नवरात्रि विशेष: ताल बराही मंदिर, झील के मध्य मां दुर्गा के दर्शन से शत्रुओं का नाश
सारांश
Key Takeaways
- ताल बराही मंदिर झील के मध्य स्थित है।
- यहां मां दुर्गा के दर्शन से शत्रुओं का नाश होता है।
- मंदिर तक पहुँचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है।
- यहां नवरात्रि के दौरान भक्तों की भारी भीड़ होती है।
- यह मंदिर हिंदू और बौद्ध अनुयायियों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली, 8 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। भारत में मां दुर्गा के लिए कई शक्तिपीठ और सिद्धपीठ मंदिर हैं, जहाँ उनके विभिन्न अवतारों की पूजा की जाती है।
भारत के अलावा, नेपाल में भी मां दुर्गा को समर्पित कई मंदिर हैं, जहाँ नवरात्रि पर विशेष पूजा और अनुष्ठान आयोजित होते हैं। नेपाल में झीलों के मध्य मां दुर्गा के उग्र रूप की पूजा की जाती है, और भक्तों को वहां पहुँचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है। हम बात कर रहे हैं वराह देवी मंदिर (ताल बराही मंदिर) की। नवरात्रि के समय इस मंदिर में भक्तों की बड़ी संख्या में भीड़ होती है।
नेपाल में मां दुर्गा के उग्र रूप वराह देवी का यह प्रसिद्ध मंदिर है। माना जाता है कि मां के दर्शन मात्र से ही शत्रुओं का नाश हो जाता है। यह मंदिर पोखरा की फेवा झील में स्थित एक छोटे द्वीप पर है और प्राचीन समय से भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करता आ रहा है। मंदिर के हर दरवाजे पर मन्नतों के धागे बंधे हैं, जो भक्तों की अटूट विश्वास को दर्शाते हैं। विशेष बात यह है कि यह मंदिर केवल हिंदुओं की आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि बौद्ध धर्म के अनुयायी भी यहाँ आते हैं, और नवरात्रि के दौरान यहाँ भक्तों की अच्छी खासी भीड़ देखी जाती है।
कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा कुलमंदन शाह ने अपने स्वप्न के अनुसार करवाया था। राजा कुलमंदन शाह को मां वराही देवी ने दर्शन देकर मंदिर के निर्माण का आदेश दिया था। इस मंदिर का निर्माण पारंपरिक पैगोडा शैली में किया गया है, जिसमें लकड़ी, ईंट और विशाल पत्थरों का उपयोग किया गया है। मंदिर का परिसर इतना बड़ा है कि यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु आ सकते हैं। फेवा झील की यात्रा के दौरान भक्त नाव की सवारी और मंदिर भ्रमण दोनों का आनंद लेते हैं।
दुर्गा पूजा के दौरान और शनिवार को हजारों पोखरा निवासी देवी की पूजा के लिए ताल बराही मंदिर आते हैं। यह मंदिर नेपाल में अपने प्रकार का अद्वितीय मंदिर है, क्योंकि यह पूरी तरह से एक झील के भीतर बना है और यहाँ कोई भूमि मार्ग नहीं है। मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को नाव का सहारा लेना पड़ता है।