता है।

मां तरकुलहा देवी का मंदिर गोरखपुर से 20 किलोमीटर और चौरी-चौरा से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां दर्शन के लिए केवल भारत ही नहीं, बल्कि नेपाल से भी भक्त आते हैं। मान्यता है कि मां के चरणों में आस्था रखने वाले भक्तों की रक्षा स्वयं मां तरकुलहा करती हैं।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह जंगल में पेड़ के नीचे पिंडियों की पूजा करते थे। वह गुरिल्ला युद्ध में माहिर थे और जब भी ब्रिटिश राज में अंग्रेज जंगलों में घुसने की कोशिश करते, तो वह उनका सिर काटकर मां की पिंडियों को अर्पित कर देते। उन्होंने कई अंग्रेजों का सिर काटकर मां को समर्पित किया, लेकिन एक दिन अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और छह बार फांसी पर लटकाने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह बच गए।

कहा जाता है कि बाबू बंधू सिंह ने मां से प्रार्थना की कि उन्हें मुक्त किया जाए। मां ने उनकी पुकार सुनी और जब उन्हें सातवीं बार फांसी पर लटकाया गया, तब उनके प्राण निकले। शहीद बाबू बंधू सिंह की याद में एक स्मारक भी बनाया गया। तभी से इस मंदिर में बलि देने की परंपरा चल रही है, खासकर चैत्र और शारदीय नवरात्रि में भक्त मां के सामने बकरा बलि चढ़ाते हैं।

चैत्र नवरात्रि के अवसर पर, मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी रहती है। भक्त कष्टों से मुक्ति और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए नारियल चढ़ाते हैं। कुछ भक्त इच्छा पूरी होने पर मां को बलि भी अर्पित करते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहां परंपराओं का पालन आज भी श्रद्धा के साथ किया जाता है। यह दर्शाता है कि कैसे भारतीय संस्कृति में आस्था और परंपरा का गहरा रिश्ता है। विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान यहां भक्तों की भारी भीड़ इस बात का प्रमाण है कि आस्था का कोई विकल्प नहीं।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मां तरकुलहा देवी का मंदिर कहां स्थित है?
मां तरकुलहा देवी का मंदिर गोरखपुर से 20 किलोमीटर दूर और चौरी-चौरा से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
नवरात्रि के दौरान मंदिर में क्या विशेष अनुष्ठान होते हैं?
नवरात्रि के दौरान भक्त मां को बलि चढ़ाते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
मां तरकुलहा देवी की बलि देने की प्रथा कब से चली आ रही है?
यह प्रथा शहीद बाबू बंधू सिंह की शहादत के बाद से चल रही है।
क्या भक्त केवल भारत से ही इस मंदिर में आते हैं?
नहीं, भक्त नेपाल से भी मां के दर्शन के लिए आते हैं।
मां तरकुलहा देवी की विशेषता क्या है?
मां तरकुलहा देवी को मां दुर्गा का उग्र अवतार माना जाता है, जो भक्तों की रक्षा करती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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